हिंदी अंचल से बुरी ख़बरें आती रही हैं: ग़रीबी, बेरोज़गारी, निरक्षरता, जातिगत भेदभाव और हिंसा, सांप्रदायिकता आदि. कुप्रशासन, वंशवाद, शिक्षा और संस्कृति की संस्थाओं का ह्रास और सत्यानाश भी. 24 वर्ष पहले बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ था, हज़ारों लोगों की जानें गयी थीं और यह दुर्घटना भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई थी. उसके 24 वर्ष बाद, अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के संदर्भ में कुछ और बुरी ख़बरें आ रही हैं. ये क़यास भर नहीं हैं, ठोस सर्वेक्षण पर आधारित हैं.

बजाय बाबरी विवाद के अतीत की बात होने के उसे फिर गरमाया जा रहा है. एक सर्वेक्षण बताता है, कि जनवरी 2010 और अप्रैल 2016 के बीच उत्तर प्रदेश में 12000 साम्प्रदायिक घटनाएं हुई हैं. एक और सर्वेक्षण से पता चला है कि लगभग आधे सर्वेक्षित हिंदू चाहते हैं कि विवादित स्थल पर केवल मंदिर बने जबकि वहां फिर से केवल मस्जिद चाहने वाले मुसलमानों का प्रतिशत घटकर 28 रह गया है. एक सटीक विश्लेषण बताता है कि यह मुसलमानों में किसी बढ़ी धर्मनिरपेक्षता का नहीं, बल्कि उनका वर्तमान व्यवस्था में मसजिद के पक्ष में न्याय न पाने की नाउम्मीदी का सबूत है.

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कट्टर रुख वाले हिंदुओं में पढ़े-लिखे देहाती और शहराती नौजवानों की भागीदारी बहुत अधिक है. बहुत पहले से हम यह लक्ष्य करते आ रहे हैं कि हिंदी अंचल में शिक्षा और निरक्षरता का और भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता का विस्तार साथ-साथ हो रहा है. 2017 के चुनाव में जातिवाद और सांप्रदायिकता के मुद्दे निश्चय ही फिर विभाजनकारी बनेंगे.

ज़ाहिर है कि शिक्षा, संस्कृति और साहित्य की शक्तियां हिंदी अंचल के केंद्रीय प्रदेश में कट्टरता, सांप्रदायिक विद्वेष, धर्मांधता, हिंसा आदि के विरुद्ध कारगर प्रतिरोध साबित नहीं हो पा रही हैं. हमारी व्यापक सामाजिक विफलता का यह एक ऐसा पहलू है जिस पर हम अधिक ध्यान नहीं दे पाये हैं. लेखकों, अध्यापकों, बुद्धिजीवियों आदि से यह अपेक्षा शायद नहीं की जा सकती कि वे अपने बुनियादी कामों याने रचने, लिखने-पढ़ने और अभिव्यक्त करने को छोड़कर किसी नागरिक अभियान में कार्यकर्ता बन जायें. लेकिन स्थिति दिन-ब-दिन इतनी भयावह और ख़तरनाक होती जा रही है कि हमें प्रतिरोध के पारंपरिक रूपाकारों से अलग कुछ करने पर, फिर भी, गंभीरता से विचार और जल्दी अमल करना चाहिए.

साहित्य को अगर अपने सामाजिक हित और स्वत्‍व की रक्षा करनी है तो उसे, आपदधर्म के रूप में सही, कुछ गै़र-साहित्यिक भी करना पड़ेगा. पहले भी लेखकों ने ऐसा किया है. चेतावनी की घंटियां बज रही हैं - वे सारे साहित्य-समाज के लिए बज रही हैं. उन्हें अनसुना करना न तो नैतिक होगा, न ही साहित्य के व्यापक हित में.