2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को मिले स्पष्ट बहुमत के बाद से लगातार यह बात महसूस की जा रही थी कि विपक्ष के पास मोदी सरकार को घेरने के लिए कोई एजेंडा नहीं है. विपक्ष की ओर से कोई भी मुद्दा उतने संगठित ढंग से नहीं उठ पा रहा था कि जिससे केंद्र सरकार को परेशानी हो. जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे, तब भी वे लगातार कह रहे थे कि विपक्ष को एजेंडा स्पष्ट करना चाहिए. कुछ दिन पहले ऐसी ही बात बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने कही थी.
लेकिन पिछले दो-तीन हफ्तों में कई ऐसी चीजें हुई हैं जिनसे लगता है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को घेरने के लिए विपक्ष के एजेंडे की तलाश पूरी हो गई है. नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और बतौर प्रधानमंत्री भी अपने विरोधियों के खिलाफ आर्थिक मोर्चे पर अपनी कामयाबियों को बखूबी इस्तेमाल करते आए हैं. 2014 के आम चुनावों में उनके विकास का गुजरात माॅडल बड़ा मुद्दा था और इसके आधार पर लोगों के मन में वे विश्वास जगाने में कामयाब हो गए कि गुजरात की तरह ही वे पूरे देश का विकास कर देंगे.
लेकिन पिछले कुछ समय से जो स्थिति बनती दिख रही है, उसमें खुद नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार आर्थिक मसलों पर ही घिरती नजर आ रही है. इसकी शुरुआत भी प्रधानमंत्री मोदी के गृह प्रदेश गुजरात से ही हुई है. गुजरात में कांग्रेस ने गुजराती में एक अभियान चलाया है जिसका हिंदी में मतलब हैः विकास पागल हो गया है.
इस अभियान के तहत कांग्रेस ने विकास और इससे उपजने वाले असंतोष को बेहद प्रभावी अंदाज में लोगों के सामने रखने की कोशिश की है. बहुत कम समय में इस अभियान ने अच्छी गति पकड़ ली है. आज सोशल मीडिया पर इसके वीडियो खूब शेयर किए जा रहे हैं. गुजरात में हालत यह है कि कल तक जो कांग्रेस भाजपा की रणनीति की प्रतिक्रिया में अपनी रणनीति तैयार करती थी, आज उसी कांग्रेस के इस अभियान की प्रतिक्रिया में भाजपा को जवाबी अभियान तैयार करना पड़ा है जिसमें विकास का गुणगान किया जा रहा है.
नरेंद्र मोदी की विकास की जो अवधारणा रही है, उसके अलग-अलग आयामों को लेकर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष का सामना करना पड़ रहा है. इसमें विपक्ष को ताकत देने का काम खुद भाजपा के नेताओं ने भी किया है. वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने जिस तार्किक ढंग से सरकार की आर्थिक नीतियों पर प्रहार किया है, उसका सटीक जवाब सरकार की ओर से अब तक नहीं आया. सरकार और भाजपा की ओर से यशवंत सिन्हा पर व्यक्तिगत हमले किए गए लेकिन उन्होंने अर्थव्यवस्था को लेकर जो चिंताएं जाहिर की हैं, उन पर तार्किक जवाब नहीं आया.
यशवंत सिन्हा ने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनावों में बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा होगा. जनता दल युनाइटेड के एक खेमे की अगुवाई कर रहे और विपक्ष को एक सूत्र में बांधने की कोशिश में लगे शरद यादव ने भी कहा है कि अगला चुनाव आर्थिक मुद्दों पर लड़ा जाएगा. वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन की खामियों को लेकर विपक्ष पहले से ही सरकार के खिलाफ हमलावर है.
कुल मिलाकर एक ऐसी स्थिति बनती दिख रही है जिसमें नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार आर्थिक मोर्चों पर घिरती नजर आ रही है. जबकि इन्हीं आर्थिक मोर्चों पर प्रभावी काम करना और इसे जनता के सामने मजबूती से पेश करना नरेंद्र मोदी की ताकत रही है. लेकिन विपक्ष की सफलता इस बात पर निर्भर है कि वह कितने लंबे समय तक इस अभियान को संगठित रूप से चला पाता है.
वैसे, विपक्ष में इस मसले पर सकारात्मक माहौल है. कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दलों के नेताओं को लगता है कि अर्थव्यवस्था जिस हालत में पहुंच गई है, उससे निकलने में वक्त लगेगा. उन्हें यह भी लगता है कि अगर अभी से भी केंद्र सरकार पूरी ताकत लगाएगी तो भी 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले स्थिति में सकारात्मक सुधार बहुत मजबूती के साथ नहीं दिखेगा. ऐसे में विपक्ष में इस बात को लेकर सहमति बनती दिख रही है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा से मुकाबले करने के लिए आर्थिक विषयों को ही अहम मुद्दा बनाया जाए.
नरेंद्र मोदी अक्सर विपक्ष पर भ्रष्टाचार को आधार बनाकर हमले करते हैं. लेकिन जिस तरह से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी का मुनाफा मोदी सरकार में 16,000 गुना बढ़ जाने की खबर सामने आई है, उसने विपक्ष को भी भाजपा और सरकार के खिलाफ एक मजबूत हथियार दे दिया है. इस मामले में अंत में क्या निकलकर आएगा, यह अभी कहना मुश्किल है. लेकिन इतना तय है कि विपक्ष को एक ऐसा हथियार मिल गया है जिसका इस्तेमाल वह रणनीतिक ढंग से करता रहेगा. इस मुद्दे ने भाजपा को इतना परेशान कर दिया कि कई दिनों तक चुप्पी के बाद आखिरकार अमित शाह को कहना पड़ा कि उनके बेटे पर लगे आरोप आधारहीन हैं.
इस मामले को लेकर राजनीतिक जानकार कहते हैं कि अब भ्रष्टाचार के मसले पर भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह उतने मुखर नहीं रह पाएंगे जितना पहले रहते थे. क्योंकि अब जब भी वे दूसरों के भ्रष्टाचार का मसला उठाएंगे, तब जय शाह का मामला भी उठेगा. सोमवार को ही गांधीनगर में आयोजित एक रैली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मुद्दे पर बयान देने की मांग की है. जय शाह मामले में केंद्र सरकार के तेजतर्रार रेल मंत्री पीयूष गोयल का नाम भी उलझा है. यह विपक्ष के लिए एक अतिरिक्त हथियार है. कुल मिलाकर काफी समय बाद पहली बार ऐसा लग रहा है कि उसे मोदी सरकार को घेरने के लिए एक एजेंडा मिल गया है.
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