भोपाल के भारत भवन का अब तो काफी सरकारीकरण हो चुका है, फिर भी वह बहुत ख़ूबसूरत जगह है. जब वह शुरू हुआ था तब तो वह कलाओं और साहित्य का एक ऐसा अनोखा घर था जिसमें बड़ी सुरुचि और कल्पनाशीलता दिखती थी. उसमें भी ख़ासकर ‘रूपंकर’ म्यूज़ियम की अवधारणा बिलकुल अलग और नई थी. उसके निर्देशक चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन का मानना था कि सिर्फ़ कथित आधुनिक कला को ही हमारे दौर की प्रतिनिधि कला क्यों माना जाए. लोक और आदिवासी कलाएं भी हमारे समकालीन यथार्थ की उतनी ही सच्ची प्रतिनिधि हैं, इसलिए उन्हें भी आधुनिक कला के बराबर का ही दर्जा मिलना चाहिए. इसके पीछे स्वामी का यह विचार था कि जनजातीय समाज के लोग हमसे पिछड़े या हेय नहीं हैं बल्कि ‘अलग’ हैं, इसलिए उनके साथ बराबरी का और सम्मानपूर्ण रिश्ता शहरी समाज का होना चाहिए.

इसी नज़रिये से भारत भवन में दो कला गैलरियां साथ साथ बनाई गईं. एक में आधुनिक कलाकृतियां थीं दूसरे में मध्यप्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों के कलाकारों द्वारा बनाई गई कलाकृतियां. इस दूसरी गैलरी के लिए कलाकृतियां इकट्ठा करने के लिए प्रदेश के युवा कलाकारों की टीमें अलग अलग क्षेत्रों में भेजी गईं. इस दौरान जो कुछ विशेष प्रतिभाशाली कलाकार मिले , उन्हें भारतभवन में अतिथि कलाकारों की तरह आमंत्रित किया गया. इन कलाकारों और शहरी कलाकारों ने साथ साथ काम करते हुए एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा.इस सांस्कृतिक आवाजाही से हम जैसे लोगों को भी बहुत सीखने को मिला जो इस परियोजना से किसी रूप में जुड़े थे.

इस सिलसिले में एक क़िस्सा याद आता है जो खुद स्वामी ने सुनाया था. कुछ आदिवासी कलाकारों का एक समूह भारत भवन में बतौर अतिथि कलाकार आया था. उन लोगों में कुछ ओझा, गुनिया भी थे जो झाड़फूंक और दवादारू से इलाज भी करते थे. उसी समूह का कोई सदस्य बीमार हो गया. उन लोगों ने स्वामी से कहा कि उसे किसी डॉक्टर को दिखाने का इंतज़ाम करें. स्वामी ने मज़ाक़ में कहा कि अरे, आप खुद ही इलाज करते हैं, तो डॉक्टर की क्या ज़रूरत है. उन लोगों ने कहा - हमारे इलाज हमारी दुनिया में चलते हैं. यह आपकी दुनिया है , इसमें तो आपके इलाज ही चलेंगे, इसलिए डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है.

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पिछले दिनों मानव संसाधन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के सिद्धांत का जिस तरह विरोध किया, उससे यह प्रसंग नए सिरे से याद आया. उन आदिवासियों की बात के पीछे जो नज़रिया था, उसे समझने से हमारी बहुत सारी समस्याओं का हल हमें नजर आने लगेगा. डार्विन के सिद्धांत का विरोध का हमारे यहां तो सौभाग्य से कोई बड़ा सिलसिला नहीं है, लेकिन पश्चिमी समाज में तो डार्विन का सिद्धांत आने के बाद से विरोध चल ही रहा है. विरोध करने वालों की दलील है कि बाइबिल में सृष्टि के निर्माण का जो वर्णन है, उससे यह मेल नहीं खाता. उनका कहना यह है कि बाइबिल का वर्णन सही है तो डार्विन का सिद्धांत ग़लत ही होगा. अमेरिका में ख़ास तौर पर काफी लोग डार्विन के विरोधी हैं. वैसे अमेरिका में बड़ी तादाद में ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि इन्सान चांद पर नहीं पहुंचा है और चांद पर पहुंचने की बात धोखाधड़ी है.

भारत में डार्विन का सिद्धांत बहुत पहले से पढ़ाया जा रहा है और इसका कोई बड़ा विरोध कहीं नहीं हुआ, हालांकि हमारे धर्मग्रंथों में सृष्टि का जो वर्णन है, उससे उसका मेल नहीं बैठता. इसकी वजह भारतीय समाज का वह सहज विवेक है जो उन आदिवासियों की बात में नजर आया था. आम भारतीय की समझ यह है कि किसी एक घटना का एक ही सच हो यह ज़रूरी नहीं है. सच क्या है यह उसके संदर्भों पर निर्भर करता है. इसलिए वह मानता है कि धर्म का सच अलग होगा और विज्ञान का सच अलग होगा, इसे लेकर सिरफुटव्वल करने की ज़रूरत नहीं है. जहां विज्ञान की बात होगी तो डार्विन का सिद्धांत ही मान्य होगा, जहां भागवत कथा होगी वहां पुराण की कथा की जगह है, बल्कि हमारे यहां हर पुराण में सृष्टि के आरंभ का वर्णन अलग-अलग है. और जब हम वासुदेवशरण अग्रवाल जैसे विद्वानों को पढ़ते हैं तब हमें समझ में आता है कि भले ही वे वैज्ञानिक सत्य न हों लेकिन सत्य के दूसरे आयामों को खोलते हैं

यह वैचारिक बहुलता का स्वीकार शायद हमारे देश समाज की विशेषताओं से आया होगा क्योंकि हमारे देश में ही भूगोल , मौसम, भाषा, संस्कृति, रंगरूप की विभिन्नताएं इतनी ज्यादा है कि सहज ही यहां का आदमी बहुलता को एक प्राकृतिक नियम मान कर चलता है. इसके विपरीत यूरोप के लगभग सभी देशों में एक जैसा मौसम, एक जैसा भूगोल और एक जैसे इन्सान पाए जाते हैं. इस वजह से भी उन्हें एक घटना का एक ही सच मानने की आदत है. वे मानते हैं कि अगर किसी घटना के बारे में एक बात सच है तो अन्य सभी बातें झूठ होंगी. इसीलिए जब वहां चर्च की चलती थी तो हर जगह चर्च द्वारा प्रमाणित बात ही सही मानी जाती थी. जब विज्ञान ने चर्च को अपदस्थ कर दिया तो अब विज्ञान की बात ही सही मानी जाती है, भले ही कुछ अमेरिकी अब भी पुरानी धारणा पर डटे हों.

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पश्चिमी विचार के इस इकहरे स्वरूप का नुक़सान दुनिया को उठाना पड़ा. उपनिवेशवाद इसका सबसे बुरा पहलू था. उपनिवेशवाद के पीछे वैचारिक अवधारणा यही थी कि सिर्फ़ यूरोपीय सभ्यता ही सही सभ्यता है और अन्य सभी सभ्यताएं और संस्कृतियां वास्तव में अविकसित और पिछड़ी हुई हैं और इनका उद्धार यूरोपीय सभ्यता जैसा बनकर ही होगा. पर्यावरण का नुक़सान भी विकास की इकहरी लकीर पीटने से ही हुआ. लेकिन इस वैचारिक बनावट का फ़ायदा यह हुआ कि जब वे विज्ञान का राह पर चले तो उन्होंने उस दिशा में बड़ी तरक़्क़ी की, और अब इसी राह पर चलते हुए वे वहां आ पहुंचे जहां उन्होंने पाया कि बहुलता प्रकृति का नियम है.

दूसरी ओर, हम पश्चिम के पुराने ढर्रे की राह पर चलकर बहुलता को ख़त्म कर रहे हैं. भारतीय संस्कृति पर सबसे ज्यादा शोर करने वाला एक वर्ग है जो मानता है कि हर मुद्दे पर उसका ही विचार रहे, बाक़ियों को बने रहने का अधिकार नहीं है. वह नहीं मानता कि समाज में सच के अनेक रूपों और संस्करणों की जगह होनी चाहिए क्योंकि वे उस सच के अनेक पहलुओं को खोलते हैं. एक क़िस्म का धर्म, एक क़िस्म की संस्कृति, एक विचारधारा के अलावा अन्य को वह कमतर ही नहीं बल्कि देश और समाज के विरुद्ध मानता है जबकि विविधता का अर्थ है समृद्धि और सुंदरता. यह भी अजीब है, भारतीय संस्कृति की बात करने वाले लोग वास्तव में उपनिवेशवाद की विरासत ढो रहे हैं.