जून 2014 की बात है. पुणे के हडपसर में रहने वाले 28 वर्षीय मोहसिन शेख नमाज़ पढ़कर अपने एक दोस्त के साथ घर लौट रहे थे. तभी अचानक कुछ लोगों ने उन पर हमला कर दिया. इन लोगों ने लाठी-डंडों से मोहसिन को इतनी बुरी तरह पीटा कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई.
मोहसिन के भाई ने इस घटना के संबंध में हडपसर थाणे में शिकायत दर्ज की थी. इस पर कार्रवाई करते हुए स्थानीय पुलिस ने ‘हिंदू राष्ट्र सेना’ नाम के एक संगठन से जुड़े कुल 21 लोगों को मोहसिन की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया. इन लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करते हुए पुलिस ने लिखा, ‘आरोपित हॉकी और डंडे लिए हुए थे. इन लोगों ने मोहसिन पर हमले से कुछ ही समय पहले एक मीटिंग की थी. इस मीटिंग में हिंदू राष्ट्र सेना के अध्यक्ष धनंजय भाई ने कहा था कि फेसबुक पर शिवाजी महाराज की आपत्तिजनक तस्वीरें डालने के लिए मुसलमानों को सबक सिखाया जाना जरूरी है. उनकी गाडियां और उनकी दुकानें तबाह कर देना चाहिए. उन्हें इस इलाके में किसी भी तरह का व्यापार नहीं करने दिया जाए. हडपसर क्षेत्र में हिंदू राष्ट्र सेना का खौफ होना चाहिए.’
आरोपपत्र के अनुसार इस मीटिंग के बाद ही हिंदू राष्ट्र सेना के लोगों ने मोहसिन और उनके दोस्त पर हमला किया था. इस हमले में मोहसिन के दोस्त तो किसी तरह बच निकले लेकिन मोहसिन को पीट-पीट कर मार डाला गया. इस हत्या के आरोप में जब हिंदू राष्ट्र सेना से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी हुई तो मोहसिन के परिवार को न्याय मिलने की पूरी उम्मीद थी. लेकिन ये उम्मीदें अब धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगी हैं. सिर्फ इसलिए नहीं कि मोहसिन की हत्या के कुल 21 आरोपितों में से 14 जमानत पर रिहा हो चुके हैं. बल्कि इसलिए कि बीती 12 जनवरी को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस मामले के तीन आरोपितों को जमानत देने का जो आधार लिया है, वह पूरी न्याय व्यवस्था के लिए ही बेहद चिंताजनक है.
बॉम्बे उच्च न्यायालय की जस्टिस मृदुला भाटकर ने बीती 12 जनवरी को मोहसिन की हत्या के तीन आरोपितों की जमानत मंज़ूर की है. अजय, विजय और गणेश नाम के इन तीन आरोपितों की जमानत के आदेश में जस्टिस भाटकर ने लिखा है, ‘घटना से आधा घंटा पहले एक मीटिंग हुई थी. इससे पहले तक आरोपितों की मृतक (मोहसिन) से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी. मृतक (मोहसिन) की गलती सिर्फ यही थी कि वह दूसरे धर्म का था. मैं इस तथ्य को आरोपितों के पक्ष में देखती हूं. इसके अलावा आरोपितों का कोई भी आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. ऐसा लगता है कि उन्हें धर्म के नाम पर उकसाया गया था जिसके चलते उन्होंने हत्या कर दी. ऐसी परिस्थिति में मैं आरोपितों की जमानत मंज़ूर करती हूं.’
कानून के जानकारों का मानना है कि जस्टिस मृदुला भाटकर के इस फैसले के कई नकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं. इन लोगों का मानना है कि जहां एक व्यक्ति की सिर्फ उसकी धार्मिक पहचान के चलते हत्या कर दी गई वहां यदि न्यायालय इस तथ्य को हत्यारों के पक्ष में देखता है तो यह एक बेहद घातक नजीर बन सकता है. किसी भी उच्च न्यायालय का फैसला उस प्रदेश का कानून बन जाता है. सभी निचली अदालतें उस फैसले को मानने के लिए बाध्य होती हैं.
इस तरह से देखें तो सांप्रदायिक हिंसाओं और नरसंहारों के कई मामलों में अब इस फैसले को बतौर नजीर पेश किया जा सकता है. इस तरह के मामले में ज्यादातर आरोपितों की पीड़ित या मृतक से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होती बल्कि सिर्फ धर्म या सम्प्रदाय के आधार पर ही लोग हिंसा पर उतारू हो जाते हैं. लेकिन हालिया मामले की तरह यदि न्यायालय इस तथ्य को आरोपितों के पक्ष में ही देखने लगे, तो यह निश्चित ही साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने के साथ ही न्याय व्यवस्था को भी पीड़ित के नहीं बल्कि आरोपित के पक्ष में खडा दिखाता है.
जानकारों का यह भी मानना है कि जस्टिस भाटकर द्वारा मोहसिन की हत्या के आरोपितों को जमानत देने में कोई खामी नहीं है, लेकिन इसके लिए उन्होंने जो आधार चुना है, वह बेहद चिंताजनक है. इन लोगों का कहना है कि मोहसिन की हत्या के कुल 21 आरोपितों में से 11 को पहले ही जमानत मिल चुकी थी. ऐसे में इन तीन आरोपितों को जमानत देने का यही एक आधार हो सकता था कि इस मामले के कई सह-आरोपित पहले ही जमानत पा चुके हैं. लेकिन बॉम्बे उच्च न्यायालय ने जिस ‘धामिक उकसावे’ को आधार बनाकर इन तीन आरोपितों को जमानत दी है, वह अन्य मामलों के लिए एक घातक नजीर बनने के साथ ही इस मामले को भी अंततः प्रभावित कर सकता है. कई जानकार मानते हैं कि ऐसा आधार लेकर न्यायालय ने इस मामले में परोक्ष रूप से यह भी स्वीकार कर लिया है कि मोहसिन की हत्या इन्हीं आरोपितों ने की थी.
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