हाल में केंद्र सरकार ने वित्त विधेयक के जरिए संसद से कई ट्राइब्यूनल्स को खत्म करने का निर्णय पारित करा लिया. विधेयक पर हुई बहस के दौरान विपक्ष ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया. उसका कहना था कि सरकार ऐसे फैसलों के जरिये संवैधानिक अधिकारों पर हमला कर रही है. उधर, सरकार ने इस आरोप को गलत बताया. उसका तर्क है कि ट्राइब्यूनल्स के विलय से विवादों के निपटारे की प्रक्रिया तेज होगी और बेकार का खर्च घटेगा.

क्या वास्तव में ऐसा है? इस सवाल की पड़ताल से पहले ट्राइब्यूनल्स के बारे में कुछ बुनियादी बातें जान लेना जरूरी है. भारत में ट्राइब्यूनल्स की अवधारणा सामने आई बहुचर्चित 42वें संविधान संशोधन से. इस संशोधन के जरिए संविधान में ट्राइब्यूनल्स के लिए दो अनुच्छेद जोड़े गए थे. अनुच्छेद 323ए के तहत प्रशासनिक ट्राइब्यूनल्स के गठन का प्रावधान किया गया और अनुच्छेद 323बी के तहत अन्य विशेष ट्राइब्यूनल्स के गठन की व्यवस्था की गई.

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यह संविधान संशोधन इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान हुआ था. वैसे 42वें संशोधन के तहत इतने ज्यादा संविधान संशोधन हुए थे कि इस संशोधन को कुछ लोग मिनी संविधान भी कहते हैं. हालांकि, बाद में मोरारजी देसाई की अगुवाई में केंद्र की सत्ता में आई जनता सरकार ने 44वें संविधान संशोधन के जरिए 42वें संविधान संशोधन के कई प्रावधानों को हटा दिया था. लेकिन ट्राइब्यूनल्स का प्रावधान मोरारजी सरकार ने भी बने रहने दिया.

संविधान की तरह ट्राइब्यूनल्स की अवधारणा भी अमेरिका जैसे देशों से ही आई है. अन्य देशों की तरह भारत में इनके गठन के लिए मोटे तौर पर दो तर्क दिए गए. पहला तर्क यह था कि सामान्य अदालतों में मुकदमों का बोझ काफी अधिक है इसलिए कुछ खास मामलों को उनके दायरे से अलग कर दिया जाए ताकि उनकी सुनवाई जल्दी से जल्दी हो सके. दूसरा तर्क यह था कि सामान्य अदालतों में जो जज होते हैं, वे कानून के जानकार तो होते हैं लेकिन कई विशिष्ट क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें उनकी विशेषज्ञता नहीं होती. इसलिए ट्राइब्यूनल्स का गठन किया जाए जिनमें कानूनी जानकार के अलावा विषयों के विशेषज्ञों को भी रखा जाए ताकि खास विषयों की जटिलता को समझकर ठीक से निर्णय हो सके. इन्हीं दो बातों को आधार बनाकर भारत में कई ट्राइब्यूनल्स का गठन हुआ.

किसी का काम किसी को

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अब नरेंद्र मोदी सरकार ने कई ट्राइब्यूनल्स को खत्म करने का निर्णय लिया है. वित्त विधेयक पर गौर करें तो इनमें से अधिकांश का काम दूसरे ट्राइब्यूनल्स को दिया जाएगा. लेकिन कई मामलों में यह विलय जिस तरीके से किया जा रहा है वह हैरान करता है.

उदाहरण के लिए दूरसंचार क्षेत्र के विवादों को निपटाने के लिए टीडीसैट के नाम से एक ट्राइब्यूनल काम कर रहा है. अब मोदी सरकार ने निर्णय लिया है कि साइबर संबंधी विवादों को निपटाने के लिए काम कर रहे ट्राइब्यूनल का काम भी इसे दे दिया जाए. यहां तक तो बात समझ में आती है क्योंकि दोनों क्षेत्र आपस में जुड़े हुए हैं. लेकिन हैरानी इस बात पर होती है कि टीडीसैट को ही विमानन क्षेत्र के विवादों को निपटाने वाले ट्राइब्यूनल को खत्म करके इसके काम की जिम्मेदारी दे दी गई है. इस ट्राइब्यूनल की विशेषज्ञता दूरसंचार और इससे संबंधित क्षेत्रों की है. ऐसे में यह ट्राइब्यूनल विमानन क्षेत्र की विशेषज्ञता कहां से लाएगा और इस क्षेत्र के मामलों का निपटान कैसे करेगा, यह एक रहस्य है.

पहले से ही काम के बोझ तले ट्राइब्यूनल्स को दूसरे ट्राइब्यूनल्स को खत्म करके उनका काम सौंपने से सरकार का तर्क खारिज होता है. क्योंकि ऐसी स्थिति में इन ट्राइब्यूनल्स पर काम का बोझ बढ़ेगा और विवादों का निपटारा उतनी तेजी से नहीं हो पाएगा जिसके लिए इनका गठन किया गया था.

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प्रतिस्पर्धा से संबंधित मामलों को देखने वाले ट्राइब्यूनल का काम कंपनी कानून को देखने वाले ट्राइब्यूनल को दे दिया गया है. कर्मचारी भविष्य निधि के विवादों को निपटाने वाले ट्राइब्यूनल का काम औद्योगिक मामलों को देखने वाले ट्राइब्यूनल को दे दिया गया है. राष्ट्रीय राजमार्गों से संबंधित विवादों को निपटाने की जिम्मेदारी वाली ट्राइब्यूनल को खत्म करके सरकार ने इसका काम हवाईअड्डों से संबंधित विवादों को निपटाने वाले ट्राइब्यूनल को दे दिया है.

सरकार की चतुराई

सरकार अगर कोई सामान्य विधेयक लाकर यह निर्णय लेती तो इस निर्णय का राजनीतिक विरोध भी होता और राज्यसभा में इस निर्णय को प्रभावी बनाने वाले विधेयक को पारित कराना भी आसान नहीं होता. क्योंकि राज्यसभा में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास बहुमत नहीं है. लेकिन सरकार ने बड़ी चतुराई से इस निर्णय को वित्त विधेयक का हिस्सा बना दिया. इससे हुआ यह कि यह मनी बिल बन गया और राज्यसभा की भूमिका बेहद सीमित हो गई. राज्यसभा के पास चर्चा करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा. मनी बिल को राज्यसभा से पारित कराने की बाध्यता नहीं होती. ऐसे विधेयक को प्रभाव में लाने के लिए इसे लोकसभा से मंजूरी मिलना ही पर्याप्त होता है.