प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के तीन साल पूरे होने पर उपलब्धियां गिनाने का काम बड़े जोर-शोर से चल रहा है. यह काम न सिर्फ सरकार बल्कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों के स्तर पर भी हो रहा है. भाजपा शासित राज्यों की राज्य सरकारें भी केंद्र सरकार के तीन साल पूरे होने पर विज्ञापन अभियान चलाए हुए हैं.

लेकिन अब जब सरकार के पास इस कार्यकाल में सिर्फ दो ही साल बचे हैं तो इस पर भी चर्चा जरूरी है कि सरकार के पहले तीन साल में वे कौन से तीन मंत्रालय हैं जो सबसे नाकाम दिखते हैं.

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रेल मंत्रालय

जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि रेलवे पर उनका खासा जोर रहेगा. उनके कार्यकाल के शुरुआती महीनों में ही बुलेट ट्रेन जैसी परियोजना को अमली जामा पहनाने का काम शुरू हुआ. सरकार बनने के छह महीने के भीतर हुए मंत्रिमंडल विस्तार में तेजतर्रार माने जाने वाले सुरेश प्रभु को जब प्रधानमंत्री ने रेल मंत्री बनाया तब भी यही लगा कि रेलवे का कायाकल्प करने को लेकर यह सरकार गंभीर है. लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार के तीन साल और सुरेश प्रभु के ढाई साल के कार्यकाल में रेल मंत्रालय इस सरकार के सबसे नाकाम मंत्रालयों में दिख रहा है.

इस तीन साल में भारतीय रेल की पहचान बदलती दिख रही है. जहां पहले इसे एक जनकल्याणकारी माध्यम माना जाता था, वहीं अब इसकी पहचान अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश में लगी सरकारी कंपनी के तौर पर बन गई है. कुछ लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि रेलवे संगठित लूट का माध्यम बन गया है. इस सरकार के कार्यकाल में न सिर्फ रेल किरायों में कई बार बढ़ोतरी की गई बल्कि टिकट रद्द कराने संबंधित नियमों में भी बदलाव किए गए. ऐसे नियम आ गए कि अगर किसी दिक्कत की वजह से किसी की ट्रेन छूट जाए तो उसे रेलवे एक रुपया भी वापस नहीं करेगा जबकि पहले आधा पैसा वापस हो जाता था. अगर किसी का टिकट प्रतीक्षा सूची में ही रह जाए तो भी रेलवे अच्छे-खासे पैसे काट ले रहा है. जानकारों के मुताबिक सबसे अधिक संगठित लूट डायनैमिक प्राइसिंग के नाम पर हो रही है. त्योहारों या खास मौके पर पहले जो विशेष ट्रेनें चलाई जाती थीं, उनमें सामान्य किराया होता था. मोदी सरकार ने इनका नाम बदलकर सुविधा ट्रेन कर दिया और इनका किराया बढ़ा दिया.

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इस सबके बावजूद रेलवे का परिचालन औसत नहीं सुधर रहा. सुरक्षा के मोर्चे पर भी उसका हाल बिगड़ता गया है. पिछले साल दो महीने के अंदर तीन बड़ी रेल दुर्घटनाएं हुई हैं. साफ है कि परिचालन से संबंधित सुरक्षा उपायों पर रेलवे ने वह सब नहीं किया जिसकी जरूरत थी.

माना जा रहा है कि रेलवे के सामने आज सबसे बड़ा संकट भरोसे का है. जिस रेल को कई लोग भारत की जीवन रेखा मानते हैं उसमें सफर करने में लोगों को लगातार होती रेल दुर्घटनाओं की वजह से डर लगने लगा है. जब भी किराये में बढ़ोतरी की जाती है तो कहा जाता है कि सेवाओं को सुधारने के लिए ऐसा किया जा रहा है. लेकिन कुछ चुनिंदा ट्रेनों को छोड़ दें तो अधिकांश गाड़ियां देरी से ही चल रही हैं. स्टेशनों और ट्रेनों के अंदर की सुविधाएं जस की तस बनी हुई हैं.

वित्त मंत्रालय

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वित्त मंत्रालय की पोल खुली पुराने 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट बंद करने के मामले में. इस निर्णय की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी. लेकिन इस घोषणा के बाद जैसे-जैसे समय गुजरा, यह साफ होता चला गया कि न तो वित्त मंत्रालय ने इस निर्णय के परिणामों का ठीक से अध्ययन किया था और न ही इस निर्णय के बाद स्थिति संभालने को लेकर ही उसकी कोई खास तैयारी थी. नोटबंदी के मसले पर इस सरकार को जितनी आलोचना झेलनी पड़ी है, उतना इस सरकार ने किसी और मसले पर नहीं झेली. मोदी सरकार के इस निर्णय का अंतिम नतीजा क्या होगा, इस बारे में तो अभी पक्के तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तय है कि सरकार के नोटबंदी के निर्णय से आम लोगों को इतनी अधिक परेशानी हुई है जितनी हाल के सालों में किसी और निर्णय से नहीं हुई.

इस सरकार के कई मंत्री ऐसे हैं जो अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि वित्त मंत्रालय की ओर से उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है. इस वजह से कई क्षेत्रों का काम प्रभावित हो रहा है. अर्थव्यवस्था में तेजी लाने की सरकार की कोशिशें अभी तक रंग​ लाती नहीं दिख रही हैं. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रैंकिंग में भी भारत की स्थिति में पहले से कोई सुधार आता नहीं दिख रहा है. इन सबके लिए वित्त मंत्रालय को जिम्मेदार माना जा रहा है.

अरुण जेटली की अगुवाई वाले वित्त मंत्रालय की पहचान अब तक के कार्यकाल में एक ऐसे मंत्रालय की बनी है जो कुछ संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए खतरा बन गया है. भारतीय रिजर्व बैंक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. पहले जहां नीतिगत दर तय करने में रिजर्व बैंक को पूरी आजादी थी, वहीं अब सरकार ने इसके लिए एक समिति बना दी. इसमें सरकार के भी तीन नुमाइंदे होंगे. गैर निष्पादित संपत्तियों यानी एनपीए से निपटने के लिए हाल ही में सरकार जो अध्यादेश लाई है, उसके जरिए भी रिजर्व बैंक की स्वायत्ता कम होने की आशंका है. इसके तहत अब सरकार को यह अधिकार मिल गया है कि वह रिजर्व बैंक को एनपीए से निपटने के लिए कदम उठाने का निर्देश दे सके. वित्त मंत्रालय की अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी वस्तु एवं सेवा कर (जीसटी) ही दिख रहा है.

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कृषि मंत्रालय

मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में कृषि मंत्रालय का कामकाज भी सबसे बुरा कहा जा रहा है. भले ही देश के तकरीबन 55 फीसदी लोग आज भी गुजर-बसर के लिए खेती-किसानी पर निर्भर हों, लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस सरकार के लिए किसान सिर्फ वादों और जुमलों में ही हैं.

इस क्षेत्र को लेकर मोदी सरकार का सबसे बड़ा वादा है 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करना. लेकिन सरकार अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि वह किसानों की वास्तविक आमदनी दोगुना करना चाहती है या फिर नॉमिनल आमदनी. नॉमिनल आमदनी का मतलब उस आमदनी से होता है जो महंगाई की वजह से खुद-ब-खुद बढ़ती चली जाती है. वास्तविक आमदनी का हिसाब लगाते हुए आमदनी में कुल बढ़ोतरी में से महंगाई की वजह से बढ़ी आमदनी को घटा दिया जाता है. एनएसएसओ ने माना है कि छह साल में तो वैसे ही किसानों की नॉमिनल आमदनी दोगुनी हो जाती है. अब ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार किसानों की आमदनी को दोगुना करने का इस्तेमाल भी एक जुमले की तरह ही कर रही या उसकी कोई और योजना है.

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कृषि मंत्रालय की नाकामी के लिए इस मंत्रालय का जिम्मा संभालने वाले राधा मोहन सिंह की कार्यशैली को भी जिम्मेदार मानने वाले कई लोग हैं. राधा मोहन सिंह ने अपने बयानों से कभी भी मोदी सरकार की किरकिरी नहीं कराई. न ही उन्होंने कोई और ऐसा काम किया जिससे वे सार्वजनिक तौर पर सरकार को मुश्किलों में डालें. लेकिन बतौर मंत्री उनके कामकाज को लेकर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं.

इस साल मॉनसून ठीक रहा है और फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है. लेकिन जमीनी स्तर पर जाकर देखा जाए तो किसानों की स्थिति में कोई खास बदलाव की उम्मीद नहीं है. इसे एक उदाहरण के जरिए समझते हैं. ​अरहर दाल की उपज देश में अच्छी हुई है. इस वजह से थोक बाजार में अरहर के भाव 50 रुपये प्रति किलो से नीचे चले गए हैं. लेकिन अगर कोई उपभोक्ता यह दाल खरीदने दुकान पर जाता है तो उसे अब भी 110 से 120 रुपये प्रति किलो चुकाने पड़ रहे हैं. किसान जो अरहर उपजाने में श्रम, संसाधन और समय का निवेश कर रहा है उसे बमुश्किल 50 रुपये मिल रहे हैं और जो बिचौलिये हैं उन्हें 60 से 70 रुपये प्रति किलो मिले जा रहे हैं. भारतीय कृषि की यह बहुत पुरानी समस्या है. लेकिन मोदी सरकार भी अब तक इस समस्या को दूर करने में नाकाम ही दिख रही है.