जब मई, 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों की सरकार बनी तो इसके कुछ महीने बाद ही केंद्रीय वित्त मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली ने राज्यसभा की भूमिका और प्रासंगिकता पर सवाल उठाए थे. उन्होंने कहा था कि इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि क्या राज्यसभा की भूमिका सरकार के कामकाज में अड़ंगा लगाने की भी बन जाती है. इसके बाद राज्यसभा को लेकर काफी सार्वजनिक चर्चा हुई थी. भाजपा के कुछ नेताओं ने तो उसे खत्म करने की संभावना पर भी विचार करने की बात कह दी थी.

यह भी दिलचस्प है कि यह पूरी बहस उन अरुण जेटली की पहल पर हुई थी जो अब तक एक बार भी लोकसभा का चुनाव नहीं ​जीत सके हैं. उनका अब तक का संसदीय जीवन राज्यसभा पर ही आश्रित रहा है. जेटली की पहल पर हुई सार्वजनिक बहस से राज्यसभा तो खत्म नहीं हुई लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा जरूर लग रहा है कि वे और उनकी सरकार हर संवैधानिक तरीके से उच्च सदन को नजरंदाज करने की कोशिश किये जा रहे हैं.

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पहली बार ऐसा तब लगा जब आधार विधेयक को सरकार ने संसद से पारित कराया था. राज्यसभा में इस विधेयक के विरोध और अपने अल्पमत को देखते हुए सरकार ने इसे धन विधेयक के तौर पर पेश किया था. सवैंधानिक प्रावधान यह है कि धन विधेयक को पारित होने के लिए राज्यसभा की सहमति अनिवार्य नहीं है. राज्यसभा उसमें संशोधन का सुझाव तो दे सकती है लेकिन लोकसभा उसे मानने को बाध्य नहीं है. अगर राज्यसभा 14 दिनों के अंदर किसी मनी बिल को लोकसभा को वापस नहीं भेजती है तो इसे पारित मान लिया जाता है.

अब वित्त विधेयक 2017-18 को संसद से पारित कराने के मामले में भी सरकार की राज्यसभा को नजरंदाज करने की चतुराई स्पष्ट तौर पर दिख रही है. इस वित्त विधेयक को जिस तरह से सरकार ने पास कराया, उसे लेकर ​कई तरह के आरोप लग रहे हैं. पहला आरोप तो यही है कि सरकार ने इसे 40 संशोधनों के साथ पास कराया. इस वजह से विपक्ष इसे मिनी बजट कह रहा है. कहा जा रहा है कि अगर इतने ही संशोधन करने थे तो फिर एक फरवरी को बजट पेश करने का क्या मतलब था!

लेकिन इससे भी बड़ा आरोप सरकार पर यह लग रहा है कि उसने वित्त विधेयक को पारित कराने के दौरान राज्यसभा की पूरी तरह से अनदेखी की. ऐसा कहने की एक वजह यह है कि वित्त विधेयक के जरिए सरकार ने कई कानूनों में संशोधनों को भी पारित करा लिया. सरकार ने बड़ी चतुराई से इन संशोधनों को वित्त विधेयक का हिस्सा बना दिया. वित्त विधेयक को मनी बिल यानी धन विधेयक ही माना जाता है. इस वजह से वित्त विधेयक के साथ-साथ इन संशोधनों को पारित कराने में भी राज्यसभा की भूमिका अनिवार्य नहीं रह गई. अगर ये संशोधन वित्त विधेयक का हिस्सा न होते तो मोदी सरकार के लिए इन्हें पारित कराना बेहद मुश्किल था. इनमें से कई संशोधन खासे विवादास्पद थे और भाजपा के पास इन्हें पास कराने के लिए राज्यसभा में जरूरी बहुमत था ही नहीं.

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जब वित्त विधेयक राज्यसभा में गया था तो उसने इसके पांच विवादित बिंदुओं पर संशोधन भी पारित किये थे. लेकिन भाजपा के बहुमत वाली लोकसभा ने इनमें से एक को भी नहीं माना. कुछ लोग सरकार के इस कदम को भी संसदीय ​व्यवस्था की भावना के प्रतिकूल बता रहे हैं.

जानकारों का मानना है कि दो सदनों वाली संसदीय व्यवस्था बनाई ही इसलिए गई थी ताकि एक सदन अगर कोई गलती करे तो दूसरा उसे ठीक कर सके. लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार लोकसभा में अपने बहुमत और कई संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग करके राज्यसभा की भूमिका की लगातार अनदेखी कर रही है.