चीन के सिनेमाघरों में सरकारी पाबंदी के चलते साल भर में केवल 34 अंतरराष्ट्रीय फिल्में रिलीज हो सकती हैं. इनमें से भी ज्यादातर हॉलीवुड की होती हैं और ‘फास्ट एंड द फ्यूरियस’, ‘ट्रांसफॉर्मर्स’ व ‘पायरेट्स ऑफ द केरेबियन’ जैसी इन घिसी-पिटी कहानियों वाली फ्रैंचाइजी फिल्मों में फैंटेसी, मार-धाड़, रफ्तार और नयनाभिराम स्पेशल इफेक्ट्स की ही भरमार होती है. इनके अलावा वहां के 40,000 सिनेमाघरों को हमेशा चाइनीज फिल्में ही दिखानी पड़ती हैं, जिनके हाल हाल-फिलहाल में बेहद खराब चल रहे हैं.

खुद चीनी जनता बरसों से अपनी स्पेशल इफेक्ट्स युक्त एक-सी एक्शन फिल्मों और युवा प्रेमियों की प्रेम-कथाएं देख-देखकर अघा चुकी है. हांगकांग और ताइवान में बनने वाली चीनी भाषी फिल्मों की बिलकुल बात न करते हुए अगर सिर्फ चीन के सिनेमा पर नजर डालें, और कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो 2000 में आई आंग ली की ‘क्राउचिंग टाइगर हिडन ड्रैगन’ और 2002 में आई ‘हीरो’ के बाद शायद ही ऐसी कोई कमाल फिल्म चीन में बनी है जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व ख्याति पाई हो. मौजूदा समय में करोड़ों की सरकारी सहायता के बावजूद, बीजिंग द्वारा नियंत्रित चीनी फिल्म इंडस्ट्री अच्छी कहानियों की कमी से सबसे ज्यादा जूझ रही है.

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यही वो सबसे बड़ी वजह है, जिसके चलते आमिर खान अभिनीत ‘दंगल’ ने चीन में अभूतपूर्व सफलता हासिल की. फिल्म की प्रेरणादायक रियलिस्टिक ‘कहानी’ और उसके अंदर रचे-बसे बेमिसाल जमीनी ‘ड्रामा’ से चीनी दर्शक इस कदर अभिभूत हुए कि अपनी भाषा मैंडरिन में डब न होने के बावजूद उन्होंने सिर्फ चाइनीज सबटाइटल्स के साथ (ज्यादातर थियेटरों में) हिंदी में इसे इतना ज्यादा देखा कि यह चीन के इतिहास में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली पहली गैर-हॉलीवुड फिल्म बन गई. अकेले चीन में ही ‘दंगल’ ने 1,100 करोड़ रुपए से ऊपर की कमाई की और पांच मई 2017 को वहां रिलीज होने के बाद लगातार 2 महीनों तक थियेटरों में अविश्वसनीय भीड़ जुटाई.

रिलीज के बाद ‘दंगल’ ने न सिर्फ साथ रिलीज हुई हॉलीवुड की चर्चित फैंटेसी एक्शन फिल्म ‘गार्जियन ऑफ द गैलेक्सी वॉल्यूम टू’ को अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया बल्कि 13 प्रतिशत स्क्रीन्स के साथ रिलीज होने के एक हफ्ते के भीतर अपनी पहुंच चीन के 31 प्रतिशत स्क्रीन्स तक कर ली. सनद रहे, केपीएमजी-फिक्की इंडियन मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार हिंदुस्तान में मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन थियेटरों को मिलाकर केवल 8,500 स्क्रीन मौजूद हैं, और इस लिहाज से 40,000 स्क्रीन वाले देश चीन में 31 प्रतिशत थियेटरों तक अपनी पहुंच बना पाना बहुत बड़ी और अविश्वनीय बात है.

इसके बाद अगस्त के आखिरी हफ्ते में चीन के आधिपत्य में आने वाले छोटे से हांगकांग में भी ‘दंगल’ रिलीज हुई और लगातार सात हफ्तों तक भीड़ जुटाने के बाद वहां भी उसने अब तक 23 करोड़ रुपए कमा लिए हैं. दिसम्बर, 2016 में हिंदुस्तान में रिलीज होकर 390 करोड़ के आसपास कमाई करने वाली नितेश तिवारी निर्देशित यह फिल्म अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात जैसे हिंदी सिनेमा को पसंद करने वाले पारंपरिक मुल्कों में रिलीज हुई थी.

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इसके बाद उसने चीन, ताइवान और हांगकांग जैसे हिंदी फिल्मों के लिहाज से गैर-पारंपरिक देशों का सफर किया था जहां पहुंचकर ऐसे जलवे बिखेरे, कि न सिर्फ दुनियाभर से 2,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की धन-राशि जुटा ली बल्कि ‘बाहुबली 2’ को पछाड़कर सबसे सफल हिंदुस्तानी फिल्म होने का रुतबा तक हासिल कर लिया.

ऐसे में उस देश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसने एक हिंदी फिल्म की वैश्विक कमाई में 50% से ज्यादा का योगदान दिया है. चीन में ‘दंगल’ की चौंकानेवाली सफलता कई दिलचस्प सवालों का सबब बन रही है जिनके जवाब भविष्य में तो मिलेंगे ही, हम भी उन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे.

जैसे, क्या सच में आने वाली हिंदी फिल्मों के लिए चीन संभावनाओं का एक बड़ा बाजार बनने वाला है, या यह सिर्फ एक तुक्का है जो इस बार एक हिंदी फिल्म का लग गया है? जिस देश से हिंदुस्तान का सांस्कृतिक लेन-देन सीमित रहा है, क्या वहां पर सफलता के झंडे गाड़कर ‘दंगल’ ने चीन को उसकी ही धरती पर धोबीपछाड़ मारा है? या फिर, अंदरखाने की असल बात यह है कि ‘दंगल’ की सफलता से हिंदुस्तान से कहीं ज्यादा फायदा चीन का होने वाला है?

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आवारा (1951) और कारवां (1971) वह शुरुआती हिंदी फिल्में कहलाती हैं जो स्थानीय मैंडरिन भाषा में डब होने के बाद चीन में बहुत पसंद की गई थीं. इसके बाद बाकी के कला क्षेत्रों की ही तरह फिल्मों को लेकर भी चीन और हिंदुस्तान का सांस्कृतिक लेन-देन सीमित हुआ और कुछ अपवादों को छोड़कर चाइनीज कल्चर में हिंदुस्तानी फिल्मों का दखल बेहद कम रहा.

शाहरुख और सलमान के चीनी फैन्स तो बनते रहे लेकिन बड़े स्तर पर किसी भी हिंदुस्तानी सितारे का दखल नहीं रहा. 2011 में आकर जब हिरानी और आमिर की दो साल पहले बनी ‘3 इडियट्स’ (2009) वहां रिलीज हुई, तो राज कपूर के बाद पहली बार चीनी जनता किसी हिंदुस्तानी सुपरस्टार से करीब से रूबरू हुई. ‘3 इडियट्स’ ने चीन के थियेटरों में रिलीज होने के बाद लगभग 16 करोड़ रुपए कमाए लेकिन इससे पहले, विदेशी फिल्मों की रिलीज को लेकर बेहद सख्त रहने वाले चीन की फिल्म क्लीयर करने वाली जटिल प्रकिया से गुजरना आमिर खान ने सिर्फ एक वजह से स्वीकारा था. ‘3 इडियट्स’ के भारत में रिलीज होने के बाद से ही उन्हें लगातार खबर पहुंच रही थी कि चीन का युवा इंटरनेट की मदद लेकर घर बैठे ही उनकी फिल्म की पायरेटिड कॉपी को छककर देख रहा है!

इसके बाद फिर, 2015 में वहां ‘पीके’ रिलीज हुई और उसने 123 करोड़ रुपए का बड़ा कारोबार किया. पहली बार कोई भारतीय सितारा चीन की मौजूदा पीढ़ी के लिए लोकप्रिय होने लगा, जिस वजह से जब ‘दंगल’ को 2017 में चीन में रिलीज करने की बारी आई तो उसकी बहुत ज्यादा तैयारी की गई. परदे के पीछे वाली. चीन की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा प्रभावशाली फिल्म कंपनी, सरकारी ‘चाइना फिल्म ग्रुप कॉर्पोरेशन’ ने न सिर्फ ‘दंगल’ को सपोर्ट किया बल्कि इसको डिस्ट्रीब्यूट करने में भी अहम भूमिका निभाई. आमिर जब प्रीमियर के लिए चीन पहुंचे तो चीन के सुविख्यात सितारों ने उनके प्रीमियर पर पहुंचकर फिल्म का समर्थन किया और चीन की सबसे खूबसूरत कही जाने वाली एक एक्ट्रेस के साथ आमिर ने मंच साझा कर साथ में काम करने का वादा भी दिया. शंघाई में आमिर कॉलेज के छात्रों से रूबरू हुए और एक अन्य शहर जाकर पांडा के साथ फोटो खिंचवाई और फीमेल फैन्स के साथ योगा किया.

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इसके अलावा चीन के अपने सरकारी सोशल मीडिया पर (एफबी की तर्ज पर वीबो, और व्हाट्स ऐप की तर्ज पर वीचैट - जिसपर जब चीन जाकर आमिर ने एकाउंट बनाया तो तुरंत छह लाख फॉलोअर्स उनसे जुड़ गए) ‘दंगल’ का जमकर प्रचार किया गया और कई चीनी सितारों ने इसकी तारीफ में अपनी-अपनी प्रोफाइलों पर कसीदे पढ़े. इन तारीफों को तुरंत उनके प्रशंसकों ने गले लगाया और देखते ही देखते देशभर में ऐसा माहौल बनने लगा जैसा इससे पहले किसी हिंदी फिल्म के लिए चीन में कभी नहीं बना था. चतुर आमिर जैसे हिंदुस्तान में अपनी फिल्म रिलीज से पहले माहौल बनाते रहे हैं, ठीक वैसा ही माहौल उस देश में बनाने में सफल रहे जो आदतन हिंदुस्तानियों से कम प्यार करता है.

यह भी दिलचस्प हुआ कि डांस-रहित छोटी फिल्में देखने की आदत रखने वाली चीनी जनता ने दो घंटे पैंतालिस मिनट लंबी ‘दंगल’ के गानों को भी जमकर पसंद किया!

इन वजहों के अलावा खराब चीनी फिल्मों, एकरसता की मारी हॉलीवुड एक्शन फिल्मों और दक्षिण कोरिया की खूब पसंद की जाने वाली फिल्मों पर हाल ही में चीन में लगे बैन ने भी ‘दंगल’ की भरपूर मदद की. सबसे बड़ी बात, फिल्म रिलीज होने के बाद चीनी दर्शकों ने इसकी कहानी से खुद को इस कदर जुड़ा हुआ महसूस किया कि ‘वर्ड ऑफ माउथ’ ही ‘दंगल’ की सबसे बड़ी पब्लिसिटी बन गया. किसी को ‘दंगल’ और बौद्ध धर्म में समानता नजर आई तो कईयों को लड़कियों द्वारा पितृसत्ता के खिलाफ खड़ा होना लुभाया. जिस कड़क पिता की वजह से फिल्म की आलोचना हिंदुस्तान में हुई, उसी पिता और उसके संघर्षों को देखकर चीनी जनता की आंखें नम हुईं.

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प्रतिष्ठित बीजिंग फिल्म एकेदमी के एक प्रोफेसर ने तो यहां तक कहा, ‘‘दंगल’ की कहानी पूरी तरह चीन की है. जिस तरह फिल्म में एक गांव की लड़की अपनी मेहनत के दमपर विश्व चैंपियन बनती है, चीन की कई महिला एथलीटों की यही कहानी है!’

साफ तौर पर, आमिर की लोकप्रियता और कंटेंट के कॉकटेल के दमपर ही ‘दंगल’ ने चीन में इतिहास रचा है (ऐसा कंटेंट जो चीनी दर्शक आमतौर पर देख नहीं पाता - इमोशनल ड्रामा). ये कॉकटेल न तो बाद में वहां रिलीज हुई ‘बाहुबली 2’ के पास था, और न ही चीनी नायिका वाली इमोशनल ‘ट्यूबलाइट’ के, इसलिए यह कहना सौ फीसदी जल्दबाजी होगी कि ‘दंगल’ ने आने वाली हिंदी फिल्मों के लिए एक बड़े बाजार के कपाट खोल दिए हैं. चीन आने वाले वक्त में भी हिंदी फिल्मों के लिए एक मुश्किल बाजार रहने वाला है जिसका तिलिस्म या तो कोई सयाना आमिर खान, या फिर वे खालिस हिंदुस्तानी कथाएं ही तोड़ पाएंगीं जो सांस्कृतिक रूप से चीनियों को अपने सबसे करीब नजर आएंगीं.

यह भी देखना दिलचस्प होगा कि अपने मुख्य अभिनय से नहीं सजी ऐसी ही एक फिल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ के लिए आमिर, चीन में क्या-कितने-कैसे जतन करते हैं.

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कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि ‘दंगल’ की इस सफलता से ज्यादा फायदा चीन का होने वाला है, हिंदुस्तान का नहीं. अगर आप चीन में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों के विकीपीडिया पेज पर अभी नजर डालेंगे तो पाएंगे कि ऐसी पहली 20 फिल्मों में से 10 फिल्में हॉलीवुड की हैं, नौ चीन की और सिर्फ एक ‘दंगल’ भारत की.

साफ है कि चीनी दर्शक हॉलीवुड से आयातित फिल्मों का दीवाना है और चीन की सरकार भी उनके सेंसर नियमों का झुककर पालन करने वाली इन पलायनवादी फिल्मों को पसंद करती है. इसी वजह से यूएस और चीन के बीच एक फिल्म ट्रीटी भी कायम है जिसके अनुसार ही दोनों देशों के बीच मुनाफे को बांटा जाता रहा है और कितनी हॉलीवुड फिल्में चीन में दिखाई जा सकती हैं, इसपर बाकायदा बातचीत होती रहती है. लेकिन ट्रम्प के सत्ता संभालने के बाद दोनों देशों के बीच बदले समीकरणों की वजह से, और इस वजह से भी कि चूंकि अमेरिका के बाहर हॉलीवुड फिल्मों का सबसे बड़ा बाजार चीन है और इस बाजार पर अब अमेरिका अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहता है, आने वाले वक्त में यूएस-चाइना फिल्म ट्रीटी को लेकर खींचतान होना निश्चित है.

जैसा कि यह लेख कहता है, ऐसे ही समय में सौदेबाजी करते वक्त चीन, ‘दंगल’ जैसी फिल्मों के उदाहरण का फायदा उठाएगा और यह जताने की कोशिश करेगा कि वो मनोरंजन के लिए पूरी तरह हॉलीवुड पर निर्भर नहीं है. भारत-चीन सरहद पर तनाव भी बरकरार रहेगा, हिंदी फिल्में भी निर्यात होती रहेंगी और अमेरिका भी अपनी फिल्मों के प्रदर्शन से चीन में जरूरत से ज्यादा मुनाफा नहीं कमा पाएगा. कई लोगों को लगता है, कुछ ऐसा ही प्लान चीन के खुराफाती दिमाग में इस वक्त चल रहा है!

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दूसरी तरफ कई जानकारों का मानना है कि असल में ‘दंगल’ ने चीन को उसकी ही जमीन पर पटखनी दी है. चीन के रहवासी और अब बैंगलुरू में रहने वाले हुआ जियानलॉन्ग के काफी पढ़े गए इस लेख के अनुसार ‘दंगल’ की वजह से ही चीनी नागरिकों को हिंदुस्तान का ‘असली’ चेहरा देखने को मिला है. इससे पहले तो सरकार के कंट्रोल में रहने वाला चीनी मीडिया हमेशा से ही हिंदुस्तान को एक कमतर देश के रूप में पेश करता आया है. सरकारी प्रोपेगेंडा के दम पर हिंदुस्तान की छवि एक ऐसे पिछड़े देश की बनाई जा चुकी है जहां स्वच्छता और स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा जाता, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का बहुत बुरा हाल है और बलात्कार के मामलों में हरदम बढ़ोतरी होती रहती है. बेहद चतुराई से चीन की सरकार इस ‘पिछड़ेपन’ की वजह भारत में लोकतंत्र के होने को बताती है और रेखांकित करती है कि मौजूदा कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकार की वजह से ही चीन में इतनी खुशहाली और दक्षता है.

लेकिन चीन में ‘दंगल’ की सफलता ने न सिर्फ हिंदुस्तान की इस गलत छवि दिखाने वाले आईने को चटकाने में मदद की है बल्कि यह भी स्थापित किया है कि एक स्वतंत्र देश में ही ‘दंगल’ जैसी फिल्में और उसे बनाने वाले कलाकार पनप सकते हैं. जहां अभिव्यक्ति की आजादी हो, समाज की परेशानियों को व्यक्त करने के लिए पटकथा लेखक स्वतंत्र हों और फिल्मों को चीन के जैसी कठोर सेंसरशिप से न गुजरना पड़ता हो. ऊपर वर्णित लेख में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी शामिल है कि भले ही इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में चीन भारत से 20-30 साल आगे है, लेकिन कला और साहित्य के मामले में हिंदुस्तान से ‘पिछड़ा’ हुआ है.

कुछ ऐसी ही तस्दीक हाल में लिखा न्यूयॉर्क टाइम्स का लेख भी करता है. लेख के अनुसार दोनों ही देश, चीन व भारत, अपने सांस्कृतिक प्रभुत्व को एशिया के दूसरे देशों में भी फैलाना चाहते हैं (जिसे अंग्रेजी में ‘सॉफ्ट पॉवर’ कहा जाता है) लेकिन ‘दंगल’ की सफलता के बाद चीन के माथे पर बल पड़ चुके हैं कि कहीं वो इस दौड़ में पीछे तो नहीं रह गया है. अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सैन्य बल के दम पर चीन भारत से बेहतर हार्ड पॉवर तो बन चुका है, लेकिन अपनी संस्कृति, बौद्ध धर्म से जुड़ी परम्परा और योगा के फैलाव की वजह से भारत एक बेहतर सॉफ्ट पॉवर बनकर उभरा है.

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यह लेख यह भी रेखांकित करता है कि ‘दंगल’ की सफलता ने हॉलीवुड के प्रेम में मदहोश चीन को ‘वेस्ट से ईस्ट’ देखने पर भी मजबूर किया है! न सिर्फ चाइनीज प्रोडक्शन कंपनियां हिंदी फिल्मों का सह-निर्माण करना चाहती हैं, बल्कि भारतीय निर्देशकों और लेखकों को भी लुभाने की कोशिश करना शुरू कर चुकी हैं. यह इसलिए भी हो रहा है क्योंकि हॉलीवुड को मात देने और बराबरी पर खुद की फिल्म इंडस्ट्री खड़ी करने की चीन की महत्वाकांक्षा ने उसकी खुद की फिल्मों को सिर्फ मुनाफे और सतही मनोरंजन तक सीमित कर दिया है. गुणवत्ता और कायदे की कहानी पर जोर देना चीनी फिल्म इंडस्ट्री भूल चुकी है और एक अच्छी कहानी कहने से ज्यादा जरूरी उसके लिए बड़े-महंगे सितारे और स्पेशल इफेक्ट्स हो चुके हैं.

चीन को शायद अंदाजा नहीं है कि ठीक यही महामारी हमारे बॉलीवुड में भी फैल रही है. लेकिन शुक्र है कि हमारे पास अभी भी आमिर खान जैसे चंद स्टार-एक्टर मौजूद हैं, जो काबिल कहानी के लिए सबकुछ न्यौछावर करने को हरदम तैयार रहते हैं!