हमारे यहां ही नहीं सभी देशों में यह माना जाता है कि परंपरा की बात करने वाले लोग संकीर्ण और अनुदार होते हैं. इन दिनों धर्म या परंपरा की दुहाई देने वाले ज़्यादातर लोग इस मान्यता को सही साबित करते भी दिखाई देते हैं. लेकिन क्या परंपरा संकीर्णता और अनुदारता की ही होती है? इस सिलसिले में दो प्रसंगों का ज़िक्र मौजूं हो सकता है.
हिंदू धर्म विचार में दिलचस्पी रखने वालों ने स्वामी अखंडानंद सरस्वती का नाम ज़रूर सुना होगा. बहुतों को उनकी भागवत कथा सुनने का सौभाग्य भी मिला होगा. अखंडानंद जी बीसवीं शताब्दी के सबसे विद्वान और विचारवान संतों में से थे और उनकी लिखने-बोलने की भाषा में गंभीरता के साथ अद्भुत रस भी था. कुछ साहित्यप्रेमियों को शायद याद हो कि अज्ञेय जी ने वत्सल निधि का वृंदावन शिविर उन्हीं के आश्रम में किया था. उसमें अखंडानंद जी ने दो संक्षिप्त सुंदर वक्तव्य भी दिए थे.
अखंडानंद जी रामचरित मानस की कथा भी सुनाते थे. इस कथा में वे मानस में कही गई शिवविवाह की कथा के बारे में भी बताते थे. तुलसीदास जी ने यह कथा शिव-पार्वती के विवाह पर ख़त्म कर दी है. अखंडानंद जी कहते थे कि गोस्वामी जी ने यह कथा यहीं इसलिए ख़त्म कर दी क्योंकि इसके आगे शिव-पार्वती का श्रृंगार है. वे जगत के माता-पिता माने जाते हैं और माता-पिता का श्रृंगार देखना या उसका वर्णन करना पाप है.
इसी सिलसिले में अखंडानंद जी बताते हैं कि महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसंभव’ में शिव-पार्वती के श्रृंगार का वर्णन किया है. लेकिन साधु-संतों ने कालिदास के ख़िलाफ़ न तो कभी प्रदर्शन किया, न उन्हें कभी अधर्मी घोषित किया और न ही उनकी रचनाओं पर कभी पाबंदी की बात की. बल्कि वे कालीदास का सम्मान करते रहे और उनकी रचनाएं भी पढ़ते रहे. आख़िरकार जिसने कालीदास नहीं पढ़ा, उसका संस्कृत का ज्ञान अधूरा है. यहां तक कि वे कुमारसंभव भी पढ़ते हैं. बस उसे पढ़ते वक़्त वह हिस्सा छोड़ देते हैं जहां शिव-पार्वती का श्रृंगार है. क्या ‘सार सार को गहने’ की यह परंपरा हमारी नहीं है?
दूसरा प्रसंग एक दूसरी संस्कृति और दूसरे धर्म से है. ग्यारहवीं शताब्दी में हुए इमाम अबु हमीद अल ग़ज़ाली बहुत बड़े इस्लामी धर्मशास्त्री और सूफ़ी संत थे. इतने बड़े कि अक्सर उन्हें ‘हज़रत मोहम्मद के बाद दूसरा बड़ा मुस्लिम’ कहा जाता है. अल ग़ज़ाली का महत्व इस्लाम की अनेक धाराओं में समन्वय स्थापित करने के लिए है. ख़ास तौर पर परंपरागत धर्म शास्त्र और तसव्वुफ़ (सूफ़ी मत) के बीच संगति बिठाने की जो कोशिश उन्होंने की उसका दूरगामी प्रभाव हुआ. तर्क , भावना, आचरण और धार्मिक रीति-रिवाजों में किसी तरह के अतिरेक से बच कर मध्यमार्ग अपनाने पर उन्होंने ज़ोर दिया. अल ग़ज़ाली ने कई किताबें लिखीं हैं और उन पर भी बहुत सारा काम काम दुनिया की तमाम भाषाओं में हुआ है.
अल ग़ज़ाली की एक महत्वपूर्ण किताब है जिसके शीर्षक का हिंदी अनुवाद होगा - दार्शनिकों का बेतुकापन. यहां दर्शन शब्द अरबी शब्द फ़लसफ़ा के अर्थ में इस्तेमाल किया गया है. फ़लसफ़ा शब्द तब अरब दुनिया में अरस्तू और अफ़लातून के यूनानी दर्शन के लिए इस्तेमाल होता था, और इसके विद्वान फ़लसफ़ी कहलाते थे. इस दर्शन का तत्कालीन अरब दुनिया पर काफ़ी प्रभाव था. अरब विचारक इब्न सीना (एवेसीना ) और इब्न रुश्द (एवेरिऑस) का पश्चिमी दर्शन के इतिहास में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है.
अल ग़ज़ाली ने फ़लसफ़े के विचारों का खंडन अपनी किताब में किया है. हालांकि ऐसा लगता है कि यह खंडन कुछ वैसा ही था जैसा आदि शंकराचार्य ने बौद्ध विचारों का किया. शकंराचार्य ने बौद्ध विचारों का खंडन करते हुए उसके बहुत सारे तत्वों को अपने विचारों में शामिल कर लिया. इसकी वजह से उन्हें अक्सर ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ यानी छुपे हुए बौद्ध कहा जाता है. इसी तरह अल ग़ज़ाली के प्रभाव से यूनानी दर्शन के कई हिस्से जैसे तर्कशास्त्र (लॉजिक) इस्लामी धर्मशास्त्र के स्थायी हिस्से भी बन गए.
बहरहाल, फ़लसफ़े का विरोध करने से पहले तैयारी के तौर पर अल ग़ज़ाली ने फ़लसफ़े पर एक निष्पक्ष किताब भी लिखी – ‘फलसफियों के मक़सद’. वे दार्शनिकों के विचारों की आलोचना करने से पहले उन्हें ठीक से समझना चाहते थे. दिलचस्प बात यह है कि यह किताब सिर्फ़ अरब दुनिया में नहीं बल्कि यूरोप में भी यूनानी दर्शन की एक प्रामाणिक किताब की तरह लोकप्रिय हुई. इसके तत्कालीन यूरोपीय भाषाओं में भी कई अनुवाद हुए. यानी अल ग़ज़ाली को जिन विचारों का खंडन करना था उनको भी उन्होंने इतनी प्रामाणिकता और निष्पक्षता से प्रस्तुत किया कि वह किताब उन विचारों के समर्थकों में ही लोकप्रिय हो गई. अपने विरोधी विचारों के प्रति ऐसी ईमानदारी और निष्पक्षता क्या हमारे दौर में दिखती है?
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