अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम 16 अक्टूबर, 2014 को भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाकार बनाए गए थे. उनकी यह नियुक्ति तीन साल की थी. इस नाते उनका कार्यकाल 15 अक्टूबर, 2017 तक का था. लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें एक साल का कार्यकाल विस्तार दे दिया. यानी उनका 15 अक्टूबर, 2018 तक पद पर रहना पक्का हो गया.

इस कार्यकाल विस्तार से पहले ऐसी खबरें आई थीं कि सुब्रमण्यम कार्यकाल विस्तार नहीं बल्कि अपना तीन साल का कार्यकाल पूरा करके वापस अमेरिका जाना चाहते हैं, जहां उनका परिवार रहता है. अरविंद सुब्रमण्यम वाशिंगटन के पीटरसन इंस्टीट्यूट फाॅर इंटरनेशनल इकाॅनोमिक्स में सीनियर फेलो हैं और अभी वहां से छुट्टी पर हैं. पिछले साल उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि सुब्रमण्यम वापस अपने संस्थान में लौटना चाहते हैं.

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भारत सरकार का पद छोड़कर वापस अकादमिक क्षेत्र में सुब्रमण्यम के लौट जाने की बातें इसलिए भी चल रही थीं क्योंकि कुछ समय पहले नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने भी इसी आधार पर यह पद छोड़कर वापस अकादमिक क्षेत्र में लौटने का निर्णय लिया था. विपक्ष के कुछ नेता और सरकार से ही जुड़े लोग अनौपचारिक तौर तो यह भी कह रहे थे कि मौजूदा सरकार का राजनीतिक नेतृत्व अर्थशास्त्रियों की सुन नहीं रहा, इसलिए पहले पनगढ़िया गए और अब अरविंद सुब्रमण्यम जाना चाह रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि अरविंद सुब्रमण्यम कार्यकाल विस्तार के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने उनसे कम से कम एक साल और मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद पर बने रहने का आग्रह किया था. एक सूत्र के मुताबिक इस आग्रह को सुब्रमण्यम टाल नहीं पाए.

लेकिन पिछले कुछ दिनों में कई ऐसी चीजें हुई हैं, जिनसे लगता है कि अरविंद सुब्रमण्यम अब न तो और कार्यकाल विस्तार मांगने वाले हैं और न ही अक्टूबर के बाद वे इस पद पर बने रहने को तैयार होंगे, भले ही सरकार कितना भी आग्रह करे. इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले कुछ महीनों में सरकार को नए मुख्य आर्थिक सलाहकार की खोज शुरू करनी होगी. अब सवाल उठता है कि आखिर वे क्या संकेत हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अरविंद सुब्रमण्यम आर्थिक सलाहकार के पद से विदा होने वाले हैं.

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सबसे पहला संकेत मिलता है इस बार की आर्थिक समीक्षा से. आर्थिक समीक्षा तैयार करने की जिम्मेदारी मुख्य आर्थिक सलाहकार की होती है. पिछले साल जो आर्थिक समीक्षा आई थी उसकी सबसे बड़ी आलोचना यही हुई थी कि इसमें सरकार का काफी गुणगान किया गया है. सामान्य तौर पर आर्थिक समीक्षा से यह उम्मीद होती है कि उसमें अर्थव्यवस्था की सही-सही तस्वीर दिखे. पिछले साल की समीक्षा को देखकर कई अर्थशास्त्रियों ने यह कहा था कि समीक्षा इस पैमाने पर खरी नहीं उतरती.

इसके उलट इस बार की समीक्षा में अर्थव्यवस्था की चुनौतियों का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है. समीक्षा में कहा गया है कि अगला एक साल अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होगा. साथ ही 2017-18 की समीक्षा में नोटबंदी और जीएसटी के फायदों के साथ अर्थव्यवस्था को इनसे हुए नुकसानों का जिक्र भी किया गया है. पूरी समीक्षा में कई जगह ऐसी बातें दर्ज हैं, जो कहीं न कहीं सरकार की कार्यकुशलता और काम करने के तौर-तरीकों पर सवाल खड़े करती हैं.

दूसरा संकेत इस बात से मिलता है कि इस बार की आर्थिक समीक्षा के दोनों खंड एक साथ पेश किए गए. पहले भी ऐसा ही होता था, लेकिन पिछले साल पहला खंड बजट के एक दिन पहले आया था. उस वक्त दूसरा खंड नहीं जारी करने की वजह यह बताई गई थी कि बजट पेश करने का समय 28 फरवरी से आगे करके 1 फरवरी किया गया है, इसलिए समीक्षा के लिए जरूरी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. कहा गया था कि समीक्षा का दूसरा खंड अगले कुछ महीने में आएगा. अगस्त, 2017 में समीक्षा का दूसरा खंड आया. अगर पिछले साल के तर्क को मानें तो इस बार भी बजट 1 फरवरी को ही पेश हुआ तो इस साल भी समीक्षा के दोनों खंड नहीं आने चाहिए थे लेकिन दोनों एक साथ आए. इस आधार पर कुछ लोगों को यह लग रहा है कि सुब्रमण्यम कार्यकाल विस्तार नहीं मांगने वाले, इसलिए वे इस काम को इस साल बजट के साथ ही निपटाना चाहते थे.

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कांग्रेस के शासनकाल में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम अक्सर अरविंद सुब्रमण्यम की तारीफ करते रहते हैं. वे यह कहते हैं कि सुब्रमण्यम ही इस सरकार में एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनके पास आर्थिक समझ है लेकिन उनकी इस सरकार में कोई सुनता नहीं है. पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा है कि सुब्रमण्यम सरकार के प्रवक्ता के तौर पर नहीं बल्कि एक अर्थशास्त्री के तौर पर स्वतंत्र तौर पर अपनी राय रख रहे हैं.

यह उस दिन भी दिखा जिस दिन आर्थिक समीक्षा संसद में पेश की गई. एक ऐसे दौर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी साक्षात्कार देने के लिए अपने अनुकूल समाचार चैनलों का चयन करते हैं, अरविंद सुब्रमण्यम ने उस दिन सरकार विरोधी माने जाने वाले चैनलों को भी साक्षात्कार दिया. एनडीटीवी को सरकार के कई लोग इस सरकार का विरोधी मानते हैं. लेकिन सुब्रमण्यम ने एनडीटीवी के हिंदी और अंग्रेजी, दोनों ही चैनलों को साक्षात्कार दिया.

नीरव मोदी कांड पर भी सुब्रमण्यम ने स्वतंत्र तौर पर अपनी राय रखी. चेन्नई में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने इस मसले पर कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि इतनी बड़ी घटना सिर्फ पंजाब नेशनल बैंक की आंतरिक चूक की वजह से हो गई. सुब्रमण्यम ने कहा कि पंजाब नेशनल बैंक की चूक तो है, लेकिन एक नियामक के तौर पर रिजर्व बैंक ने भी अपनी भूमिका ठीक ढंग से नहीं निभाई.

अपने इस संबोधन में सुब्रमण्यम यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने मोदी सरकार में नीतिगत निर्णय नहीं होने के मसले पर भी आलोचनात्मक रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि चार सालों में उन्हें पता चला है कि कोर्ट, सीबीआई, सीवीसी और सीएजी के डर से भारत सरकार में नहीं के बराबर निर्णय लिए जाते हैं. जानकारों के मुताबिक इन बयानों से यही संकेत निकल रहा है कि अरुण जेटली की अगुवाई वाले वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाकार पद पर सुब्रमण्यम के अब गिने-चुने दिन ही बचे हैं.