पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया ने हमारे लिए कई शब्दों के अर्थ बदल दिए हैं. जैसे सेकुलर को शेखुलर या सिकुलर बना दिया गया है और लिबरल होने का अर्थ हो गया है देश, धर्म और संस्कृति का विरोधी होना. हालत यह हो गई है कि इन शब्दों को अब अपशब्दों की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है.

लिबरल का मतलब है उदारवादी. यानी दूसरों के विचारों और व्यवहार का सम्मान करने वाला. और ऐसा कोई भी संवेदनशील व्यक्ति करता है. अगर अर्थशास्त्र के नज़रिए से देखा जाये तो लिबरल होने होने का मतलब है निजी संपत्ति और समृद्धि का हामी होना. व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों का हिमायती होना. और एक लोकतंत्र भी इसकी ही वकालत करता है. फिर क्यों लिबरल्स या उदारवादियों को आज इतनी नकारात्मकता के साथ देखा जाने लगा है?

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इस सवाल के दो संभावित जवाब हो सकते हैं. एक तो दक्षिणपंथियों ने उदारवाद को वामपंथ का हथियार मानते हुए उसे संदेह के घेरे में लाने के लिए उसकी विश्वसनीयता पर लगातार हमले किए हैं. दूसरा यह कि कुछ मौकापरस्त लोगों ने उदारवादिता का चोगा पहनकर एकतरफा और कुछ ऐसा नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की है जिससे आम जनता का उदारवाद पर से विश्वास उठता जा रहा है.

भारत में अगर उदारवाद की बात करें तो इसके साथ हुई सबसे बड़ी दुर्घटना थी इसका लेफ्ट यानी वामपंथियों के शिकंजे में चला जाना. भारत में वामपंथी उदारवादियों की स्थिति पर लिखे एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता लिखते हैं, ‘हमारी राष्ट्रीय विचारधारा हमें हमारे स्वतंत्रता आंदोलन से मिली, जो कि बहुत उदारवादी था. कांग्रेस का राजनीतिक क्षितिज तब इतना बड़ा था कि उसमें न सिर्फ वामपंथी और दक्षिणपंथी, दोनों तरह के उदारवादियों के लिए जगह थी, बल्कि उनकी आपसी बहस के लिए एक बौद्धिक वातावरण भी मौजूद था. याद रखा जाए कि सरदार पटेल नेहरू के नंबर दो थे और उनकी कैबिनेट में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लिए भी जगह थी. लेकिन अगले दो दशकों में दक्षिणपंथी आवाज़ों को नेहरू ने कलात्मक रूप से और इंदिरा ने क्रूरता से दबा दिया.’

ऐसा होने से दो बातें हुईं. एक सेंटर के करीब रहने वाले वाला राइट लिबरल उससे दूर होकर अधिक दक्षिणपंथी हो गया. दूसरा उदारवाद सिर्फ लेफ्ट की बपौती बनता चला गया. इसने उन्हें एक किस्म के गुरूर से भर दिया. ऐसा सिर्फ इन विचारधाराओं के प्रतिनिधियों के साथ ही नहीं हुआ, उन्हें सुनने, मानने वालों के साथ भी हुआ.

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शेखर अपने लेख में लेफ्ट लिबरल बुद्धिजीवियों की तुलना उन उच्चकोटि के ‘ब्राह्मणों’ से करते हैं जो अपने अलावा इस वर्ग में किसी को कोई जगह नहीं देना चाहते. उनके मुताबिक राजधानी दिल्ली के सबसे मंहगे इलाकों में रहने वाला, मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा होने वाला यह समूह खुद को इतना विशिष्ट मानता है कि इसके दरवाज़े उनके लिए भी खुले नहीं हैं, जिनके सरोकारों की वकालत के दम पर ये खुद को विशिष्ट कहने का दम भरते हैं. दरअसल आज़ादी के बाद के सालों में लेफ्ट लिबरल्स के इस तबके का नज़रिया और पहचान लगातार सभ्रांतवादी होते गये. ठीक इसी क्रम में जनसाधारण में इनकी विश्वसनीयता भी कम होती गई.

इलीटिस्ट या सभ्रांतवादी होने के अलावा अपने नज़रिए को लेकर यह तबका इतना सख्त और आत्मसंतुष्ट माना जाता है कि रेखा के दूसरी ओर की चीज़ों को या तो साफ-साफ देख नहीं सकता, या देखना नहीं चाहता. उस तरफ के लोगों को यह अपने साथ लेना भी नहीं चाहता है. यही वजह है कि वामपंथी बुद्धिजीवियों का यह तबका हमेशा अल्पसंख्यक ही रहा है. इसकी एक वजह यह भी है कि इनके पास जनसाधारण तक पहुंचने की भाषा भी नहीं है. भाषा से अभिप्राय सिर्फ अंग्रेजी से नहीं है. वेस्टर्न मॉडर्निटी से आई इनकी भाषा भारत आधारित होने की बजाय यूरोप आधारित है. विदेशी विश्वविद्यालयों से निकला इस तबके का बड़ा हिस्सा पश्चिम से इतना प्रभावित है कि कभी मॉडर्निटी तो कभी सेकुलरिज़्म के नाम पर ये लगभग हर उस चीज़ को नकार देता है जो भारतीय है. कम से कम बहुसंख्यक भारतीय जनमानस तक यही संदेश जाता रहा है. उदाहरण के लिए हम पिछले अक्टूबर में साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा की उस फेसबुक पोस्ट को याद कर सकते हैं जिसमें उन्होंने छठ के दौरान बिहार की महिलाओं की नाक तक सिंदूर लगाने की परंपरा पर कटाक्ष किया था.

इन सभी वजहों से लिबरल्स पर भारतीय संस्कृति के दुश्मन होने के आरोप भी लगते रहे हैं. लेकिन इनके लिए संकट का सबसे बड़ा समय साल 2014 में केंद्र में दक्षिणपंथी सरकार बनने के बाद शुरू हुआ. वरिष्ठ शिक्षाविद् शिव विश्वनाथन ने एक आलेख में लिबरल्स की कहानी को समझाते हुए लिखा है कि शुरूआत में जब देश का संविधान बना तब उदारवाद को उसमें खास जगह दी गई. फिर समाजवाद का दौर आया, लेकिन नेहरू के समय में भी उदारवाद का असर रहा. ‘फिर उदारवाद ने खुद को किसी तरह धर्मनिरपेक्षता और कुछ कमज़ोर से विश्वबंधुत्व के रूप में बचाया, पर तब यह उदारबाद नीतियों की शक्ल में कम बचा था, टेबल मैनर्स या कर्मकांड की शक्ल ज़्यादा ले चुका था. उसके पास राजनीतिक मजबूती नहीं बची थी. इसके राजनीतिक रूप से खुद को सही साबित करने के पाखंड और कर्मकाडों ने, भारत जैसे धार्मिक देश में धर्म के प्रति इसके तिरस्कारपूर्ण रवैये ने नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए ज़मीन तैयार कर दी.’

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एक और आलेख में शिव विश्वनाथन ने इस संकट के बारे में लिखा कि लेफ्ट लिबरल्स ने भारतीय मध्यवर्ग को उनकी परंपराओं और विश्वासों को लेकर शर्मिंदा किया, नीचा दिखाया. उनके धार्मिक होने को लगभग सांप्रदायिक होना करार दे दिया. सरकार बनाने के बाद दक्षिणपंथी नेताओं ने उन्हें इस शर्म से बाहर निकालते हुए यकीन दिलाया कि उनकी परंपरा और विश्वास सर्वश्रेष्ठ हैं. और उनका दिल जीत लिया. इसके बाद से न सिर्फ लेफ्ट लिबरल्स एक कोने में सिमट गए, बल्कि भारत ने लिबरल राइट का उदय होते हुए भी देखा. हां, लिबरल राइट. याद रहे कि 2014 में स्वराज्य पत्रिका के दोबारा शुरू होने को दक्षिणपंथी उदारवाद के उदय की रौशनी में देखा गया.

लेकिन लेफ्ट लिबरल्स ने इससे कोई सबक नहीं लिया. 2014 के बाद से यह तबका ज़मीनी बहसों को शुरू करने के बजाय या तो ‘हमने तो पहले ही कहा था’ वाले गीत को बार-बार दोहराने में अपनी ज़मीन तलाशता नज़र आया है. या फिर दक्षिणपंथियों के कारनामों पर अवार्ड वापसी या ‘नॉट इन माइ नेम’ जैसी प्रतिक्रियाएं देता नज़र आया है. आज बहुसंख्यक भारतीय जनमानस दक्षिणपंथियों के जयघोष में अपने विश्वास और पहचान का आधार तलाश रहा है. लेकिन तब भी अपने लिए विदेशी स्कॉलरशिप्स और यात्राओं की जुगाड़ में लगे लेफ्ट लिबरलों के पास कोई नया नैरेटिव, कोई ज़मीन से जुड़ी तथ्यपरक बहस नहीं है. कई लोगों को उनकी आवाज और अस्तित्व आज खाली बरतन से बजते दिखाई देते हैं.

ऐसे में बीच में खड़े कई लोगों का मानना है कि जब तक वे लिबरलिज़्म का भारतीय संस्करण तैयार नहीं करेंगे, अपनी पहचान और विचारधारा को भारत के अतीत से जोड़कर नहीं देखेंगे, तब तक वे भारत की राजनीति और समाज में अपने लिए कोई प्रभावी स्थान नहीं बना पाएंगे. इस समय भारत के लेफ्ट लिबरल्स को बेल्जियम में पैदा हुए भारतीय ज्यां द्रेज़ जैसे लोगों से सीखने की ज़रूरत है. उन्हें समझने की जरूरत है कि बदलाव और प्रासंगिकता कैंडल मार्च निकालने या फेसबुक कैंपेन चलाने से नहीं, जनता और ज़मीन से जुड़कर काम करने से आते हैं.