भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर रघुराम राजन को कार्यकाल विस्तार नहीं मिलने पर नरेंद्र मोदी सरकार को काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी. बीते साल सितंबर में राजन का कार्यकाल खत्म होना था. लेकिन इसके काफी पहले से ही खुद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी में राजन को कार्यकाल विस्तार देने के खिलाफ माहौल बनने की बात सामने आने लगी. पार्टी के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तो बाकायदा राजन के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया था.
इसके बाद सरकार अपना कोई निर्णय सार्वजनिक करती, उसके पहले ही जून, 2016 में रघुराम राजन ने अपनी ओर से यह स्पष्ट कर दिया कि वे कार्यकाल विस्तार नहीं चाहते हैं और अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद एक बार फिर से शिकागो बूथ स्कूल में पढ़ाने के काम में लग जाएंगे. उस वक्त हर तरफ यह माना गया कि राजन ने यह निर्णय तब लिया जब उन्हें इस बात का यकीन हो गया कि मोदी सरकार उनका कार्यकाल नहीं बढ़ाने वाली है. इस बात के पक्ष में कई तर्क भी रखे गए. नीतिगत दरों को लेकर अधिकांश मौकों पर वित्त मंत्रालय से उनकी असहमति को भी इसकी एक बड़ी वजह के तौर पर रखा गया. राजन जैसे प्रख्यात अर्थशास्त्री को बतौर रिजर्व बैंक गवर्नर अच्छा काम करने के बावजूद भी कार्यकाल विस्तार नहीं देने की वजह से सरकार को लंबे समय तक विपक्षी दलों, मीडिया और आर्थिक जानकारों की आलोचनाओं को झेलना पड़ा था.
लेकिन जाने-माने पत्रकार करण थापर ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख के जरिये इस पूरी कहानी को एक नए ढंग से हमारे सामने रखा है. थापर के मुताबिक राजन को कार्यकाल विस्तार नहीं देने के लिए मोदी सरकार की अलोचना करके उसके साथ ज्यादती की गई है. थापर की खुद की पहचान मोदी सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकार की रही है. इसके बावजूद वे लिखते हैं कि सरकार तो राजन का कार्यकाल बढ़ाना चाहती थी लेकिन कार्यकाल विस्तार की अवधि को लेकर राजन और उसमे सहमति नहीं बन सकी.
करण थापर ने दावा किया है कि मोदी सरकार चाहती थी कि रघुराम राजन रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर काम करते रहें. वह चाहती थी कि राजन को दो साल का कार्यकाल विस्तार दिया जाए. लेकिन पेंच फंसा राजन के स्तर पर. थापर का दावा है कि राजन जिस शिकागो विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, वहां से उन्हें सितंबर के बाद सिर्फ आठ महीने की ही छुट्टी और मिल पा रही थी. थापर यह संकेत दे रहे हैं कि राजन को अगर आठ महीने का कार्यकाल विस्तार मिल पाता तो वे स्वीकार कर लेते लेकिन दो साल के कार्यकाल विस्तार की शर्त की वजह से वे इसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थे.
उधर सरकार को ऐसा लगा कि आठ महीने के कार्यकाल विस्तार से अस्थिरता का माहौल बन सकता है. इसलिए सरकार इसके लिए सहमत नहीं हुई. थापर यह संकेत भी दे रहे हैं कि अगर राजन को दो साल के कार्यकाल विस्तार के बजाय थोड़ा और लंबा नया कार्यकाल देने का प्रस्ताव दिया गया होता तो शायद वे उसे स्वीकार कर लेते.
करण थापर ने अपनी बात को मजबूत आधार देने के लिए रघुराम राजन द्वारा न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए साक्षात्कार का भी हवाला दिया है. इसमें राजन ने यह संकेत किया है कि उनके और सरकार के बीच कार्यकाल विस्तार की अवधि को लेकर सहमति नहीं बन पाई.
अगर राजन के कार्यकाल विस्तार को लेकर यही स्थितियां थीं, जिनका जिक्र करण थापर कर रहे हैं तो इससे जुड़े कुछ सवाल उठते हैं. पहला सवाल यह है कि अगर ऐसी स्थिति थी तो जिस मोदी सरकार पर राजन के कार्यकाल विस्तार को लेकर इतने हमले हो रहे थे, उसने यह बात किसी भी तरह से सार्वजनिक क्यों नहीं की? अगर आधिकारिक तौर पर यह बात सामने लाने में उसे दिक्कत थी तो अनाधिकारिक तौर पर तो इस बात को सामने लाया ही जा सकता था. सरकारें पहले भी ऐसा करते आई हैं और इस सरकार में भी कुछ मौकों पर इस तरह की चीजें देखी गई हैं. वह राजन से ही इसे स्पष्ट करने का अनुरोध कर सकती थी.
दूसरा सवाल यह उठता है कि राजन ने भी अपनी ओर से ये बातें सार्वजनिक करने की कोई पहल क्यों नहीं की? उन्हें पता था कि इसे लेकर मोदी सरकार की बड़ी किरकिरी हो रही है, चारों तरफ हंगामा बरपा हुआ है, लेकिन फिर भी उन्होंने स्थिति स्पष्ट करने का कोई प्रयास क्यों नहीं किया!
राजन के जाने की स्थिति में माना जा रहा था कि रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर रहे राकेश मोहन रिजर्व बैंक के गवर्नर बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं. लेकिन उनके बारे में भी मोदी सरकार पर यही आरोप लगा कि उन्हें सरकार ने मौका नहीं दिया. करण थापर इस बात को भी खारिज कर रहे हैं. उनका दावा है कि सरकार चाहती थी कि मोहन गवर्नर बनें और उन्हें यह प्रस्ताव देकर इसके लिए राजी करने की कोशिश भी की गई. लेकिन, बकौल करण थापर, राकेश मोहन की अपनी कोई निजी समस्या थी, इसलिए उन्होंने सरकार का इतना बड़ा प्रस्ताव विनम्रता के साथ ठुकरा दिया.
आम तौर पर ऐसे मामलों में पूरा सच जल्दी बाहर निकलकर नहीं आता है. लेकिन जब तक पूरा सच सामने नहीं आता तब तक करण थापर ने रघुराम राजन के मामले में एक नया पक्ष तो लोगों के सामने रख ही दिया है. जो सच हो तो सकता है लेकिन है ही, ऐसा नहीं कहा जा सकता.
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