बहुत साल पहले एक संपादक ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि 15 अगस्त के दिन ऐसा लेख जश्न के अवसर पर मर्सिया पढ़ने जैसा लगता है, जिसकी शुरूआत उसी घिसे-पिटे अंदाज में की गयी हो कि ‘आज़ादी के इतने सालों बाद भी...’. आज़ादी के उत्सव की रस्म अदायगी का यह सवाल अगस्त 1947 की उस उमस भरी रात में शायद बूढ़े गांधी के सामने भी आया होगा. लेकिन शिकायती और निराशावादी ठहरा दिए जाने की कीमत पर भी एक अनाश्वस्त खोजी की तरह वे कलकत्ते के बेलियाघाटा की गलियों में अपने अर्थों वाला स्वराज ढूंढ़ रहे थे. कौमी एकता और असली आज़ादी का मर्म खुद भी समझने की कोशिश कर रहे थे और यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को समझाने की कोशिश भी कर रहे थे.

15 अगस्त, 1947 को दिन के दो बजे कलकत्ते में ही कम्यूनिस्ट पार्टी के कुछ सदस्य महात्मा गांधी से मिलने आए. उन्होंने गांधी से पूछा कि क्या वे आज आज़ादी का उत्सव नहीं मनाएंगे. इस पर उन्होंने कहा था - ‘मैं इस हर्षोल्लास में भाग नहीं ले सकता, जो कि एक दुःखद प्रसंग है.’ ठीक एक दिन पहले यानि 14 अगस्त को यहीं पर एक खचाखच भरी प्रार्थना-सभा में उन्होंने कहा था - ‘कल का दिन विदेशी जुए से मुक्ति के लिए तय किया गया दिन है. इसलिए वह एक महान दिन है. आप बेशक उसे बहुत धूमधाम से मनाएंगे. लेकिन वह ऐसा दिन होगा जिस दिन इन दोनों ही देशों के कंधों पर एक बड़ा भारी बोझ पड़ने वाला है. मैं आप सबसे अनुरोध करूंगा कि कल के दिन आप समस्त भारत के कल्याण के लिए 24 घंटे का उपवास रखें और दिन में प्रार्थना करें और जहां तक बन सके, यह दिन चरखा कातने में बिताएं.’ यह कोई अनायास नहीं था. आज़ादी के लिए जब से यह दिन मुकर्रर किया गया था, तभी से गांधी इस पर लगातार इसी भावना में बोल रहे थे.

आज़ादी से करीब एक महीने पहले 20 जुलाई, 1947 को उन्होंने कहा था- ‘वे कहते हैं कि जिस आज़ादी के लिए आप लड़ रहे थे वह तो मिल गई और राजनीतिक आज़ादी के साथ-साथ आर्थिक आज़ादी भी मिल जाएगी. यह सब कुछ होने पर भी मैं आज़ादी के दिन यानी 15 अगस्त को खुशी नहीं मना सकता. मैं आपको धोखा नहीं देना चाहता, इसलिए मैं जाहिरा यह बात कह रहा हूं. मगर मैं आपसे यह नहीं कह सकता कि आप भी खुशी न मनाएं. आखिर सब काम मेरी मर्जी के मुताबिक थोड़े ही न होते हैं. ...यह न सोचें कि गांधी क्यों नहीं खुशी मनाता. अगर कोई न मनाना चाहे तो कांग्रेस किसी को मजबूर तो करती नहीं, लेकिन मेरी अपनी राय है कि वह दिन खुशी मनाने के लिए नहीं है. ...मैं तो उस दिन आज़ादी मिली समझूंगा जिस दिन हिन्दू और मुसलमानों के दिलों की सफाई हो जाएगी.’ 27 जुलाई को उन्होंने कहा था - ‘जब हमारे दिल में किसी प्रकार का जहर नहीं होगा, तभी तो हम 15 अगस्त का दिन दिल खोलकर मना सकेंगे.’

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कोई कह सकता है कि भारत के विभाजन ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जिन अप्रिय परिस्थितियों को जन्म दिया था, गांधी जी उसके तात्कालिक क्षोभ के मारे ऐसा कह रहे होंगे. लेकिन गहराई से जानने पर समझ में आता है कि केवल इतना भर नहीं था. जैसा कि सुविज्ञ लोग जानते ही होंगे कि गांधी के अर्थों वाले स्वराज का मतलब केवल अंग्रेजों से लेकर भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंप दिया जाना भर नहीं था. तब से करीब चार दशक पहले गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में अपने अर्थों वाली आज़ादी को खोल-खोल कर समझा दिया था.

‘हिन्द स्वराज’ सही अर्थों में एक क्रांतिकारी दस्तावेज था, है और शायद रहेगा भी. खुद को क्रांतिकारी कहने वाले मार्क्समना वामपंथियों ने भी भारत के उच्च-मध्यवर्ग और शासक-वर्ग की वैसी बारीक परतें नहीं उधेड़ी होंगी, जो बिना किसी बैरभाव के गांधी ने हिन्द स्वराज में उधेड़ी हैं. इसलिए भारत में वैकल्पिक समाज और राजनीति को रचने का अहिंसक रास्ता जानने-समझने के लिए ‘हिन्द स्वराज’ आज भी कहीं अधिक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो जाता है. क्योंकि यह गांधी द्वारा तब की गई कई अप्रिय भविष्यवाणियों को आज के भारत में अक्षरशः सही साबित कर रहा है. गांधी के स्वराज में उसका समाधान भी था लेकिन वह आवश्यक रूप से एक कठोर नैतिक और आध्यात्मिक मार्ग था इसलिए सत्ताधीशों, सत्ताकामियों और सत्ता से विहीन लेकिन सत्ता के नव-दावेदारों के लिए कहीं से भी आकर्षक, रुचिकर और स्वीकार्य नहीं था.

गांधी का यह नैतिक रवैया जहां शासक-वर्ग के अहंकार से टकराता था, वहीं यह सत्ता के नव-दावेदारों की महत्वाकांक्षाओं से भी टकराता था. क्योंकि गांधी का स्वराज वास्तव में सत्ता की मूल प्रकृति को ही चुनौती देता था. 15 अगस्त, 1947 को बंगाल के मंत्रियों को अपने संदेश में उन्होंने कहा था- ‘आज से आपको कांटों का ताज पहनना है. अपने भीतर सत्य और अहिंसा का विकास करने का निरंतर प्रयास करें. विनम्र बनें, सहनशील बनें. ...सत्ता के मद से सावधान रहें, सत्ता मनुष्य को भ्रष्ट कर देता है. सत्ता की चमक-दमक के जाल में फंसने से बचें. याद रखें कि भारत के गांवों की गरीब जनता की सेवा के लिए आप पदासीन हैं.’

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दूसरी ओर वंचित लेकिन सत्ताकामी आम जनता को भी आज़ादी का वास्तविक अर्थ बताते हुए उन्होंने 22 मार्च, 1931 को गुजराती ‘नवजीवन’ में लिखा था- ‘मेरी नजर में स्वराज की प्राप्ति के लिए राजा और प्रजा दोनों की शिक्षा-दीक्षा में बहुत अधिक बदलाव की जरूरत है. लुटेरे और लुटनेवाले दोनों अंधेरे में भटक रहे हैं. ये दोनों रास्ता भूल गए हैं. दोनों में से एक की भी स्थिति सहन करने के योग्य नहीं है. पर राजवर्ग और धनिकवर्ग के गले यह बात जल्दी नहीं उतरेगी. एक के गले उतरी तो दूसरे के अपने आप उतर सकेगी, यह सोचकर मैंने रंक या गरीब की सेवा पसंद की है. सब राजा नहीं हो सकते, लेकिन ‘सब’ में तो सभी के समा सकने की गुंजाईश है. इसलिए यदि गरीब को अपने हक का और साथ ही अपने कर्तव्य का भान हो जाए तो, आज ही स्वराज है.’

उसी साल 6 मार्च को भारतीय एवं विदेशी पत्रकारों के साथ एक प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा था- ‘जहां तक मैं समझता हूं पूर्ण स्वराज के पूरे अर्थ को व्यक्त करनेवाला शब्द या शब्द-समूह अंग्रेजी भाषा में नहीं है. इसलिए मैं सिर्फ इसका अर्थ समझा सकता हूं. स्वराज का शब्दार्थ है अपने आप पर शासन करना. ... स्वराज पवित्र शब्द है, वैदिक शब्द है. इसका अर्थ है आत्मशासन या आत्मनियंत्रण, न कि सभी नियंत्रणों से मुक्ति जैसा कि बहुधा ‘इंडिपेंडेंस’ का अर्थ किया जाता है.’ 24 जुलाई, 1921 को गुजराती ‘नवजीवन’ में उन्होंने लिखा था- ‘(प्रचलित अर्थों में) स्वराज का एक अर्थ देश की बहुसंख्यक जनता का शासन भी होता है. जाहिर है जहां बहुसंख्यक जनता नीतिभ्रष्ट हो या स्वार्थी हो, वहां उनकी सरकार अराजकता की स्थिति ही पैदा करेगी, और कुछ नहीं.’

जुलाई और अगस्त 1947 की गहमगहमी में जहां एक तरफ अंग्रेज वाइसराय और भारत के शीर्ष नेता आज़ादी और नई सरकार के गठन की तैयारियों में व्यस्त थे, वहीं गांधी की चिंता के केन्द्र में यहां के मुसलमान, हरिजन, आदिवासी और कश्मीरी थे. भारत के मुसलमानों को लेकर उनकी चिंताएं हम इसी मंच पर अपने पिछले लेखों में लिख चुके हैं. आज़ादी से तीन सप्ताह पहले सुबह 4 बजकर 50 मिनट पर गांधी किसी को पत्र का जवाब लिखते हैं तो उसमें गोंड, कोडा, बेत और मांग जैसे आदिवासियों और हरिजनों की स्थिति पर चिंता जताते हैं. उससे एक दिन पहले 22 जुलाई, 1947 को राममनोहर लोहिया के पत्र के जवाब में उन्होंने कहा था कि नागा जैसे आदिवासियों के साथ जो पाशविक या मिलीटरी के प्रयोग वाली नीति अपनाई गई है उससे हिंद का नाश ही होगा. कहने की बात नहीं है कि आज पूर्वोत्तर से लेकर भारत की हृदयस्थली तक में बसे आदिवासियों के प्रति भारतीय राज्य ने कौन सी नीति अपना रखी है. दंतेवाड़ा और बस्तर में हाल तक सलवा जुडूम से लेकर अब हमारी अपनी सेना और पुलिस के जवानों तक को किस तरह के संघर्ष में झोंककर इसी देश के निरीह आदिवासी बेटे-बेटियों के खिलाफ उनका दुरूपयोग किया जा रहा है.

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16 अगस्त, 1947 को जब उन्हें बताया गया कि 15 अगस्त को कलकत्ते के चित्तरंजन सेवा सदन में एक हरिजन वृद्धा मेहतरानी ने और एक जिला कांग्रेस कमिटी में एक हरिजन बालिका ने तिरंगा झंडा फहराया है, तो उन्होंने इस भावना को स्थायित्व देने की बात की. उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त सभी असमानताओं को मिटाने की बात की. तब से करीब 15 दिन पहले 29 जुलाई, 1947 को उन्होंने कहा था- ‘मैं तो कहता था कि हरिजन की एक लड़की को गवर्नर-जनरल बना देना चाहिए, लेकिन मैं यह मानता हूं कि आज इस हालत में हरिजन की लड़की को गवर्नर-जनरल नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि राजाओं से बात करनी है, और भी कई बड़े-बड़े काम पड़े हैं. हां, जब प्रजातंत्र बन जाएगा तब ऐसा हो सकता है.’

महात्मा गांधी की कश्मीर पर राय

कश्मीर की बात करें तो इस बारे में महात्मा गांधी की दृष्टि उस समय के किसी भी अंग्रेज अधिकारी या भारतीय नेता से ज्यादा सुलझी हुई और दूरदर्शितापूर्ण थी. कश्मीर को लेकर जो हालात उस समय बन गए थे, उनमें गांधी को भी कश्मीर जाने दिया जाए या नहीं, इस पर काफी राजनीतिक उठापटक हुई थी. वाइसराय माउंटबेटन से लेकर पंडित नेहरू, सरदार पटेल और कश्मीर के प्रधानमंत्री रामचंदर काक तक के बीच कई आदान-प्रदान हुए थे. अंत में गांधीजी ने इतना तक कह दिया था कि कोई चाहे न चाहे, लेकिन एक निजी यात्रा के तौर पर तो वह जब चाहे वहां जा ही सकते हैं.

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अपनी ऐतिहासिक कश्मीर यात्रा से दो दिन पहले 29 जुलाई को अपने प्रार्थना प्रवचन में उन्होंने कहा था- ‘कश्मीर में राजा भी है और रैयत भी. मैं राजा को कोई ऐसी बात नहीं कहने जा रहा हूं कि वे पाकिस्तान में न सम्मिलित हों और भारतीय संघ में सम्मिलित हों. मैं इस काम के लिए वहां नहीं जाऊंगा. वहां राजा तो है, लेकिन सच्चा राजा तो प्रजा है. ...वहां के लोगों से पूछा जाना चाहिए कि वे पाकिस्तान के संघ में जाना चाहते हैं या भारतीय संघ में. वे जैसा चाहें, करें. राजा तो कुछ है ही नहीं, प्रजा सबकुछ है. राजा तो दो दिन बाद मर जाएगा, लेकिन प्रजा तो रहेगी ही. कुछ लोगों ने मुझसे कहा है कि यह काम मैं पत्र-व्यवहार के जरिए ही क्यों नहीं करूं. तो मैं कहूंगा कि इस तरह तो मैं पत्र-व्यवहार के जरिए ही नोआखाली का काम भी कर सकता हूं.’

जब पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर छद्म हमले की घटनाएं प्रकाश में आईं तो उन्होंने 26 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान और भारत दोनों को स्पष्ट तौर पर चेताते हुए कहा था - ‘रियासत (कश्मीर) की असली राजा तो उसकी प्रजा है. अगर कश्मीर की प्रजा यह कहे कि वह पाकिस्तान में जाना चाहती है तो कोई ताकत नहीं दुनिया में जो उसको पाकिस्तान में जाने से रोक सके. लेकिन उससे पूरी आज़ादी और आराम के साथ पूछा जाए. उसपर आक्रमण नहीं कर सकते. उसके देहातों को जलाकर उसे मजबूर नहीं कर सकते. अगर वहां की प्रजा यह कहे, भले ही वहां मुसलमानों की आबादी अधिक हो, कि उसको तो हिन्दुस्तान की यूनियन में रहना है, तो उसको कोई रोक नहीं सकता.’

‘अगर पाकिस्तान के लोग उसे मजबूर करने के लिए वहां जाते हैं तो पाकिस्तान की हुकूमत को उन्हें रोकना चाहिए. अगर वह नहीं रोकती है तो सारे का सारा इल्जाम उसको अपने ऊपर ओढ़ना होगा. अगर यूनियन के लोग उसे मजबूर करने जाते हैं, तो उनको रोकना है और उनको रुक जाना चाहिए, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है.’

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बीबीसी के एक प्रतिनिधि ने 15 अगस्त, 1947 को प्रसारित करने के लिए गांधीजी से एक संदेश मांगा था. गांधीजी ने संदेश भिजवाया कि उन्हें कुछ भी नहीं कहना है. हालांकि उनकी यह बेरुखी ही बहुत कुछ कहती थी. फिर भी जब निर्मल कुमार बोस ने तर्क दिया कि यह संदेश विभिन्न भाषाओं में प्रसारित होगा तो गांधीजी ने एक पुर्जे पर बोस को लिखा- ‘मुझे प्रलोभन में नहीं पड़ना चाहिए और उन्हें (अंग्रेजों को) यह भूल जाना चाहिए कि मुझे अंग्रेजी भी आती है’. गांधी जैसे कर्मयोगी मीडिया में बयान देते रहने की अपेक्षा जमीन पर कुछ करने में ज्यादा विश्वास करते थे. जिनकी नियति में तब भी भाषण देना बदा था, वे दिल्ली में लच्छेदार अंग्रेजी में लंबे-चौड़े भाषण दे रहे थे.

लेकिन स्वराज का वह ख्वाब आज भी अधूरा ही दिखता है. न केवल भारत के लिए, बल्कि कि अन्य सभी मुल्कों और समाजों के लिए वह आज भी एक ख्वाब सरीखा ही है. बल्कि इनमें से ज्यादातर देश अपना पाया हुआ अधूरा स्वराज भी विखंडित होते और लुटते देख रहे हैं. कारण यह है कि स्वराज के व्यक्तिगत और आध्यात्मिक आदर्श को न हम समझ पाए, न अपने जीवन में उतारने का आत्मविश्वास हासिल कर सके.

आज अमेरिका, यूरोप, रूस और अन्य महाशक्तियां अपनी सैन्यवादी और डॉलरवादी अहंकार की गुलाम हैं और इसलिए पहले से ज्यादा असुरक्षित हो चुकी हैं. दुनिया के अन्य हिस्से जातीयतावादी अन्याय और हिंसा-प्रतिहिंसा की चपेट में है. उपनिवेशवाद ने अपना रूप बदलकर नए सिरे से न केवल अन्य देशों का, बल्कि अपने देश के भीतर निरीह तबकों का शोषण शुरू कर दिया है. सांप्रदायिकता की बुनियाद पर खड़े हुए राष्ट्र तरह-तरह की हिंसा को बढ़ावा देकर रोज अपने लिए ही भस्मासुर खड़े रहे हैं. इसलिए ऊपर से रंगीन और सभ्य दिखती हो भले, लेकिन लोभ, घृणा, क्रोध, अंधविश्वास, भोगवाद और शोषण के प्रचंड दौर से यह दुनिया आज भी गुजर रही है.

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विनोबा ने एक बार कहा था कि हर क्रांति अपने मूल में आध्यात्मिक ही होती है. उन्होंने मार्क्स तक को शासन से मुक्ति का महान विचार देने वाला महात्मा माना था. महात्मा गांधी का ‘हिन्द स्वराज’ ऊपरी तौर पर राजनीतिक होते हुए भी, अपने मूल में एक नैतिक, आध्यात्मिक और सभ्यतापरक दस्तावेज है. लेकिन आज देश और दुनिया पर जिस तरह राजनीति हावी होती जा रही है, उसमें हमें स्वराज की मूल आत्मा से भटकाने के सारे साधन बहुतायत हो चुके हैं. दृश्यों की बहुलता में सत्य-असत्य का प्रकट भेद जैसे मिटता जा रहा है. गहराई से देख-समझने समझने की अपनी शक्ति को हम अपने हाथों कमजोर करते जा रहे हैं.

ऐसे में व्यक्तिगत स्वराज और सामूहिक स्वराज का वह नैतिक स्वर कहीं दबता, बुझता या लुप्त होता जा रहा है. सफल नेतृत्व और मसीहा हम शायद उन्हें ही मानने लगे हैं जो चुनावी जोड़-तोड़ करके रजोगुणी और अहंकारी सत्ता किसी भी भांति हथिया सकें. इसलिए एक बार फिर से हमें स्वराज के आत्मिक और नैतिक आधार को बार-बार याद करने और याद दिलाते रहने की जरूरत होगी.

कहते हैं कि एक बार महात्मा गांधी और जिद्दू कृष्णामूर्ति की एक छोटी सी मुलाकात लंदन में हुई थी. गांधी ने कृष्णामूर्ति से कहा कि वे पहले भारत की आज़ादी के संघर्ष में भाग लें और जब भारत स्वतंत्र हो जाए तो उसके बाद वह अपने आध्यात्मिक और दार्शनिक अभियान में वापस जुट जाएं. इस पर कृष्णामूर्ति ने गांधी को स्वतंत्रता के बारे में अपना नज़रिया बताया. उन्होंने कहा कि मेरा अभियान संपूर्ण मानव जाति को मुक्त करने का अभियान है. क्योंकि जब तक दुनिया में लोभ है, घृणा है, अंधा स्वार्थ और अंतहीन महत्वाकांक्षा है, तब तक सबका दिमाग गुलाम ही है और वही दुनियाभर में हर तरह की अशांति का मुख्य कारण है.

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यदि ब्रिटिश खुद दिमागी रूप से सचमुच के आज़ाद होते, तो वे भारतीयों को गुलाम न बनाते. दुनिया भर में उपनिवेशवाद न फैलाते. आंतरिक मुक्ति के बिना बाहरी स्वतंत्रता बेकार होगी, क्योंकि वह रोज नई-नई समस्याओं में घिरती जाएगी. या यूं कहें कि जब तक आंतरिक गुलामी रहेगी, तब तक बाहरी आज़ादी खुद अपने लिए और दूसरों के लिए समस्याएं खड़ी करती रहेगी. गांधी आज़ादी की इस व्याख्या से पूरी तरह सहमत थे. स्वयं गांधी की नज़र में भी असल आज़ादी यही थी.

बाकी रस्मी जश्न मनाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते कि भाषण और कदमताल से अलग हम कम से कम इस दिन को भी स्वराज के वास्तविक अर्थों को समझने के एक अवसर के रूप में इस्तेमाल करें.