भारतीय जनमानस एक मनोवैज्ञानिक समस्या का शिकार हो गया लगता है. यह समस्या कम्यूनिकेशन की है - संवाद न कर पाने की समस्या. ऊपर-ऊपर से घनघोर संवाद होता दीखता है, लेकिन असल में संवाद हो नहीं पा रहा है. हममें से कुछ लोग किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना में फंस गए हैं. कुछ किसी संगठन की आलोचना को अपने जीवन का उद्देश्य बना चुके हैं. कुछ लोग हर घटना को राजनीतिक दल के नज़रिए से सोचने के अभ्यस्त हो चुके हैं. और इस हद तक हो चुके हैं कि हमारे व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक संबंध तक इसकी भेंट चढ़ रहे हैं. सुबह से शाम तक हम सभी अपनी छोटी-छोटी राजनीतिक लड़ाइयां जीत लेने की कोशिश में हैं. भले ही उस जीत में हम सबकी सामूहिक हार ही होती हो. उस क्षणिक जीत के लिए सुविधानुसार समविचारी साथी भी ढूंढ़ लेते हैं. फिर एक-दूसरे की पीठ ठोकने का खेल चलता है.
नेम-कॉलिंग, चुटकुले, व्यंग्य से लेकर गाली तक का इस्तेमाल किया जा रहा है. हम सब अपने-अपने खेमे तलाश रहे हैं. अपने-अपने सबूत पेश कर रहे हैं. झूठे-सच्चे ऐतिहासिक प्रसंग परोस रहे हैं. फोटोशॉप्ड तस्वीरें और सनसनीखेज टाइटल वाले वीडियोज़ वायरल किए जा रहे हैं. पैरोडीज़ और मीम्ज़ में अपनी सारी रचनात्मकता उड़ेल रहे हैं. हम सभी हताश हैं, गुस्से में हैं. हम सिनिकल होते जा रहे हैं. धीरे-धीरे हर चीज से, हर सिद्धांत से, नैतिकता, ईमानदारी और मूल्यों से हमारा भरोसा उठता जा रहा है. सरल और स्वस्थचित्त लोगों पर हम हंसते हैं, उन्हें मूर्ख समझने लगे हैं. कभी किसी को खुद ही मसीहा बना बैठते हैं, और फिर जल्दी ही उससे मोहभंग भी हो जाता है. हम या तो आंख मूंद कर समर्थन करने लगते हैं, या फिर आंख मूंदकर विरोध पर उतर आते हैं.
इतना लिखते-बोलते हुए भी हम वह लिख-बोल नहीं पाते, जो हम वास्तव में लिखना-बोलना चाहते हैं. इस तरह हम सभी अभिव्यक्ति की समस्या से भी जूझ रहे हैं. हमारे शब्द अपने स्वतंत्र अर्थ खोते जा रहे हैं. सुंदर से सुंदर शब्द अब द्विअर्थी या बहुअर्थी हो चले हैं. इसलिए हम अपनी असल भावाभिव्यक्ति में असमर्थ होते जा रहे हैं. और अपनी इसी हताशा के मारे फिर हम दूसरों का छिद्राण्वेषण करने लगते हैं. उन्हें नीचा दिखाने लगते हैं.
‘मैंने ये नहीं, वो कहा था.’
‘मेरा मतलब यह नहीं वो था. आप समझे ही नहीं.’
‘आप समझ ही नहीं सकते, क्योंकि आप फलाने के भक्त, चमचे या विरोधी हैं.’
‘आपसे बात ही करना बेकार है. आपके मुंह लगना ही मूर्खता है. जाइये मैं आपसे बात नहीं करता.’
‘अभी ब्लॉक कर दूंगा. अभी अनफ्रेंड कर दूंगा.’
इस तरह यह हमारी अभिव्यक्ति की, संवाद की, कम्यूनिकेशन की समस्या बन चुकी है. हम सब कहीं-न-कहीं इसके शिकार होते जा रहे हैं. हम अपने को स्वतंत्र और स्वच्छंद समझ तो रहे हैं, लेकिन असल में हम सभी एक संकीर्ण गलियारों से भरी किसी भूल-भुलैया में भटककर इसमें जज्ब हो चुके हैं. इतालवी विचारक एंतोनियो ग्राम्स्की ने इसे ‘हेजीमनी’ का नाम दिया था. किसी भी व्यवस्थागत या समष्टिगत सुधार में यह सबसे बड़ी बाधा है.
हाल के चुनावों पर टुकड़ों-टुकड़ों में चल रही हमारी चर्चा इसका जीता-जागता उदाहरण है. हर चुनावों के बाद हम गिरावट के एक नए स्तर पर गिरते जा रहे हैं और इसे ‘न्यू-नॉर्मल’ की श्रेणी में रखने लगते हैं. इस तरह उस तत्कालीन ‘न्यू-नॉर्मल’ को जाने-अनजाने वैधता प्रदान कर देते हैं. हम अनजाने में ही उस ‘न्यू नॉर्मल’ को स्वीकारने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लेते हैं. यह एक विचित्र प्रकार का सामाजिक और राजनीतिक अनुकूलन है, जिसमें हम अपनी निराशा को अकाट्य और अपरिवर्तनीय सत्य मानकर चलने लगते हैं, और इसलिए स्वयं को उसके अनुकूल ढालने में ही समझदारी और यहां तक कि अपनी जीत समझने लगते हैं.
हमारा विरोध तक अजीब होता है. जितनी बार हम किसी व्यक्ति, संगठन या परिघटना का विरोध करते हैं, उतनी बार मानो हम उस व्यक्ति, संगठन या परिघटना को स्थापित करने में अपना योगदान दे रहे होते हैं. विरोध की हमारी तीव्रता और तीक्ष्णता बढ़ते-बढ़ते हमारी असहायता, खीज और हताशा में बदलने लगती है और दूसरा पक्ष इसे अपनी जीत बताकर पेश करने लगता है. और मन ही मन हम भी उसे सत्य मानने लगते हैं.
इसका एक उदाहरण देखिए कि भारत के मौजूदा सत्ताधारी दल के विरोधी ही आज इस बात को सबसे बढ़-चढ़कर प्रस्तुत करते हुए मिलेंगे कि अब 2019 की नहीं 2024 की बात करो. अपनी असहायता, खीज और हताशा को सत्य और समझदारी के रूप में प्रस्तुत करने का यह सबसे अच्छा उदाहरण हो सकता है, इसलिए यही उदाहरण दिया गया.
अभी कर्नाटक में ही विधायकों की खरीद-फ़रोख्त को लेकर जितनी तरह की बातें और चुटकुले दोहराए जा रहे हैं, उसमें यही प्रतिध्वनित होने लगा है कि हम सब इसे स्वीकार कर चुके हैं. इससे अलग बड़ी संख्या में लोग अपनी घोषित पार्टी-निष्ठा की वजह से इसकी सार्वजनिक सराहना तक करने में लगे हैं. और कमोबेश सभी पार्टियां अलग-अलग समय पर इस खेल में शामिल रही हैं. हम लोग यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि इससे आखिरकार हमारे संविधान और लोकतंत्र की कितनी दूरगामी क्षति होने जा रही है. एक पल को यदि यह बात हमारे मन में आती भी है, तो दूसरे ही पल हमारी राजनीतिक निष्ठा हम पर हावी होकर कहने लगती है कि ‘आगे लोकतंत्र और संविधान का जो होगा देखा जाएगा, अभी हमारा दल, हमारा नेता, हमारी जाति, हमारा संप्रदाय कमजोर नहीं पड़ना चाहिए.’
हमारे अपने-अपने भ्रम, पूर्वाग्रह और मूढ़ताएं भी हैं. लेकिन ये हमारे ‘ब्लाइंड स्पॉट्स’ सरीखे हैं. कुछ बातें ऐसी होती हैं कि हम अपने बारे में जानते हैं या जानने का दावा करते हैं. कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनके बारे में हमें मालूम होता है कि हम नहीं जानते. लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनके बारे में हम यह भी नहीं जानते कि हम नहीं जानते हैं. हमारी परवरिश और हमारे परिवेश की वजह से उपजा भ्रम, पूर्वाग्रह और मूढ़ताएं वैसी ही चीजें हैं. ये हमारे ‘ब्लाइंड स्पॉट्स’ हैं. ये हमारे भीतर हैं, लेकिन विडंबना है कि हम स्वयं इन्हें देख ही नहीं सकते. तब तक जब तक कि कोई सुविचारी व्यक्ति या परिस्थिति हममें इतनी समानुभूति और करुणा पैदा नहीं कर दे.
हमारा चित्त एक पल को भी शांत नहीं रहता. एक अनजाना शोर चलता रहता है मन में. अपने ही कानों में परस्पर-विरोधी बातचीत मानो हल्के स्वर में लगातार बजती रहती है जैसे. एक उथल-पुथल सी मची रहती है हमेशा. हमें दिखाए जाते रहने वाले दृश्यों की बहुलता से हम प्रभावित होते रहते हैं. इन दृश्यों को देखते ही हम क्षणिक आवेश में आते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं. फिर थोड़े समय बाद भूल जाते हैं, क्योंकि कोई नया दृश्य, नए तरह का दृश्य सामने आ जाता है. फिर उस पर प्रतिक्रिया, उस पर आवेश, लामबंदी, थकान, मोहभंग और विस्मृति का चक्र अनवरत चलता रहता है. यह तुरंतता और क्षणिकता ही मानो हमारा स्वभाव बनती जा रही है. इसलिए कई बार पूरी तस्वीर साफ होने से पहले ही कुछ का कुछ हो जाता है. हम अपनी इस विस्मृति को कई बार स्वीकारते भी नज़र आते हैं या उसे दलील के रूप में भी पेश करते हैं. जैसे-
‘तब कहां थे जब उसने ऐसा किया था.’
‘सत्तर साल तक तुमने क्या किया?’
‘उस संप्रदाय या उस जाति के लोगों ने जब ऐसा किया था, तब तुमने क्या कहा या क्या किया?’
और इसी तर्कपद्धति से दूसरी दलील भी निकलती है कि
‘उसने किया तो ठीक और हमने किया तो गलत?’
यानी आज के कदाचार को अतीत के कदाचार की बिना पर जायज ठहराने की कोशिश चलती रहती है.
इस कारण सबसे अधिक क्षति हमारे सुनने की शक्ति की हुई है. ध्यान रहे यहां हमारे कानों की श्रवणता की शक्ति की बात नहीं हो रही है. ध्वनि-तीव्रता या ध्वनि-प्रदूषण से हमारी श्रवण-शक्ति को भी नुकसान पहुंचा ही है. लेकिन असल नुकसान पहुंचा है किसी की बात को ध्यान से सुनने के धैर्य की. सामने वाले के स्थान पर खुद को रखकर उसकी बात सुनने की सहानुभूति या समानुभूति हममें कमती जा रही है. किसी पैराग्राफ के मुखड़े को पढ़ते ही हम उसका पूरा मजमून समझने का दावा पेश कर देते हैं.
कई बार लिखे को पढ़ने की जरूरत भी नहीं होती, कौन लिख रहा है, या बोल रहा है, यही महत्वपूर्ण हो जाता है. क्या लिख-बोल रहा है यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता. कई बार तो लेख या पैराग्राफ का मुखड़ा पढ़ने की भी जहमत नहीं उठाते, लिखनेवाले या बोलनेवाले का मुखड़ा ही काफी है. भले ही वह मुखड़ा किसी ऐसे व्यक्ति का हो, जो किसी दल, संस्था या विचारधारा विशेष को पकड़कर नहीं बैठा हो. ऐसे स्वतंत्रचेता व्यक्तियों को भी हम अपनी-अपनी सुविधानुसार अलग-अलग समय पर अलग-अलग खेमे का घोषित करते रहते हैं. उसकी जाति, उसका धर्म, उसके संबंध, उसकी विचारधारा खंगालने की कोशिश में जुटे रहते हैं. संत कबीर ने ऐसे ही नहीं कहा होगा- ‘जाति न पूछिये साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान...’. अवश्य ही लोगों ने कबीर जैसे मुक्त संतों की भी जाति निकालने की कोशिश की होगी. फिर आज के कच्चे या अधपके ज्ञान-साधकों की क्या बिसात! इसलिए इस प्रस्तुत आलेख को भी हम तटस्थ रूप से, आग्रहों से मुक्त होकर पढ़ और समझ पाएंगे, यह एक अव्यावहारिक अपेक्षा ही होगी.
समकालीन दार्शनिकों में जुर्गेन हैबरमास ने एक ‘आइडियल स्पीच सिचुएशन’ या ‘आदर्श संवाद की अवस्था’ की कल्पना की थी. ऐसी अवस्था में हर कोई अपने मन की बात कहने को स्वतंत्र होता है. वह दूसरों के विचारों पर सवाल उठाने को भी स्वतंत्र होता है. ‘आदर्श संवाद’ की इस अवस्था में हर कोई अपनी इच्छा, अपनी प्रवृत्ति और अपनी जरूरतों को बेहिचक जाहिर करने के लिए मुक्त होता है. लेकिन हैबरमास ने इसके लिए सबसे बड़ी शर्त रखी थी कि ऐसी अवस्था में संवादकर्ताओं के ऊपर किसी प्रकार का आंतरिक या बाह्य दबाव नहीं होना चाहिए. वह न केवल भौतिक बल्कि मनोवैज्ञानिक दबावों या अतार्किकता के प्रभावों से भी मुक्त होना चाहिए.
इस आखिरी शर्त को बड़े ध्यान से समझने की जरूरत होगी. व्यक्तिगत और पारिवारिक संवादों में तो यह काम की चीज है ही. खासकर सामाजिक संवादों में, वह भी तब, जबकि आपके लोकतंत्र-मात्र का ही भविष्य दांव पर लगा हो, तो ऐसे सभी प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबावों से मुक्त होइये. सभी प्रकार के अतार्किक प्रभावों से मुक्त होइये. अपने नेताओं के अनैतिक कृत्यों की वाहवाही मत कीजिए. बल्कि उनका प्रबोधन कीजिए. उन्हें टोकिये. उनसे कहिए कि नेताजी चुनावी हार-जीत तो चलती रहेगी. लेकिन हमारे संविधान से मत खेलिए. हमारे संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर मत कीजिए. संविधान किसी पार्टी-विशेष के नेता ने नहीं बनाया था. उसे किसी पार्टी-विशेष मात्र ने अंगीकार नहीं किया था. संविधान की प्रस्तावना में हमने घोषित किया था - ‘हम भारत के लोग .......... इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं.’ हमने यह नहीं लिखा था कि हम इस संविधान को फुटबॉल की तरह खेलने के लिए अपने राजनीतिक दलों को समर्पित करते हैं. आप बुरा तो नहीं मानेंगे यदि यह कहा जाए कि नाटक दरअसल कर्नाटक में नहीं, हमारे-आपके जीवन में चल रहा है!
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