शेक्सपीयर के एक नाटक का यह संवाद हम सबने कभी न कभी पढ़ा ही होगा - ‘कुछ लोग पैदाइशी महान होते हैं, कुछ अपनी मेहनत से महानता हासिल करते हैं, और कुछ लोगों पर महानता थोप दी जाती है.’ संतों, पैगम्बरों, सम्राटों और नेताओं के बारे में अक्सर इनमें से कोई न कोई एक स्थिति लागू की जाती है. हालांकि यदि शेक्सपीयर को यही बात आज की परिस्थितियों में कहनी होती, तो इसमें उन्होंने एक और बात जोड़ी होती. वो यह कि कुछ लोग भोली-भाली जनता को सुनियोजित तरीके से ठगकर या मूर्ख बनाकर भी अल्पकालिक और छद्म-महानता हासिल कर लेते हैं. आसाराम, राम-रहीम, निर्मल बाबा या रामपाल जैसे आज के ढोंगी बाबाओं के बारे में यही बात लागू होती दिखती है.
अब प्रश्न यह है कि किस तरह ये लोग योजनाबद्ध तरीके से करोड़ों लोगों को मूर्ख बनाने में सफल हो जाते हैं? इस सवाल का जवाब इसी विषय पर लिखे गए पिछले आलेख में देने की कोशिश की गई थी. प्रस्तुत आलेख का विषय यह है कि किन बातों का ध्यान रखने पर हम भविष्य में ऐसे ठग बाबाओं को अपना साम्राज्य खड़ा करने से रोक सकते हैं. आसाराम के मामले को ही यदि हम गौर से देखें, तो पाएंगे कि सजायाफ़्ता होने के बाद भी ऐसा सुनने में नहीं आया है कि उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की हो या इसका पश्चाताप किया हो. इस पूरे प्रकरण में कभी भी उनके चेहरे पर कोई आत्मग्लानि, कोई करुणा नज़र नहीं आई. इससे पता चलता है कि आसाराम जैसे लोग अपने झूठ और अंधविश्वासों का स्वयं ही इस कदर शिकार हो जाते हैं कि उन्हें इस बात का एहसास तक नहीं हो पाता कि उन्होंने जो कुछ किया वह गलत, अनैतिक और अमानवीय था.
इसलिए सामान्य नागरिक समाज पर यह दायित्व आन पड़ा है कि वह स्वयं इतना जागरूक बने कि भविष्य में कोई व्यक्ति अपने शातिराना व्यवहार, वेषभूषा और ढोंग के जरिए ऐसी ओढ़ी हुई महानता हासिल न कर सके. वह न तो अपना पापाचारपूर्ण साम्राज्य खड़ा कर सके और न इसकी आड़ में घोर आपराधिक कृत्यों को अंजाम दे सके. इसके लिए जरूरी है कि असली संत और असंत को पहचानने की दृष्टि आम जनता में पैदा हो. फिलहाल यहां दस ऐसे सामान्य नुस्खे दिए जा रहे हैं, जिन्हें यदि ध्यान में रखा जाए तो भविष्य में आसाराम, रामपाल या राम-रहीम जैसे बाबाओं का भुक्तभोगी बनने से हमारा समाज बच सकता है-
1. किसी भी जीवित व्यक्ति को गुरु नहीं मानें. आधुनिक भारत में सबसे ब़ड़ा ‘आध्यात्मिक’ घोटाला इस गुरु के नाम पर ही हुआ है. यदि यह हमारी आध्यात्मिक जरूरत ही है कि हमें अपना जीवन संयम और सदाचार से जीने के लिए मार्गदर्शन की जरूरत है, तो अतीत में एक से एक पुरुष और महिला संत हुए हैं. उन्हें अपना अप्रत्यक्ष गुरु मानकर उनका गुणदर्शन करें. जीवित व्यक्ति को गुरु मानने में खतरा है. पहला खतरा यह कि उसके भ्रष्ट होने की संभावना बराबर बनी रहती है. दूसरे, वह ढोंगी यानी पहले से ही भ्रष्ट हो सकता है. तीसरा, आज जिस तरह से गुरुआई का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन किया जाता है, उससे इस भेड़ियाधसान समाज में व्यक्तिपूजा और अंधश्रद्धा को बढ़ावा मिलता है. यहां तक कि अतीत के महान संतों को भी पूजा की वस्तु न बनने दें और न ही उन्हें चमत्कारी या अवतारी पुरुष-स्त्री घोषित करें. याद रखिए, भारतीय संत परंपरा में व्यक्ति को नहीं विचार और तत्व को प्रधानता दी गई है. गुरु का सांकेतिक महत्व अवश्य है, लेकिन उसका वास्तविक अर्थ बहुत गूढ़ है. इसलिए किसी गुरु नामधारी व्यक्तिविशेष का चेला, शागिर्द या अंधभक्त न बनें और न ही अपने बच्चों को उनका अंधभक्त बनाएं. अन्यथा वही होकर रहेगा जो आसाराम या राम-रहीम के मामले में उजागर हुआ.
2. अपनी नाबालिग और अबोध संतानों को ऐसे बाबाओं के आश्रमों में न भेजें. उन्हें मूल्यपरक और वैज्ञानिक शिक्षा देने-दिलाने की कोशिश करें. समय आने पर अध्यात्म का मर्म भी उन्हें स्वयं समझने दें. आजकल के बाबाओं के आश्रम में जाकर आपका बच्चा अंधविश्वासी, मिथ्याभिमानी, पोंगापंथी और मूढ़मति ही बनता है. फिर ऐसे बाबाओं और उनके प्रबंधकों द्वारा ऐसे मासूम बच्चों का दैहिक और मानसिक शोषण भी होता है. ये बच्चे तो यह समझने तक कि स्थिति में नहीं होते कि उनका शोषण हो रहा है. जब तक समझने लायक होते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. वे अवसाद और आत्महत्या तक के कगार पर पहुंच चुके होते हैं. या फिर ये स्वयं उस व्यवस्था का हिस्सा बनकर ऐसे ही दूसरे बच्चों के शोषण में भागीदार तक बन जाते हैं.
3. टीवी चैनलों पर साध्वियों और कथावाचिकाओं के ग्लैमरस जीवन से प्रभावित होकर माता-पिता अपनी बच्चियों को ऐसे बाबाओं को मत सौंपें. बाद में उनका हाल भी वही हो सकता है जैसा आसाराम या राम-रहीम के दुराचार से पीड़ित बेटियों का हुआ. याद रखिए, अभी कुछ ही मामले प्रकाश में आए हो सकते हैं. जबकि हजारों की संख्या में अभी भी हमारी बच्चियां हमारी ही मूढ़ता की वजह से इन बाबाओं और उनके गुर्गों के शोषण का शिकार हो रही होंगी. वे इस डर से भी रिपोर्ट करने से डर रही होंगी कि इक्के-दुक्के बाबाओं को छोड़कर ज्यादातर बाबा लोग राजनीतिक संरक्षण और छल-बल-कल का सहारा लेकर बच निकलते हैं. ऐसी कई पीड़ित लड़कियां अपनी और अपने परिजनों की जान का खतरा सोचकर भी चुप रह जाती होंगी. कुछ और लड़कियां और कोई चारा नहीं देख इसे अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लेती होंगी.
4. वयस्क साध्वियां भी यदि सचमुच का आध्यात्मिक जीवन जीना चाहती हैं और लोकमंगल के कार्यों में अपना जीवन लगाना चाहती हैं, तो वे भी अपना स्वतंत्र आश्रम बनाएं. वे किसी गुरु इत्यादि के चक्कर में न पड़ें. उनके प्रति आत्मसमर्पण की भावना न रखें. यदि ऐसी भावना मन में आ रही हो, तो समझ लें कि आपको अपने परिजन या साथी के भावनात्मक सहयोग की जरूरत है, न कि किसी बाबा के सामने दैहिक और आत्मिक समर्पण की. आपको मनोचिकित्सकीय सलाह या इलाज की जरूरत भी हो सकती है. यदि गलती से किसी ऐसे बाबा के चंगुल फंस गई हैं या फंसा दी गई हैं, तो जितनी जल्दी हो सके उनके चंगुल से निकल भागें.
5. जो भी बाबा, पंडा या पुरोहित तंत्र-मंत्र के माध्यम से चमत्कार का दावा करता हो. टोने-टोटकों के जरिए आपकी सारी समस्याओं के समाधान का दावा करता हो, उनसे दूर रहें. गंडे, ताबीज बांटनेवालों, फूल-अक्षत या भस्म-भभूत ‘पढ़कर’ खिलानेवालों से एकदम दूर रहें. जो सच्चा संत होता है वह कारण-कार्य संबंध में विश्वास करता है. प्रकृति के वैज्ञानिक नियमों को स्वीकार करता है. कबीर जैसे सच्चे संत की वाणी याद रखनी चाहिए- ‘तंत्र-मंत्र सब झूठ है, भरम पड़ो मत कोय। सार सबद जानै बिना कागा हंस न होय।।’
6. किसी भी सच्चे संत को व्यक्तिगत रूप से अथाह पैसा, संपत्ति, गाड़ी की जरूरत नहीं होती. अव्वल तो आप स्वयं ये सब उन्हें दान में न दें. लेकिन ऐसा कोई भी ‘संत’ जो इन चीजों की इच्छा रखता हो या ऐसे दान स्वीकार करता हो, वह संत हो ही नहीं सकता. महंगी कारों और हेलीकॉप्टर से चलनेवालों बाबाओं से सावधान रहें. सोने के खड़ाऊं पहनने वाला और रत्नजड़ित सिंहासन पर बैठने वाला कभी संत नहीं हो सकता. जिसने सामान्य मनुष्य से अलग कोई भड़कीला भेष बना रखा हो, जो खुद को पुजाता हो, सामान्य से ऊंचे आसन पर बैठता हो, जिसके प्रवचन में दंभ झलकता हो, जिसे अपना पैर छुआने में, अपनी जय-जयकार कराने में आनंद आता हो या इसकी इजाजत देता हो, ऐसे दिखावाबाजों के चक्कर में पड़ना आपके लिए और आपकी संतानों के लिए आत्मघाती ही होगा.
7. यदि वह संत नामधारी व्यक्ति गृहस्थ जीवन में है तो उसे किसी श्रमसाध्य कार्य करके अपने परिवार का भरण-पोषण करना चाहिए. याद रखिए कबीर, नामदेव, नानक और रैदास जैसे सच्चे संतों ने स्वयं श्रम करके अपना गुजारा किया. संत कबीर एक स्थान पर कहते हैं- ‘मर जाऊं मांगू नहीं, अपने तन के काज। परमारथ के कारने, मोहि न आवै लाज।।’ इसलिए यदि कोई संत नामधारी व्यक्ति यह भी दावा करके कि वह परमार्थ के लिए दान स्वीकार करता है, तो भी उसकी खुद की जीवन-शैली को कठोरतम कसौटियों पर कसें. स्कूल, अस्पताल, वृद्धाश्रम चलाना या स्वदेशी के नाम पर व्यापार करना संतों का कार्य नहीं है. उनका कार्य समाज का अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन है. कोई भी संत नामधारी जैसे ही इन पचड़ों में फंसता-फंसाता है, वैसे ही समझ लें कि यह एक दिन खुद भी गर्त में गिरेगा और दूसरों को भी गिराएगा.
8. संतत्व का दावा करने वाला कोई भी साधक कभी भी किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होगा. वह पद-पुरस्कार, सत्ता और सरकार के चक्कर में नहीं पड़ेगा. वह कुंभनदास के शब्दों में ‘संतन को कहा सीकरी सों काम’ या तुलसीदास के शब्दों में ‘तुलसी अब का होएंगे नर के मनसबदार’ जैसी भावना वाला होगा. वह किसी दलविशेष के समर्थन या विरोध में नहीं पड़ेगा. वह तो केवल करुणा के वशीभूत होकर सभी पक्षों की दुष्प्रवृत्तियों की ओर इंगित करेगा. उनके प्रबोधन या उनमें सुधार की चेष्टा करेगा. उसका अंतिम अस्त्र ‘सत्याग्रह’ होगा, जो वास्तव में विरोधियों के प्रति भी द्वेष या घृणा से रहित होगा.
9. किसी भी नामधारी संत को उसके नाम, प्रचार, भक्तों की संख्या, संस्था-संगठन की विशालता, धन-संपदा इत्यादि के आधार पर मत तौलें. सच्चा संत तो एक लंगोटी भर लपेटे हुए किसी पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठा हो सकता है. उनकी पहचान उनकी स्वानुभूत वाणी और करुणामय व्यवहार होती है. काम, क्रोध, लोभ, अहंकार और मोह से रहित अपरिग्रही जीवन ही उनकी पहचान होती है. उनकी सरलता, सादगी और गुमनामी भी उनकी पहचान हो सकती है. इसलिए आज के नामधारी संतों को उनके बाहरी वेष-भूषा, आवरण या भौंकाल से नहीं, बल्कि निजी जीवन में उनके संतोचित चरित्र और व्यवहार से करें.
10. और अंत में कुछ पाठकों को लग सकता है कि ये बातें तो सामान्य हैं और कोई भी विवेकवान व्यक्ति पहले से ही यह सब समझता हो सकता है. हम ऐसे पाठकों को बधाई देते हैं कि वे पहले से जागरूक हैं. साथ ही उन्हें यह भी याद दिलाते हैं कि भारत की करोड़ों जनता अभी भी तरह-तरह के अविवेकपूर्ण कर्मकांडों और अंधविश्वासों का शिकार है. इनमें शिक्षित कहलाने वाले लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हैं. वे अभी भी तरह-तरह की समस्याओं में घिरे हुए हैं, जिनके समाधान के लिए वे ऐसे बाबाओं के चंगुल में फंसते हैं.
ऐसे में हमारे विवेकवान पाठकों का यह दायित्व है, वे अपने आस-पास, अपने कुल-परिवार, गांव-मोहल्ले में जहां भी ऐसे बाबाओं के अंध-श्रद्धालुओं को पाएं, उन्हें उपरोक्त बातों को लेकर जागरूक करने की कोशिश करें. एक बार में सफलता नहीं मिले, तो बार-बार कहने-समझाने की कोशिश करें. ढोंगी बाबाओं का नाम लेकर सोदाहरण समझाने की कोशिश करें. उन्हें बताएं कि भोले और परेशान लोगों की अंधश्रद्धा और व्यक्तिपूजा की वजह से कई संभावनाशील संतों के भी भ्रष्ट होने की परिस्थितियां बन जाती हैं और जरा सी चूक की वजह से उनका पतन हो जाता है. इसलिए कहीं न कहीं हमने ही अपने-अपने आसाराम, राम-रहीम और रामपाल पैदा किए हैं. आगे से कोई ऐसा नकली ‘संत’ या ढोंगी पैदा न होने पाए, यह भी हमारे ही हाथ में है.
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