फेसबुक पर मित्र अनंत विजय की श्रद्धांजलि से मुझे मालूम हुआ कि ‘वर्दी वाला गुंडा’ के लेखक वेद प्रकाश शर्मा नहीं रहे. पता नहीं क्यों, एक बार शक हुआ कि ‘वर्दी वाला गुंडा’ सुरेंद्र मोहन पाठक का उपन्यास तो नहीं था. यह उनसे पूछ भी डाला. बाद में यह अफ़सोस होता रहा कि जिस लेखक को बचपन में खूब पढ़ा, उनकी प्रसिद्ध किताब ही याद नहीं रख पाया.

मैं उन आठ करोड़ लोगों में नहीं हूं जिन्होंने ‘वर्दी वाला गुंडा’ ख़रीदी या पढ़ी. (हालांकि इस आंक़डे की वैधता पर मुझे कुछ संदेह होता है- क्या यह उनके प्रकाशक का जारी किया हुआ आंकड़ा है?) लेकिन इसकी वजह यह नहीं है कि लुगदी कहलाने वाले साहित्य से मुझे कोई नाक-भौं-सिकोड़ू परहेज है. मैं ऐसी ढेर सारी किताबों के बीच बड़ा हुआ हूं और जानता हूं कि मेरे भीतर पठन-पाठन की रुचि पैदा करने में उनका भी हाथ रहा. आज भी मैं कोई जासूसी उपन्यास मिल जाने पर पढ़ लेता हूं- कुछ उसी तरह जिस तरह लगभग हर हफ्ते कोई न कोई चालू फिल्म देख लेता हूं जिनमें से कुछ कई सौ करोड़ का कारोबार करने वाली होती हैं. कई बार उनके निर्देशकों के नाम भूल जाता हूं.

जिन लोगों ने गंभीरता से हिंदी के जासूसी उपन्यास पढ़े हैं, वे भी मानेंगे कि वेद प्रकाश शर्मा भले सबसे ज़्यादा बिके हों, सबसे बड़े जासूसी लेखक नहीं थे  

लेकिन कई सौ करोड़ का कारोबार करने वाली फिल्मों का आंकड़ा मुझे इतना अभिभूत नहीं कर सकता कि मैं उन्हें हिंदी या दुनिया की बेहतरीन फिल्मों से बेहतर या महत्वपूर्ण मान लूं. करोड़ों-करोड़ लोगों की तरह मेरे लिए भी वे बस मनबहलाव के साधन हैं जिनका बड़ा हिस्सा सिनेमा हॉल से निकल कर मैं भूल जाता हूं- जैसे टी-20 के क्रिकेट मैचों को हम भूल जाते हैं. बेशक, कुछ फिल्में टेस्ट मैचों की तरह याद रह जाती हैं या मित्रों के साथ बैठने पर उनसे मिले आनंद का ज़िक्र होता है.

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इसलिए इस तथ्य के बावजूद कि हिंदी की किताबें 500 और 1000 कॉपियां बिकते-बिकते हांफने लगती हैं जबकि ‘वर्दी वाला गुंडा’ आठ करोड़ बिका, यह उपन्यास या ऐसे उपन्यास अंततः मुझे फिल्मों और क्रिकेट की तरह मनबहलाव के एक और आयाम भर लगते हैं. एक विराट मनोरंजन उद्योग का अहम हिस्सा जिसमें किताब की सबसे बड़ी कामयाबी यह मानी जाती है कि उस पर फिल्म बन जाए. अंग्रेज़ी के चेतन भगत इस उद्योग का नया और कामयाब पुर्जा भर हैं. निस्संदेह इस उद्योग से भी एक पैमाना बनता है जिससे आप अपने समाज की मनोरचना, उसकी धड़कनों का कुछ जायज़ा ले सकें.

बहरहाल, वेद प्रकाश शर्मा पर लौटें. जिन लोगों ने गंभीरता से हिंदी के जासूसी उपन्यास पढ़े हैं, वे भी मानेंगे कि वेद प्रकाश शर्मा भले सबसे ज़्यादा बिके हों, सबसे बड़े जासूसी लेखक नहीं थे. कम से कम तीन बड़े लेखक ऐसे रहे जिनका क़द वेद प्रकाश शर्मा से ऊंचा रहा. निस्संदेह, इनमें इब्ने सफ़ी सबसे ऊपर हैं जो हिंदी और उर्दू में लगभग समान लोकप्रियता के साथ बिके. हिंदी में उनके गढ़े गए किरदारों, कर्नल विनोद, कैप्टन हमीद और कासिम के रंग भुलाना आसान नहीं है. इसके अलावा वे राजेश नाम के जासूस की कहानियां भी लिखते रहे. बाद में राजेश नाम का यह किरदार कुछ-कुछ बदले हुए रंग में दूसरे उपन्यासकारों के यहां भी किस व्यवस्था के तहत दिखता रहा, यह मुझे नहीं मालूम, लेकिन वह इब्ने सफी की कलम की ही पैदाइश था.

वेद प्रकाश शर्मा की बिक्री का हवाला देकर जो लोग हिंदी के समूचे लेखन को ख़ारिज कर रहे हैं, उनको अपने कहे पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है  

इसी तरह दूसरे ब़डे लेखक ओम प्रकाश शर्मा रहे जिनसे बाद के लेखकों ने ‘क्यू’ लिए. ओम प्रकाश शर्मा शीत युद्ध के दिनों की राजनीति को ध्यान में रखकर लिखते थे और उनके उपन्यासों में भारत और रूस के जासूस एक तरफ़ हुआ करते थे, जबकि अमेरिका, चीन और पाकिस्तान के जासूस एक तरफ. अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मेरी बिल्कुल प्राथमिक समझ उनके उपन्यासों के बीच ही बनी. उगांडा और लीबिया के, कंपाला और त्रिपोली के, वोद्का और शैंपेन के नाम पहली बार उनके उपन्यासों से ही जानें.

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जासूसी दुनिया के तीसरे बड़े लेखक कर्नल रंजीत रहे जिनके जासूस मेजर बलवंत और सोनिया बहुत ही लोकप्रिय थे. उनके उपन्यास बहुत साफ-सुथरे होते थे. वे क़त्ल के रहस्य सुलझाया करते थे. इन सबके बाद ही वेद प्रकाश शर्मा, कुशवाहा कांत और वेद प्रकाश कांबोज या किसी और लेखक का नाम आता है. बहुत ईमानदारी से कहा जाए तो इन सबके जासूसी उपन्यासों में अधकचरापन बहुत होता था- बीच-बीच में सेक्स की छौंक भी. विक्रांत और विशाल सीरीज़ के एक उपन्यास की शुरुआत ही दो पन्ने तक एक लड़की के ख़ुद को निर्वस्त्र करने से हुई थी जो विशाल को लुभाने की कोशिश कर रही है और मर्दानगी यह है कि विशाल उसके झांसे में नहीं आता. इनके लेखक भी दोनों वेद प्रकाशों में कोई एक थे- शर्मा या कांबोज- मैं उसी तरह सही नाम भूल गया हूं जैसे ‘वर्दी वाला गुंडा’ के लेखक का नाम भूल बैठा था.

मैं इन उपन्यासों को हिकारत से नहीं देखता. आखिर उन्होंने हिंदी की अर्धसाक्षर दुनिया को को उस दौर में मनोरंजन का एक साधन सुलभ कराया, जब फिल्में सिनेमाघरों में कई हफ़्ते चला करती थीं, टीवी नहीं हुआ करते थे और इस मोबाइल की तो कल्पना ही नहीं थी जिसमें अब तरह-तरह के क्लिप देखे जा सकते हैं. मेरी शिकायत या मायूसी बस इतनी है कि इनमें से ज़्यादातर ने गहराई हासिल करने की कोशिश नहीं की. अंग्रेजी के जासूसी उपन्यासकारों के मुकाबले ये काफी पीछे छूट जाते हैं, कई बार उनकी नकल करते भी पकड़े जाते हैं- हालांकि यह तुलना कुछ अन्यायपूर्ण लग सकती है क्योंकि अंततः लेखन का वास्ता संसाधन से भी है- शोध और श्रम की सुविधा से भी है.

लुगदी ठहरा दिए जाने वाले कई उपन्यासों में भी ज़िंदगी और समाज की वह पहचान कई बार मिलती है जो गंभीर साहित्य में नहीं मिल पाती, जैसे कई कारोबारी फिल्मों में काफी कुछ गंभीर मिल जाता है  

मेरी यह पुरानी मान्यता रही है कि एक भाषा को हर तरह की चीज़ें चाहिए- उसे जासूसी उपन्यास भी चाहिए और महाकाव्य भी. हिंदी को भी वेद प्रकाश शर्मा और प्रेमचंद दोनों की ज़रूरत है. लेकिन साथ ही यह तमीज़ भी चाहिए कि वह दोनों की उपयोगिता और ज़रूरत में फ़र्क कर सके. प्रेमचंद से वेद प्रकाश शर्मा वाली अपेक्षा न रखे और वेद प्रकाश शर्मा को प्रेमचंद से बड़ा न बताए, क्योंकि प्रेमचंद की किसी किताब की आठ करोड़ प्रतियां नहीं बिकीं (हालांकि क्या पता, अब तक बिक भी गई हों- कोई हिसाब लगाए तो अंदाज़ा मिले!). वेद प्रकाश शर्मा की बिक्री का हवाला देकर जो लोग हिंदी के समूचे लेखन को ख़ारिज कर रहे हैं, उनको अपने कहे पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है.

बेशक, लुगदी ठहरा दिए जाने वाले कई उपन्यासों में भी ज़िंदगी और समाज की वह पहचान कई बार मिलती है जो गंभीर साहित्य में नहीं मिल पाती, जैसे कई कारोबारी फिल्मों में काफी कुछ गंभीर मिल जाता है. दूसरी तरफ गंभीर साहित्य के नाम पर होने वाला बहुत सारा लेखन लुगदी से भी गया-गुज़रा होता है. लेकिन एक सावधान पाठक के भीतर यह निर्मम सलीका भी होना चाहिए कि वह इस अंतर को पहचान सके. वेद प्रकाश शर्मा याद दिलाते हैं कि पढ़ने वाला समाज मौजूद है, यह लिखने वाले पर है कि वह इस समाज को क्या देता है, कितना पढ़वा देता है और किस हद तक उसकी रुचि बनाने या बिगाड़ने का काम करता है.