अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनावों में कुछ आप्रवासी भारतीयों ने रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप को समर्थन देने की घोषणा की थी. ट्रंप ने आप्रवासी भारतीयों के एक सम्मेलन में शिरकत भी की थी जिसे उनके समर्थन में आयोजित किया गया था. इन आप्रवासी भारतीयों का विचार यह था कि ट्रंप इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपनाएंगे, और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भी सख़्ती करेंगे, सो वे अपने लिए ज्यादा मुफ़ीद राष्ट्रपति होंगे.
काफी आप्रवासी भारतीय अमेरिका में अनुदार रिपब्लिकन पार्टी के साथ हैं और ट्रंप प्रशासन में भी कुछ भारतीय मूल के लोग हैं. फिर भी अप्रवासियों का बड़ा बहुमत परंपरागत रूप से उदारवादी डेमॉक्रेटिक पार्टी के साथ रहता है. भारत में भी जॉन एफ कैनेडी, बिल क्लिंटन और बराक ओबामा जैसे डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति ज्यादा लोकप्रिय रहे हैं, जबकि हम यह नहीं कह सकते कि डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति विशेष रूप से भारत के प्रति ज्यादा दोस्ताना रहे हैं.
डेमोक्रेट्स के प्रति भारतीयों का और ख़ास कर आप्रवासी भारतीयों का यह रुझान मूलत: इसलिए है कि भारतीय मूल के लोग अमेरिका में अल्पसंख्यक हैं, आप्रवासी तो वे हैं ही, और डेमोक्रेटिक राजनीति अल्पसंख्यकों और आप्रवासियों के प्रति ज्यादा उदार है. भारतीय यह भी जानते हैं कि वे कितनी ही गोरेपन की क्रीमें लगा लें, वे गोरों की तरह गोरे नहीं हो सकते. वे यह भी जानते हैं कि अनुदार राजनैतिक ताक़तों का कुछ रिश्ता उग्र श्वेतवर्चस्ववादी समूहों से भी है जो मानते हैं कि गोरे लोग काले या सांवले लोगों से श्रेष्ठ हैं और अमेरिका पर वास्तविक हक़ तो सिर्फ़ गोरे कॉकेशियन नस्ल के लोगों का है, बाक़ी लोगों को या तो अमेरिका से चले जाना चाहिए या दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहना चाहिए.
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद पिछले जिनों श्वेतवर्चस्ववादियों ने जैसे उग्र और हिंसक प्रदर्शन अमेरिका में किए, उनसे भी अनुदार रिपब्लिकन ताक़तों का उनसे रिश्ता जाहिर होता है. स्वाभाविक है कि सिर्फ़ भारतीय ही नहीं, दूसरे भी देशों के आप्रवासी और सैकड़ों साल से अमेरिका में रहने वाले अश्वेत नागरिक भी मुख्यत: डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं. जो अल्पसंख्यक या अश्वेत या मिश्रित वर्ण के लोग डेमोक्रेटिक समर्थक हैं वे अपेक्षाकृत समृद्ध या हैसियत वाले लोग हैं जो अपने लोगों की सामूहिक असुरक्षितता या चिंता से ऊपर उठे हुए हैं.
यही स्थिति दूसरे देशों में भी है. इंग्लैंड में परंपरागत रूप से भारतीय समुदाय लेबर पार्टी का समर्थक है, और यही स्थिति अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की भी है.पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों की राजनीति में जो उदारवादी पार्टियां हैं वे अल्पसंख्यकों, अश्वेत नागरिकों, वैध या अवैध आप्रवासियों, महिलाओं और अन्य कमज़ोर वर्गों के हितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं और ज्यादा प्रगतिशील नीतियों में यकीन करती हैं, तमाम पाखंडों और विरोधाभासों के बावजूद.
गोरे लोगों को रंगभेदी या नस्लवादी नहीं होना चाहिए, पर हम अगर अफ़्रीकी मूल के लोगों या अपने ही देश के उत्तरपूर्व के लोगों को तंग करें तो वह जायज़ है
अब इस तस्वीर का दूसरा पहलू. उदारवादी पार्टियों के समर्थक होने के बावजूद ज़रूरी नहीं कि आप्रवासी भारतीयों का बहुमत उदार और प्रगतिशील विचारों का समर्थक है. इसके उलट संभवत: ज्यादा तादाद में आप्रवासी भारतीय संकीर्ण धार्मिक या पुरातनपंथी तत्वों के समर्थक हैं, ऐसा लगता है. विश्व हिंदू परिषद या ऐसी ही हिंदुत्ववादियों संस्थाओं को विदेश में बसे हिंदुओं से जो समर्थन और सहायता मिलती है उससे यही लगता है. केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद आप्रवासी समुदाय में जो उत्साह नजर आया, या मोदी का अमेरिका में जो भव्य स्वागत हुआ वह कुछ हद तक कांग्रेस सरकार से मोहभंग की वजह से होगा, लेकिन उसकी बड़ी वजह भाजपा या संघ परिवार के प्रति मोह है. यानी आप्रवासी हिंदू चाहते हैं कि अमेरिका में उदार सरकार रहे क्योंकि वहां वे अल्पसंख्यक हैं, लेकिन जहां वे बहुसंख्यक हैं वहां वे अनुदार दक्षिणपंथी नीतियां चाहते हैं.
लेकिन क्या ऐसा सिर्फ़ हिंदुओं के साथ है? नहीं. प्रसिद्ध पाकिस्तानी स्तंभकार ख़ालिद अहमद ने एक लेख में इस बात का बहुत अच्छा विश्लेषण किया है कि जो मुसलमान अमेरिका और इंग्लैंड में उदार ताक़तों के समर्थक होते हैं वे अपने देश में घनघोर संकीर्ण और मेजॉरिटेरियन या बहुसंख्यवादी ताक़तों के समर्थक होते हैं. सुन्नी मुसलमान हो सकता है कि अमेरिका में उदार प्रजातंत्र चाहें लेकिन पाकिस्तान में वे अहले हदीस या लश्करे झांगवी जैसी ताक़तों के हिमायती हों. जो शिया, पाकिस्तान में शिया अल्पसंख्यकों के प्रजातांत्रिक हक़ों के हिमायती हों वे ईरान में ग़ैर शिया मुसलमानों या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के दमन के हिमायती हो जाते हैं. सारे धर्मों के अतिवादी तत्वों को अपने अपने अाप्रवासियों से ख़ूब मदद मिलती है. यानी हम सभी चाहते हैं कि दूसरे लोग उदार रहें ताकि हमें फ़ायदा हो, लेकिन हम खुद अनुदार भले. जहां हम अल्पसंख्यक हैं वहां उदार सरकार हो, जहां हम बहुसंख्यक हैं वहां अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जा मिलना चाहिए. गोरे लोगों को रंगभेदी या नस्लवादी नहीं होना चाहिए, पर हम अगर अफ़्रीकी मूल के लोगों या अपने ही देश के उत्तरपूर्व के लोगों को तंग करें तो वह जायज़ है.
मानवजाति का एक बड़ा गुण जो उसे अन्य जीवों से अलग करता है वह है परकायाप्रवेश. कुत्ता या दूसरे जीव भी किसी अन्य जीव को या इन्सान को देखकर थोड़ा बहुत अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वह क्या सोच रहा है, लेकिन उनमें यह क्षमता बहुत सीमित होती है. इंसान एक दूसरे इंसान की जगह खुद को रखकर गहराई से सोच सकता है कि उसे कैसे महसूस हो रहा है. इसी क्षमता ने साहित्य या नाटक, सिनेमा जैसी विधाओं को जन्म दिया जिसमें एक लेखक या अभिनेता, अलग अलग चरित्रों को जीवित करता है, और इसी क्षमता के ज़रिये हमने जीव विज्ञान के गहन क्षेत्रों में प्रवेश किया.
लेकिन हम यह नहीं सोचना चाहते कि दूसरे धर्म का व्यक्ति कैसे सोचता होगा. हम खुद अल्पसंख्यक होने का अनुभव हासिल भी कर लें, तब भी जहां हम बहुसंख्यक हैं वहां अल्पसंख्यकों की असुरक्षित भावना को नहीं महसूस करना चाहते. अगर कुछ देर के लिए एक हिंदू एक आम भारतीय मुसलमान की तरह, एक मुसलमान एक आम पाकिस्तानी ईसाई की तरह, कोई सुन्नी किसी शिया की तरह, कोई सवर्ण किसी दलित की तरह सोच कर देखे तो कितनी सारी बातें साफ़ हो जाएंगी और दुनिया कितनी मानवीय हो जाएगी. क़ुदरत ने हमें यह क्षमता बख़्शी है, लेकिन हमारी संकीर्णता हमें इस क्षमता का उपयोग करने नहीं देती.
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