दो नवंबर अभी पूरा बीता नहीं है और इसके बीतते-बीतते, ‘52 साल का होने पर कैसा लग रहा है?’ पर शाहरुख खान की कही कुछ दार्शनिक या अकड़ से भरी हुईं उक्तियां सुनने को मिल सकती हैं. उनकी पहले कभी कही ‘अगर मैं शाहरुख खान नहीं होता तो मैं वो होता जो शाहरुख खान बनना चाहता है’ जैसी कोई हाजिरजवाब उक्ति ! ऐसी ही एक उक्ति वैसे वो कुछ महीनों पहले कह भी चुके हैं, ‘अगले पांच सालों में मैं 15 फिल्में करना चाहता हूं. एक साल में तीन जिसमें से एक मैं मन के लिए करना चाहता हूं, एक तन के लिए और एक धन के लिए!’. एक इक्यावन वर्षीय सुपरस्टार उम्र को धता बनाने के लिए इससे बेहतर आखिर क्या हाजिरजवाब होगा.
लेकिन वो हो सकता है, अगर वो शाहरुख खान होगा! उनकी यूनिवर्सिटी आफ एडिनबर्ग वाली स्पीच हो या उनकी पिछली फिल्म ‘फैन’ या 2015 में डीडीएलजे के एक और साल पुराना होने पर काजोल के साथ उनका एक सीन रीक्रिएट करना - आज 52 के हो रहे शाहरुख अभी भी अपने काम और जीवन को लेकर उतने ही उत्साही नजर आ रहे हैं जितने जवानी के दिनों में आया करते थे (और हमारे ऐसा कहते ही, अगर वे आस-पास होते तो शर्तिया कहते, मैं अभी भी जवान ही हूं इडियट!).
आमिर, शाहरुख और सलमान खान का 52 का होकर भी 52 का नहीं लगना, और उनकी उम्र का उनकी पहचान नहीं बन पाना ही शायद इस वर्ष की उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है
बिलकुल आमिर खान (जन्मदिन 21 मार्च) और सलमान खान (जन्मदिन 27 दिसंबर) की तरह, जवान! इस साल एक साथ 52 की हो रही इस खान त्रयी का 52 का होकर भी 52 का नहीं लगना, और उनकी उम्र का उनकी पहचान नहीं बन पाना ही शायद इस वर्ष उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. उनके द्वारा धराशायी होते बॉक्स-आफिस रिकॉर्ड्स से भी बड़ी उपलब्धि. इतनी बड़ी कि आप शेक्सपियर की एक उक्ति का बॉलीवुडकरण कर यह भी कह सकते हैं, ‘खान त्रयी की उम्र में क्या रखा है!’.
हमारी फिल्म इंडस्ट्री में एक तरफ अमिताभ बच्चन खड़े हैं, जिनकी जगह अडिग है, और दूसरी तरफ तीन विपरीत स्वभावों और पहचानों वाली खान त्रयी, जिनके जैसा हो पाना हमारे यहां किसी के बस का नहीं है. बाकी बचे जितने भी सुपरस्टार्स अदृश्य होने से अभी तक बचे हुए हैं, उन्हें इनके बाद ही खड़े होने की जगह मिलती है और हमारी नजर भी तीन खान और एक बच्चन से होकर गुजरने के बाद ही बाकी सितारों पर पड़ती है. इसे स्वीकार चाहे आप पसंद से करें या बेमन से, हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आज के समय का यही सच है. जिस रॉकस्टार अंदाज में यह तीनों 52 के होकर भी आज फिल्मों में काम कर रहे हैं, आने वाले कई सालों तक इसे ही एकमात्र स्थायी सच की तरह स्थापित रखने का ऐलान भी कर रहे हैं.
52 के ये तीन खान, यानी सीमित अभिनय प्रतिभा वाले आमिर, शाहरुख और सलमान जो अपने असीमित चार्म और समंदर जैसी वृहद व असीमित ही लोकप्रियता के दम पर 52 साल के होकर भी हमारे मुल्क के सफतलम सितारे बने हुए हैं. तकरीबन 25 सालों से. यानी उनकी आधी जिंदगी बॉलीवुड पर राज करते बीती है. और अगर आप हमारी फिल्मों का इतिहास खंगालें तो इतना लंबा राज हमारे यहां तीन स्टारों ने एक साथ मिलकर कभी नहीं किया है. इसीलिए, हम उनकी सीमित अभिनय प्रतिभा पर आलोचनात्मक लेख हमेशा ही लिख सकते हैं लेकिन उनकी लोकप्रियता पर भी ठहर कर लिखना जरूरी है. क्योंकि हर उस मुल्क में जहां फिल्में बनती हैं ऐसा होता नहीं है कि 50 पार कर चुके तीन सुपरस्टार्स (एक नहीं तीन!) स्टारडम के क्षितिज पर बैठकर अपनी आने वाली फिल्मों के दम पर उसके ऊपर एक नए क्षितिज का संयुक्त रूप से निर्माण करने का जज्बा रखते हों.
खान त्रयी पर लिखना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जोशो-खरोश की भी एक एक्सपायरी डेट होती है, जैसा कि फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई विद्वान आपको बताएंगे कि ‘पैशन’ को मरते यहां देर नहीं लगती है और फिर इंडस्ट्री आपसे कोई उम्मीद नहीं रखती है. लेकिन जिस खास और अपने द्वारा ही निर्धारित ‘अलग’ अंदाज में ये खान त्रयी आगे बढ़ रही है, हाल-फिलहाल उस एक्सपायरी डेट के नजदीक आने की उम्मीद कम ही लग रही है. आप बात चाहे ‘दंगल’ के लिए अविश्वनीय रूप से वजन बढ़ा चुके आमिर की कर लें (जिसमें उन्होंने 27 साल का दिखने के लिए अविश्वसनीय रूप से वजन घटाया भी है), या दो साल पहले बिग बॉस को वक्त देने के साथ ही ‘सुल्तान’ के लिए हफ्तों अपने पनवेल वाले फार्महाउस पर विदेशी इंस्ट्रक्टर से पहलवानी के दांव-पेंच सीखते रहे सलमान की कर लें, जिन्होंने खुद भी ‘सुल्तान’ के लिए 15 किलो वजन बढ़ाया था, या फिर बादशाह खान की ही कर लें, जिनकी ‘रईस’ और ‘डियर जिंदगी’ जैसी फिल्मों ने ‘चक दे इंडिया’ और ‘स्वदेश’ जैसा कुछ नया देने की उम्मीद जगाई थी; ये तीनों ही खान सुपरस्टारडम की इस खड़ी चढ़ाई पर रुकते (या फिर थकते) नजर नहीं आ रहे हैं.
खान त्रयी से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि भले ही तीनों खान हैं और एक ही सन् - 1965 - में जन्मे हैं, लेकिन तीनों तीन विपरीत दिशाओं का सफर तय करने वाले नायक हैं
हालांकि ये दिनों तीनों ही खान अपनी उम्र से जुड़े सवालों को (50 पार करने पर कैसा लग रहा है?) या तो टाल देते हैं या फिर उसपर कोई चुटकुला कहकर बात घुमा देते हैं. या फिर ऐसा ही कुछ कह देते हैं कि अभी तो हम तीनों ही 22 का फील कर रहे हैं (आमिर के शब्द). वे ऐसा जानबूझकर करते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि आप उन्हें एक 52 वर्षीय मनुष्य मानकर उनकी फिल्में देखने जाएं. उनकी रियल उम्र अगर आपके जेहन में रहेगी, तो उनके ऑन-स्क्रीन किरदारों को पचाने में आपको हमेशा दिक्कत आती रहेगी. फिर वे 20-22 साल की नायिकाओं के साथ इश्क लड़ाते हुए आपको विश्वसनीय नहीं लगेंगे, बीस गुंडों को उछल-उछलकर मारते हुए हास्यास्पद लगेंगे और चालीस पार के होकर भी किसी 3 ईडियट्स में 20-22 साल के कालेज स्टूडेंट का रोल आखिर कैसे अदा करेंगे. और अगर वे ये सब नहीं करेंगे, फिल्म के 200-300 करोड़ कमाने का दारोमदार निर्देशक किसके कंधे करेंगे. 100 करोड़ क्लब, 200 करोड़ क्लब और 300 करोड़ क्लब का उद्घाटन कर वहां हमेशा की रिहाइश बना चुके ये तीनों ही खान फिर क्या करेंगे? आर्ट या इंडी फिल्मों में काम तो नहीं ही न करेंगे!
खान त्रयी से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू ये भी है कि भले ही तीनों खान हैं और एक सन् में ही जन्मे हैं (1965), लेकिन तीनों तीन विपरीत दिशाओं का सफर तय करने वाले नायक हैं. तीनों में ऐसा कुछ नहीं है जो एक-दूसरे से मिलता-जुलता हो. न अभिनय को लेकर उनकी एप्रोच, न जिंदगी जीने का तरीका, न प्यार-शादी की उनकी परिभाषा, न बाजार को साधने का फलसफा. शायद इसलिए बाजार और दर्शक उन्हें इतना पसंद करते हैं. क्योंकि तीनों ही एक-दूसरे से विपरीत नायकत्व दर्शाते हैं.
हमारे ऐसे तीन नायक राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार की सुपरस्टार तिकड़ी की भी याद दिलाते हैं. हमारे स्वर्णिम इतिहास की वो सफलतम तिकड़ी जिनकी फिल्में भी सफल होती थीं और वे भी साथ ही सफलता की ऊंचाई छूते थे. उन तीनों के बाद ये तीनों ही हमारी फिल्मों के इतिहास में एक बेहद लंबे अरसे के लिए एक साथ सुपरस्टार बने हुए हैं, और शायद ये एक तरह का रिकार्ड भी है. लेकिन अगर आप अभिनय प्रतिभा को किनारे कर दें, और बाजार को आगे ले आएं, तो खान त्रयी की सफलता का प्रतिशत पुराने जमाने के राज-देव-दिलीप की सफलताओं से कहीं ज्यादा है. इतना ज्यादा कि तीनों अपनी फिल्मों द्वारा मिलकर बालीवुड को आज जितना रेवेन्यू देते हैं, शायद ही इतिहास में कभी किसी ने दिया होगा. या आगे भी कोई दे पाएगा.
फिल्म इंडस्ट्री पर नजर रखने वाली मीडिया शोध कंपनी ओरमैक्स मीडिया द्वारा जारी एक अध्ययन के मुताबिक अगर हम सन् 2000 से लेकर 2014 तक के घरेलू बाक्स आफिस नतीजों पर नजर डालें तो इस दौरान हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को खान त्रयी की फिल्मों ने कुल मिलाकर 4,388 करोड़ रूपए का कारोबार करके दिया है. इसमें से आमिर की फिल्मों ने पिछले चौदह सालों में घरेलू बाक्स-आफिस पर 1,282 करोड़, शाहरुख की फिल्मों ने 1,472 करोड़, और सलमान की फिल्मों ने सबसे ज्यादा 1,634 करोड़ कमाए हैं. जाहिर है तीनों ही घरेलू बॉक्स-आफिस के एवरग्रीन स्टार्स हैं!
ओवरसीज मार्केट में भी तीनों की कोई सानी नहीं है. दुनिया भर में उनकी फिल्मों द्वारा की गई कमाई के आंकड़ों को अगर आप उंगलियों पर गिनना शुरू कर दें (भारत में की गई कमाई मिलाकर) तो ओवरसीज मार्केट में हाल-फिलहाल आमिर पहले, सलमान दूसरे और शाहरुख तीसरे नम्बर पर आते हैं
उनकी बॉक्स-आफिस ग्रीनरी का उदाहरण भी हम देते चलते हैं. आमिर खान की पिछली फिल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ जिसमें उनकी मुख्य भूमिका नहीं थी, भी देश के बॉक्स ऑफिसों पर 100 करोड़ रुपये से ज्यादा कमा चुकी है. इसके पहले आई ‘दंगल’ ने तो रिकॉर्डतोड़ कमाई की थी. यह पहली फिल्म थी जिसने भारत में 350 करोड़ रुपये की कमाई का आंकड़ा पार किया. सलमान खान की पिछली दस ‘बैक-टू-बैक’ फिल्में इसी घरेलू बॉक्स-आफिस पर सौ करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी हैं और ‘सुल्तान’ 300 करोड़ से ज्यादा कमाकर सलमान के लिए सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म है. दिलचस्प बात है कि इस साल जून में रिलीज हुई उनकी ‘ट्यूबलाइट’ की काफी बुरी समीक्षाएं आई थीं फिर भी यह फिल्म सौ करोड़ के क्लब में शामिल है. इस मामले में शाहरुख भी पीछे नहीं हैं, उनकी पिछली पांच बैक-टू-बैक फिल्में सौ करोड़ से ज्यादा धन बरसा चुकी हैं और फिलहाल ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ कमाई के मामले में उनकी सफलतम फिल्म है.
ओवरसीज मार्केट में भी तीनों की कोई सानी नहीं है. दुनियाभर में उनकी फिल्मों द्वारा की गई कमाई के आंकड़ों को अगर आप उंगलियों पर गिनना शुरू कर दें (भारत में की गई कमाई मिलाकर) तो ओवरसीज मार्केट में हाल-फिलहाल आमिर पहले, सलमान दूसरे और शाहरुख तीसरे नम्बर पर आते हैं. आमिर की ‘पीके’ दुनियाभर में पहले ही करीब 800 करोड़ रुपए का कारोबार कर चुकी थी, और पिछले दिनों ‘दंगल’ ने दुनियाभर से करीब 2000 करोड़ कमाकर न सिर्फ खुद को सफलतम हिंदी फिल्म के खिताब से नवाजा है बल्कि आमिर को भी ओवरसीज मार्केट में नम्बर वन बनाया है. वहीं दुनियाभर में 626 करोड़ कमाकर ‘बजरंगी भाईजान’ ने सलमान को इसी ओवरसीज मार्केट का दूसरे नम्बर का प्रभावशाली हिंदी अभिनेता बना दिया है, और कुछ साल पहले तक इस मार्केट के बेताज बादशाह रहे शाहरुख को 422 करोड़ रूपए कमा चुकी ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ ने तीसरे स्थान पर मजबूत स्थायित्व दिया हुआ है.
खान त्रयी पिछले कुछ सालों में फिल्मों के प्रॉफिट-शेयरिंग मॉडल को सफलता से अपनाने में भी सबसे आगे रही है. आज के समय में जब टॉप स्टार्स फिल्मों के लिए आसानी से 30 से 40 करोड़ रूपए मेहनताना मांगते हैं (जो बड़े बजट वाली किसी भी फिल्म का 40 से 50 प्रतिशत बजट होता है), निर्माताओं के पास फिल्म द्वारा कमाए प्रॉफिट को उनसे शेयर करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता है. शुरूआत में ही भारी भरकम पे-चैक देने से अच्छा फिल्म के सुपरहिट रहने पर मुनाफा आपस में बांट लेना और स्टार को ही सह-निर्माता बना लेना उन्हें बेहतर विकल्प लगता है. खान त्रयी का बॉक्स-आफिस पर दबदबा भी इतना भारी-भरकम है कि तीनों ही फीस नहीं लेने और अगर फिल्म हिट हुई तभी प्राफिट में से हिस्सा लेने का रिस्क भी बिना झिझक उठा लेते हैं.
जैसी स्टारडम इस खान त्रयी की है, वैसी अब दुबारा देखना बॉलीवुड के नसीब में नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे गांगुली, सचिन और द्रविड़ जैसी तिकड़ी हिंदुस्तानी क्रिकेट के नसीब में अब नहीं है
इस प्राफिट-शेयरिंग मॉडल को सबसे पहले सफलतम तरीके से आमिर खान ने ही भुनाया था, जब ‘3 इडियट्स’ के लिए उन्होंने कोई फीस नहीं ली थी लेकिन फिल्म के हिट होने पर एक फिक्सड परसेंटेज लेने की बात कही थी. बाद में जब फिल्म ने घरेलू बाक्स-ऑफिस पर 300 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी, ट्रेड विशेषज्ञों के मुताबिक आमिर की झोली में उनकी निर्धारित फीस से कहीं ज्यादा रकम पहुंची थी. इसी तर्ज पर शाहरुख भी ‘हैप्पी न्यू ईयर’ और ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में सह-निर्माता रहने और अपनी लगभग सभी फिल्मों में प्रॉफिट-शेयरिंग मॉडल को अपनाने के बाद वही एप्रोच राहुल ढोलकिया की ‘रईस’ में भी अपनाई थी. सलमान ने भी ‘जय हो’ और ‘किक’ में ऐसा करने के बाद ‘प्रेम रतन धन पायो’ में बिना फीस के ही काम किया था.
खान त्रयी को लेकर आंकड़ों का ये खेल हर साल खेला जाता है लेकिन आंकड़ों से इतर और गंभीर विमर्श के ज्यादा करीब, अब एक नयी चुनौती खान त्रयी का बाहें फैलाकर इंतजार कर रही है. बढ़ती उम्र में ग्रेसफुल तरीके से खुद को बदलना. भले ही अगले दो-तीन सालों के लिए उनके पास अभी से फिल्में तैयार हैं और लोग कहते हैं - इंडस्ट्री में भी और सड़कों पर भी - कि जैसी स्टारडम इस खान त्रयी की है, वैसी अब दुबारा देखना बॉलीवुड के नसीब में नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे गांगुली, सचिन और द्रविड़ जैसी तिकड़ी हिंदुस्तानी क्रिकेट के नसीब में अब नहीं है. लेकिन भले ही अभी भी खान त्रयी के पास पांच-आठ साल हैं अपनी उम्र को ज्यों का त्यों रखने के लिए, लेकिन क्या ये खान त्रयी के लिए संभव हो पाएगा कि जब ढलती उम्र आखिरकार उनके चेहरे और शरीर पर दिखने लगेगी तो वे भी अमिताभ बच्चन के स्तर के परिपक्व रोल कर पाएंगे? क्या जब वे एक्शन हीरो और हीरोगीरी वाला प्यार करने वाले नायक का किरदार करने के काबिल नहीं रहेंगे, कुछ और धमाकेदार कर पाएंगे? उस तरह के मेच्योर किरदार जो उनकी सालों से साधी गई इमेज के साथ नहीं जाएंगे?
आमिर ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि तीनों में वे सबसे बेहतर एक्टर हैं, और वे शर्तिया जानते ही हैं कि 60 पार करने के बाद अभिनय पर आपकी सधी पकड़ ही आपको अमिताभ बच्चन की तरह लंबे वक्त तक अभिनय करवा सकती है. और सफल भी तभी बना सकती है. लेकिन क्या अपनी बनाई इमेज में बुरी तरह जकड़े शाहरुख और सलमान ऐसा कर पाएंगे, और 60 के करीब पहुंचते वक्त भी आज की तरह ही सुपरस्टार कहलाएंगे? देखना दिलचस्प रहेगा. इसीलिए हम देखेंगे!
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