आजकल दुनिया भर में धार्मिक असहिष्णुता और हिंसा को लेकर बहसों में एक सामान्य विचार यह रहता है कि धर्म को असहिष्णुता या हिंसा से नहीं जोड़ना चाहिए. मज़ेदार बात यह है कि यह तर्क अक्सर वे लोग या संगठन देते हैं जिन पर इस तरह के आरोप लगते हैं. कई काफी रूढ़िवादी मुस्लिम संगठन यह कहते हैं कि इस्लाम तो शांति का धर्म है, वहीं कई हिंदुत्ववादियों संगठनों का दावा है कि हिंदू तो असहिष्णु हो ही नहीं सकते. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग एक बात हमेशा दोहराते हैं कि हिंदू सांप्रदायिक हो ही नहीं सकते. यही हाल कमोबेश दूसरे धर्म के लोगों का भी है. इसके समर्थन में वे अपने अपने धर्मग्रंथों से उदाहरण भी देते हैं.
इस सिलसिले में एक क़िस्सा याद किया जा सकता है जो शेख़ फरीदुद्दीन अत्तार की किताब “ तज़किरातुल औलिया “ में है. शेख़ फरीदुद्दीन अत्तार महान सूफ़ी संत और कवि थे और मौलाना जलालुद्दीन रूमी के पूर्ववर्ती थे. “तज़किरातुल औलिया “ गद्य पुस्तक है और इसमें बडे सूफ़ी संतों की जीवनियां हैं. यह प्रसंग ह़जरत बायजी़द बिस्तामी के बारे में है जो बहुत नामी संत हुए हैं.
क़िस्सा यह है कि हज़रत बायजीद के पड़ोस में एक यहूदी रहता था जो हज़रत बायजीद के प्रति बहुत सम्मान रखता था. एक बार हज़रत बायजीद के अनुयायियों ने उससे पूछा कि अगर तुम्हें हज़रत बायजीद के प्रति इतनी श्रद्धा है तो तुम इस्लाम क्यों क़बूल नहीं कर लेते. उसने जवाब दिया - अगर इस्लाम वह है जिसका पालन हज़रत बायजीद करते हैं तो उसके पालन का मुझमें सामर्थ्य नहीं है , और अगर वह है जिसका पालन तुम लोग करते हो तो मैं उसका पालन करना नहीं चाहता.
निष्कर्ष साफ़ है, धर्म वह है जिसका पालन उसके अनुयायी करते हैं. और वे जो भी अच्छा बुरा करते हैं उसके दाग धर्म पर भी लगते हैं. हमारा धर्म अगर सहिष्णु और उदार है तो उसका प्रमाण हमारे आचरण में दिखना होगा , धर्मग्रंथों के उद्धरण देने से काम नहीं चलेगा. धर्म उतना ही अच्छा या बुरा होता है जितने अच्छे या बुरे उसके अनुयायी होते हैं.
धर्मग्रंथों के उद्धरण देने वाले लोग अपनी ज़िम्मेदारी से किनारा कर रहे होते हैं. धर्मों के प्रवर्तक महान लोग थे , इसमें क्या शक है. धर्मग्रंथ भी सभी उदात्त और दिव्य है , इसमें भी कोई बहस नहीं है. लेकिन उनकी महानता के पीछे हम अपनी कमज़ोरियों और अकर्मण्यता को कैसे छिपा सकते हैं ? दिव्य महापुरुष और ग्रंथ उनके अनुयायी कहलाने वालों की कमियों की आड़ कैसे बन सकते हैं ?अक्सर ऐसे प्रसंगों में धर्म का अर्थ उसके प्रवर्तक या बड़े लोग या उसे आधारभूत ग्रंथ मान लिए जाते हैं , लेकिन धर्म उन्हीं तक समित नही हो सकता. उन लोगों और उन ग्रंथों का भी उद्देश्य उस धर्म के अनुयायियों के लिए राह बताना है , तो यह राह और उसपर चलने वाले भी धर्म के हिस्से हुए. प्रवर्तक और आधारभूत ग्रंथों ने किसी धर्म का बीज रोपा , पौधे को खाद पानी देकर कुछ बडा किया , लेकिन उसके अनुयायी उसकी शाखाएँ और पत्ते हैं , अब वे धर्म के प्रतिनिधि हैं और वे धर्म के प्रति जवाबदेह हैं. जब धर्म की सामाजिक , राजनैतिक ताकत या हैसियत बतानी होती है तब तो सभी धर्मावलंबियों की संख्या को बताया जाता है , लेकिन जब नैतिक जवाबदेही का सवाल आता है तो बोझ प्रवर्तकों और धर्मग्रंथों पर डाल दिया जाता है.
सामूहिकता का एक फ़ायदा यह होता है कि व्यक्ति उसके ज़रिये अपनी व्यक्तिगत जवाबदेही और पापबोध से बच जाता है , या नैतिकता और जवाबदेही के सवालों से बच जाता है. इसीलिए भीड़ में कोई सामान्य नागरिक भी क्रूर हो सकता है या किसी क्रूरता का समर्थन कर सकता है , या कम से कम उससे आंख मूंद सकता है. सभी धर्मों में या नैतिकता पर आधरित विचारों में कोशिश यह की गई है कि व्यक्ति न सिर्फ़ अपने कर्म के प्रति जवाबदेह हो बल्कि जिस समूह को अपना कहता है उसके कर्मों के प्रति भी जवाबदेही महसूस करे.यानी मुसलमान अपने धर्म के अतिवादी तत्वों के पाप के बोझ को महसूस करें और किसी अख़लाक़ या जुनैद की हत्या का बोझ सारा हिंदू समाज महसूस करे. अगर यह नैतिक बोध नहीं है तो फिर किसी धार्मिक समूह या समाज का हिस्सा होने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि भगवान कृष्ण , गौतम बुद्ध और हज़रत मोहम्मद का मक़सद यही था. अगर ईसा मसीह सारी दुनिया के पापों का प्रायश्चित करने क्रॉस पर चढ़ गए तो इसलिए नहीं कि उनके अनुयायी अपने पाप की जवाबदेही भी न स्वीकार करें. और अगर हम अपने धर्म में आई बुराइयों का बोझ अपने सिर पर महसूस नहीं करते तो हमें उस धर्म के अनुयायी कहलाने का क्या हक़ है. हमारे दौर में महात्मा गांधी ने बार बार अपने समाज की बुराइयों के लिए खुद प्रायश्चित किया, यह उसी गहरी धार्मिक नैतिकता का सच्चा प्रमाण है.
आम तौर पर अब होता यह है कि जब किसी धार्मिक समूह के किसी व्यक्ति पर कोई अन्याय होता है तो वह समाज एकजुट होकर उसका विरोध करता है , जैसे समूचे समाज पर आक्रमण हुआ हो , लेकिन जब उस समाज का व्यक्ति किसी अन्य समाज के लोगों के साथ अन्याय करता है तो वह समाज चुप्पी साध लेता है जैसे वह उस व्यक्ति का निजी अपराध हो. यह बात सारे धर्मों के बुनियादी तत्वों के ख़िलाफ़ है. किसी भी धार्मिक व्यक्ति को यह स्वीकार करना होगा कि उसके या उसके धर्म के किसी व्यक्ति के आचरण से उसका धर्म उजला या कलंकित होता है. अनुयायियों के आचरण से धर्म को जांचा जाना ग़लत नहीं है, बल्कि वही सही कसौटी है.
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