पुरानी कहावत है कि किसी भी चीज की अति और कमी, दोनों ख़राब होती है. आबादी भी इसका अपवाद नहीं है. किसी भी देश के विकास के लिए जनसंख्या स्थिरीकरण होना जरूरी है. मतलब यह कि जन्म और मृत्यु के बीच ऐसा संतुलन जिससे आबादी स्थिर बनी रहे. दार्शनिक अरस्तू ने सैकड़ों साल पहले ही कह दिया था कि किसी देश की जनसंख्या न तो इतनी कम होनी चाहिए कि जिससे देश आत्मनिर्भर न हो सके और न ही इतनी अधिक होनी चाहिए कि जिससे स्व-शासन के मार्ग में रुकावटें खड़ी हो जाएं. ऐसे में बीच का सही रास्ता यही है कि जनसंख्या को स्थिर रखा जाए.

कई कस्बों की नगरपालिकाएं बच्चों के कपड़े, ऊनी कंबल, खाने का सामान और जच्चा-बच्चा की अस्पताल में विशेष देखभाल जैसी तमाम सुविधाएं मुफ्त में उपलब्ध करा रही हैं.

दुनिया के ज्यादातर देश बीच का यही रास्ता खोजने के लिए खासी माथापच्ची कर रहे हैं. जनसंख्या के विस्फोट से जूझते भारत, चीन और बांग्लादेश जैसे देशों को इसके चलते होने वाली मुश्किलें जगजाहिर हैं. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दुनिया में बहुत से देश जनसंख्या की कमी से भी जूझ रहे हैं. चीन और भारत जैसे देश भले ही एक या दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए अपने नागरिकों को हतोत्साहित कर रहे हों, लेकिन इसके उलट बहुत से देश ऐसे भी हैं जहां लोगों को संतान पैदा करने के लिए तरह-तरह के लुभावने ऑफर दिए जा रहे हैं.

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फिनलैंड को ही लें. यूरोप के इस देश के अलग-अलग कस्बे घटती आबादी की समस्या से जूझ रहे हैं. इसका एक कारण तो यह है कि यहां जन्म दर बहुत घट गई है. दूसरा यह कि लोग बड़े शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं. यही वजह है कि कई कस्बों के प्रशासन ने कुछ अनोखी योजनाएं शुरू की हैं. मसलन पलायन करके बड़े शहरों की ओर जा रहे लोगों को रोकने के लिए उन्हें बहुत कम कीमत में फ्लैट ऑफर किए जा रहे हैं. कुछ स्थानीय निकाय बच्चा पैदा करने वाले दंपतियों को नक़द राशि भी दे रहे हैं.

स्थानीय मीडिया के मुताबिक पश्चिमी फिनलैंड के कई कस्बों में बच्चे पैदा करने वालों को 10 हजार यूरो (क़रीब सवा सात लाख रुपए) दिये जा रहे हैं. ये कस्बे इस बात का भी ध्यान रख रहे है कि नवजात बच्चों के लिए अनुकूल वातावरण मुहैय्या कराया जाये.

फिनलैंड के पश्चिमी तट पर इस देश का सबसे छोटा क़स्बा है लेस्तीजार्वी. इसकी कुल आबादी 815 रह गई है. यहां 2012 के बाद से प्रत्येक नए जन्मे बच्चे के माता-पिता को 10 हजार यूरो दिए जाते हैं. एक झटके में पैसा बनाने की जालसाजी न होने लगे, इसके लिए यह धनराशि 1,000 यूरो प्रति महीने के हिसाब से जारी की जाती है.

उताजार्वी कस्बे की आबादी करीब तीन हजार है. यहां दस साल से एक यूरो में प्लॉट का ऑफ़र चल रहा है, लेकिन तब से अब तक प्लॉट लेने वालों की संख्या कुछ दर्जन तक ही पहुंची है.

इसी तरह करीब आठ हजार लोगों की जनसंख्या वाले ओस्ट्रोबोथनिया कस्बे में भी हर महीने शिशु अनुदान दिया जा रहा है. इस समय यह धन राशि 376 यूरो है जिसमें हर साल इजाफा किया जाता है. इसके अलावा कई कस्बों की नगरपालिकाएं बच्चों के कपड़े, ऊनी कंबल, खाने का सामान और जच्चा-बच्चा की अस्पताल में विशेष देखभाल जैसी तमाम सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं.

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चौकाने वाली बात तो ये है कि इतनी सहूलियतों के बाद भी लोग इन कस्बों में रहने को तैयार नहीं. उताजार्वी कस्बे की आबादी करीब तीन हजार है. यहां दस साल से एक यूरो में प्लॉट का ऑफ़र चल रहा है, लेकिन तब से अब तक प्लॉट लेने वालों की संख्या कुछ दर्जन तक ही पहुंच सकी है.

फिनलैंड की सरकार लंबे समय से अपने यहां की घटती जनसंख्या को लेकर परेशान है. जनसंख्या बढ़ाने को लेकर लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए वह जागरूकता अभियान चलाने के साथ तमाम सुविधाएं उपलब्ध करा रही है. सरकार पहले से ही 17 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए आर्थिक मदद देती है. सभी गर्भवती महिलाओं को सरकार की तरफ से एक डिब्बा मिलता है. बच्चों के कपड़े, चटाई, खिलौनों, स्लीपिंग बैग और नैपकिन से भरे इस डिब्बे का इस्तेमाल नवजात बच्चों के लिए बिस्तर की तरह भी किया जा सकता है.

स्थानीय सर्वे एजेंसियों के अनुसार फ़िनलैंड में 40 से 44 की उम्र की प्रत्येक पांच में एक महिला और प्रत्येक चार में से एक पुरुष किसी भी बच्चे के माता या पिता नहीं हैं. दिलचस्प बात यह भी है कि भारत जैसे देशों से उलट फ़िनलैंड में कम शिक्षित या अशिक्षित लोग कम बच्चे पैदा करते हैं. उन्हें डर रहता है कि इससे उनकी आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ेगा.

फ़िनलैंड के अलावा भी कई देश घटती जनसंख्या से परेशान हैं. इससे पहले रूस में जनसंख्या वृद्धि के लिए वहां के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने 10 वर्षीय जनसंख्या बढ़ाओ कार्यक्रम की शुरूआत की थी.

वैसे फ़िनलैंड के अलावा भी कई देश घटती जनसंख्या से परेशान हैं. इससे पहले रूस में जनसंख्या वृद्धि के लिए वहां के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने 10 वर्षीय जनसंख्या बढ़ाओ कार्यक्रम की शुरूआत की थी. आस्ट्रेलिया में भी वहां के निवासियों से राष्ट्रीय अपील की गई. इसका मजमून था कि हर दंपत्ति कम से कम तीन बच्चे पैदा करे—एक मम्मी के लिए, एक पापा के लिए और एक देश के लिए. जापान भी वहां कामकाजी आबादी में बुर्जुगों की संख्या बढ़ने और युवाओं की संख्या घटने से चिंतित है और जनसंख्या वृद्धि को लेकर वहां की सरकार विशेष अभियान चला रही है.

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उधर, जनसंख्या के बोझ से जूझते देश इसमें स्थिरता लाने के लिए तमाम उपाय कर रहे हैं. दरअसल भारत जैसे देशों में जनसंख्या वृद्धि का सबसे बुरा असर जन-सुविधाओं पर पड़ता है. जानकारों के मुताबिक आपका आर्थिक स्तर यह तय करता है कि आपको मिलने वाली सुविधाओं का स्तर क्या होना चाहिए. यदि आपका आर्थिक स्तर कमजोर है तो आपको निम्नतम स्तर की सुविधाओं का उपभोग करना पड़ेगा. लेकिन जनसंख्या बहुत ज्यादा हो तो निम्नतम स्तर की सुविधाओं का मतलब ही परेशानी उठाना हो जाता है, जबकि इन सुविधाओं का मतलब सिर्फ बिना विलासिता वाली सुविधा होना चाहिए.

भारत की रेलें इसका उदाहरण हैं. रेल यात्रियों का 70 फीसदी हिस्सा सामान्य श्रेणी में सफर करता है. लेकिन भयानक भीड़ की वजह से सामान्य श्रेणी में सफर करने वाले किसी व्यक्ति की हालत सामान्य यात्री की नहीं बल्कि किसी गठरी सरीखी होती है.