बताने वाले इसे सोशल मीडिया का दौर मानते हैं और हर चीज पर इसका बुरा असर पड़ने की बात कहते हैं. भाषाओं पर भी. हिंदी के ज्यादातर चिंतकों (चिंता करने वाले अर्थों में) का मानना है कि यह दौर हिंदी लिखने और पढने वालों के लिए बुरा है और इस लिहाज से हिंदी के लिए बदतरीन है. इसी साल की शुरुआत में दिल्ली में आयोजित हुए पुस्तक मेले में कई जानकारों को कहते सुना गया कि वे सोशल मीडिया पर लिखने वालों को या सोशल मीडिया से लोकप्रिय हुए लेखकों को लेखक ही नहीं मानते हैं. लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय हिंदी पाठकों ने ऐसे कई लेखकों की किताबें खरीद-पढ़कर आलोचकों की इस बात को मानने से इनकार कर दिया है.
सोशल मीडिया ने हिंदी लेखकों को एक नई तरह की ताकत दी है. अब लेखक किताब लिखने के साथ-साथ उसे ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक भेजने का प्रयास भी कर रहे हैं और इसमें सफल भी हो रहे हैं. सत्य व्यास सोशल मीडिया पर लोकप्रिय ऐसे ही एक लेखक हैं. इसी महीने उनकी दूसरी किताब 'दिल्ली दरबार' बाजार में आई है. व्यास की इस किताब ने हिंदी किताबों के प्रमोशन के तरीकों की एक नई शुरुआत की है. लेखक ने किताब के प्रचार के लिए इलस्ट्रेशन की एक सीरीज जारी की थी जिसमें उपन्यास का नायक और अन्य पात्र अपने-अपने चरित्र के मुताबिक़ कुछ बेहद चुटीले संवाद बोलते नजर आते हैं. इसका फायदा यह हुआ कि उपन्यास के मुख्य तीन पात्र किताब के बाजार में आने के पहले ही लोगों से जान-पहचान बना चुके थे.
सोशल मीडिया पर लिखी हुई पोस्ट के बजाय तस्वीरों वाली पोस्ट ज्यादा तेजी से वायरल होती हैं. सत्य व्यास जैसे सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखक इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं. इसलिए उन्होंने फेसबुक की इस प्रवृत्ति का ठीक से फायदा उठाया. बहुत श्रेष्ठ स्तर की कलात्मकता नहीं होते भी उनके इलस्ट्रेशन एक मजेदार तरीके से अपनी बात कह जाते हैं इसलिए लोग ख़ुशी-ख़ुशी इन्हें अपनी वाल पर शेयर कर रहे थे. सत्य व्यास का यह तरीका इसलिए भी अनूठा था कि उन्होंने इन इलस्ट्रेशनों के माध्यम से अपने उपन्यास से पहले की कहानी को भी बताया. आमतौर पर लेखक किताब के प्रति रूचि जगाने के लिए उसके कुछ हिस्से पाठकों तक पहुंचने देते हैं. लेकिन कहानी से पहले की कहानी कहना इससे कुछ अलग और इसलिए बेहद रोचक भी था.
प्रमोशन वीडियो, टी-शर्ट, कप, खिलौनों आदि के जरिए एक लंबे समय से फिल्मों और अंग्रेजी किताबों का प्रमोशन तो किया जाता रहा है लेकिन हिंदी में यह चलन काफी नया है. युवा लेखक दिव्य प्रकाश दुबे ने 2012 में अंग्रेजी के नाम वाली अपनी पहली हिंदी की किताब - 'टर्म एंड कंडीशन अप्लाई' - का प्रमोशन वीडियो जारी किया था. हिंदी लेखन संसार में यह इस तरह का पहला वीडियो था. उन्होंने अपनी हालिया प्रकाशित मुसाफिर कैफे का भी एक वीडियो जारी किया था जो काफी लोकप्रिय और चर्चित रहा था.
प्रमोशन वीडियोज के जरिये पाठकों को किताब के पात्रों और कहानी का मोटा-मोटा अंदाजा लग जाता है और अगर यह काम ठीक से किया जाए तो इससे किताब के प्रति लोगों की जिज्ञासा बढ़ना तय है जिसके बाद उसका आम से ज्यादा बिकना भी तय ही है. सत्य व्यास ने 'दिल्ली दरबार' के मामले में इस समझ से फायदा उठाने में कोई चूक नहीं की. उन्होंने इलस्ट्रेशन के अलावा अपनी किताब के तीन मुख्य पात्रों का एक प्रमोशन वीडियो भी बनाया था. यह वीडियो यूट्यूब पर अपलोड होने के एक हफ्ते के भीतर ही करीब बीस हजार लोगों तक पहुंच चुका था. कुछ लोगों को यह आंकड़ा थोड़ा कम लग सकता है लेकिन एक हिंदी किताब के लिए यह कोई छोटी बात नहीं है. वैसे यह वीडियो ऐसा था कि इसे व्हट्सएप पर भी ठीकठाक संख्या में शेयर किया जा रहा था.
सोशल मीडिया पर लोकप्रिय व्यंग्यकार और पत्रकार नीरज बधवार की किताब 'हम सब फेक हैं' 2014 में प्रकाशित हुई थी. बधवार पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने बिना लागत सोशल मीडिया का सबसे पहले और उस समय तक, सबसे बेहतरीन इस्तेमाल किया था. वे प्रकाशन से पहले ही किताब से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात को सोशल मीडिया पर साझा कर रहे थे. एक बार पाठकों और समीक्षकों तक किताब पहुंचने के बाद उस पर आ रही टिप्पणियों के साथ हर समीक्षा को भी उन्होने अपनी टाइमलाइन पर जगह दी. आजकल यही काम युवा साहित्यकार यतीन्द्र मिश्र करते नजर आ रहे हैं. यतीन्द्र मिश्र पिछले करीब दो महीने से सोशल मीडिया पर अपनी हालिया प्रकाशित किताब 'लता-सुरगाथा' का प्रमोशन कर रहे हैं. वे भी लता जी पर आधारित इस किताब पर आई हर प्रतिक्रिया को साझा करते हैं. किताब के बाजार में आने के तुरंत बाद उन्होंने किताब के अंश और लता जी की तस्वीरों को जोड़कर बनाए पोस्टर भी सोशल मीडिया पर जमकर शेयर किये थे .
किताब के प्रचार का काम प्रकाशकों का है. लेकिन हिंदी के लेखकों को हमेशा यह शिकायत रही कि उनके प्रकाशकों ने कभी यह काम ठीक से नहीं किया. इस लिहाज से कम से कम युवा सोच रखने वाले लेखकों के लिए सोशल मीडिया किसी वरदान से कम नहीं है. बिक्री का सारा इंतजाम ऑनलाइन हो जाने से भी हिंदी लेखकों को काफी सुविधा हो गई है. एक युवा लेखक के मुताबिक पहले प्रकाशक रॉयल्टी न देने के फेर में प्रकाशित या बिकी हुई किताबों की सही गिनती उन्हें कभी नहीं बताया करते थे. अब सारा मामला डिजिटल हो जाने से ऐसा करना मुश्किल हो गया है. अब हिंदी लेखकों की किताबें न सिर्फ लोकार्पण के पहले ही बड़ी संख्या में बुक हो सकती हैं बल्कि बिक्री से जुड़े आंकड़े भी उन तक बड़ी आसानी से पहुंच जाते हैं. सत्य व्यास पर लौटें तो उनकी पहली किताब 'बनारस टॉकीज' जनवरी 2015 में आई थी. यह अब तक नई वाली हिंदी की श्रेणी में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अब तक इस किताब की लगभग सोलह हजार प्रतियां बिक चुकी हैं. चिंतकों की चिंता कुछ भी हो लेकिन इसे हिंदी और हिंदी में लिखने-पढ़ने वालों के लिए बुरा कैसे कहा जाए!
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