हिंदी में कहावत है, ‘मार पीछे, पुकार-पुकार’. मतलब, दो धुर दुश्मनों को मारपीट के बाद लगता है कि ज़रूरत ही क्या थी लड़ने की. लिहाज़ा या तो वे चिल्लाने लगते हैं या फिर कसमें खाते हैं कि अब नहीं लड़ेंगे, मिलकर रहेंगे और कभी वादाख़िलाफ़ी नहीं करेंगे. पर आखिर कब तक? ढ़ाक के पात तो तीन ही रहेंगे. 1972 में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति के मकसद से हुए शिमला समझौते को भी इसी तरह समझा जा सकता है.

दोतरफा जीत

1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत मानो अलादीन का चिराग थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मौका भुनाने के लिए 14 राज्यों में चुनाव करवा दिए. 13 में उन्हें जीत मिली. इस जीत के बाद एक साक्षात्कार में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था. ‘ये सच है कि विपक्षी पार्टियों ने 2700 उम्मीदवार उतारे थे, पर सरकार ने हर विधानसभा सीट पर लगभग एक ही उम्मीदवार उतारा और वो थीं- इंदिरा गांधी.’ क्या यही आज भी नहीं हो रहा? इतिहास खुद को दोहराता है, यह जानने के लिए भी इतिहास को जानना जरूरी है.

खैर, बात पर लौटते हैं. कुल मिलाकर कांग्रेस का अश्वमेधी घोड़ा निष्कंटक लगभग सभी राज्यों में घूम आया था. इंदिरा गांधी ‘चक्रवर्ती साम्राज्ञी’ बन गई थीं. संघीय ढांचा कब्ज़े में था. उन्होंने नज़र ज़रा ऊंची की और पाकिस्तान की तरफ़ देखा, तो याद आया कि 93,000 पाकिस्तानी सैनिक और कुछ रेगिस्तानी ज़मीन भारत के कब्ज़े में हैं. आख़िर कब तक इन्हें रख पाते, जल्द ही कुछ करना था.

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पाकिस्तान के हालात

जंग में पाकिस्तान की हार के बाद फौजी आमिर और राष्ट्रपति याह्या खान की छुट्टी हो चुकी थी. ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो पश्चिम पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए थे और सेना उनसे खार खाए बैठी थी. ऐसे हालात में भुट्टो ने भी भारत के साथ अपने रिश्तों में जमी बर्फ़ को पिघलाने के लिए गर्मजोशी दिखाई. रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि भुट्टो के ‘कबूतर’ इंदिरा तक यह संदेसा लाये थे - चूंकि पाकिस्तान जंग हारा है और इस वजह से मुल्क सदमे में है, चुनांचे भारत बड़ा दिल दिखाते हुए उन्हें (भुट्टो) न्योता भेजे. इंदिरा ने वक्त की नज़ाकत देखते हुए भुट्टो को न्योता भेजा.

फिर क्या हुआ?

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इंदिरा गांधी ने जुल्फिकार अली भुट्टो को शिमला बुलाया. महीना था जून का. साल 1972. दिलचस्प यह है कि वे रिश्तों में जमी बर्फ़ पिघलाने बर्फीली वादियों में आए थे. भुट्टो के साथ उनकी 19 साल की बेटी बेनज़ीर भी आई थीं. शायद भुट्टो खुद को नेहरू और बेटी को इंदिरा के रूप में देखने लग गए थे.

पहले मुल्कों के अफ़सरान मिले, यहां से दुर्गा प्रसाद धर. जी हां, कश्मीर के वही पंडितजी जो इंदिरा गांधी के भरोसेमंद थे और वहां से अज़ीज़ अहमद. धर साहब ने गर्मजोशी दिखलाते हुए उर्दू में बातचीत करनी चाही पर अहमद मियां तो जैसे अंग्रेजीदां थे, उर्दू बोले ही नहीं.

चर्चित पत्रकार कुलदीप नैय्यर अपनी किताब ‘बियॉन्ड द लाइंस’ में लिखते हैं कि जब पाकिस्तानी अफ़सरों को बताया गया कि भारत उनके सैनिक और ज़मीन वापस करने की मंशा रखता है, तो अहमद अज़ीज़ ने पहले ज़मीन लेने में दिलचस्पी दिखाई. उन्हें ख़बर थी कि उनके सैनिक भारत में मज़े की जेल काट रहे हैं. सैनिकों के घरवाले भी निश्चिंत थे कि उनके सपूत सीमा पार महफूज़ हैं. अगर अपने मुल्क में होते तो भी साल में एक बार ही मिलने आ पाते. तत्कालीन हिन्दुस्तानी जनरल सैम मानेकशा ने भी एक इंटरव्यू में यह बात कबूली थी कि भारतीय सेना ने अपने सैनिकों के बजाय बंदी बनाये गए पाकिस्तानी सैनिकों की बेहतर देखभाल की थी.

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नैय्यर आगे लिखते हैं कि भारत ने दो प्रस्ताव रखे थे - पहला, दोनों मुल्कों में युद्ध संबंधित व्यवस्थाओं और उपकरणों पर निगरानी रखने का. दूसरा, शांति रेखा को अंतरराष्ट्रीय रेखा का दर्ज़ा देने का. भुट्टो ने दोनों ही खारिज कर दिए. आप ताज्जुब कर रहे होंगे कि कश्मीर पर कोई बात ही नहीं हुई.

क्यों पाकिस्तान शिमला में कश्मीर पर बात करने से कतरा रहा था

‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि शिमला में बातचीत की रूपरेखा तैयार करने के लिए पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ के एडिटर मज़हर अली खान, एक ज़माने के कामरेड साथी और अब भारत में रह रहे सज्जाद ज़हीर से लंदन में मिले थे. इस मुलाकात के पीछे इंदिरा गांधी के सचिव पीएन हक्सर का हाथ था और उधर भुट्टो की भी रज़ामंदी थी. घूमफिरकर बात जब कश्मीर पर आई, तो मजहर अली खान ने कहा कि शिमला में कश्मीर पर बातचीत न की जाए क्योंकि इससे ‘भानुमती का पिटारा’ खुल जाएगा.

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उधर, जहीर ने मजहर अली खान से कहा कि वे कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान द्वारा अलगाववादियों को समर्थन न देने और कश्मीर की आजादी की मांग न उठाने का वादा करें. मजहर ने इस पर हामी तो भर दी, पर लिखकर देने से मना कर दिया. उनका कहना था कि पाकिस्तान में कोई भी सरकार कश्मीर की आज़ादी की बात उठाये बिना चल ही नहीं सकती.

जून 1972 में इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो शिमला में मिले. भारत ने दोनों मुल्कों के बीच होने वाले हर झगड़े, जिसमें कश्मीर भी शामिल था, को सुलझाने के लिए एक संधि की बात कही. पाकिस्तान, मुद्दा दर मुद्दा आगे बढ़ने की बात कर रहा था. डीपी धर, जो खुद कश्मीरी थे, चाहते थे कि इंदिरा कश्मीर मुद्दे पर बातचीत करें. पर हक्सर से प्रभावित इंदिरा मज़हर खान की राय पर अमल करना चाह रही थीं. वे पाकिस्तान में भुट्टो की कमज़ोर हालत भी समझ रही थीं. लिहाज़ा, उन्होंने धर की जगह हक्सर को बातचीत का ज़िम्मा दे दिया.

शिमला समझौते पर मोहर क्यों नहीं लगी?

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28 जून, 1972 से बातचीत शुरू हुई. मुलाकातों के दौर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रहे थे. समय निकलता जा रहा था. तीन जुलाई आ गई. रात के एक बजे के आसपास का समय था. अगले दिन वापसी थी. भुट्टो ने निजी मुलाकात में इंदिरा को बताया कि अगर वे शिमला से खाली हाथ चले गए तो उनकी सरकार गिर जायेगी और सेना दोबारा सत्ता हथिया लेगी जो दोनों देशों के लिए मुफ़ीद न होगा. आगे उन्होंने कहा कि एक बार वहां हालात माकूल हो जाएं तब पाकिस्तानी अवाम को भरोसे में लेकर वे लाइन ऑफ़ कंट्रोल को सीमा रेखा मानने पर राज़ी कर लेंगे और इससे कश्मीर मसला भी हल हो जाएगा.

सो तय हुआ कि कश्मीर पर बदले हालात के मद्देनज़र बात बाद में की जायेगी, दोनों मुल्क ‘लाइन ऑफ़ कंट्रोल’ की इज्ज़त करेंगे. इस बात के आगे भुट्टो ने हाथ से लिख दिया ‘दोनों पक्षों की मौजूदा स्थिति पर कोई द्वेष न रखते हुए.’ यह भारत की जीत थी. भारत ने इसमें एक अहम बात और जुड़वा दी. वह यह थी कि दोनों मुल्क शांतिप्रिय तरीकों से आपसी झगड़े सुलझा लेंगे. यह एक तरीके से भारत का मास्टरस्ट्रोक था. इससे किसी तीसरे मुल्क या संस्था की मध्यस्थता की गुंजाइश ख़त्म हो गयी. भुट्टो की हालत मरता क्या न करता वाली थी. उन्हें मानना पड़ा. गुहा लिखते हैं, ‘भारत संधि चाहता था, उसे समझौता करना पड़ा.’ शायद इसलिए इसे ‘शिमला समझौता’ कहा जाता है.

आप सोच रहे होंगे मोहर वाली बात कहां गई. तो क़िस्सा यह है कि पाकिस्तानी पक्ष का सामान सड़क के रास्ते उसके मुल्क रवाना किया जा चुका था. चुनांचे, दस्तख़तों को सत्यापित करने के लिए भुट्टो के पास मोहर नहीं थी. सो उन्होंने सिर्फ़ दस्तख़त किये. इंदिरा गांधी ने भी ऐसा ही किया. मोहर लगने की रस्म बाकी रह गयी थी जो शायद बाद में पूरी की गयी.

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समझौते के बाद

अभी बमुश्किल डेढ़ हफ्ता भी नहीं गुज़रा था कि भुट्टो साहब ने पलटी मार ली. पाकिस्तान की संसद में कह दिया कि पाकिस्तान कश्मीर की अवाम के साथ है और अगर वहां आज़ादी के लिए आंदोलन होगा तो वह कश्मीरी जनता का साथ देगा. यानी बात वापस ढाक के तीन पात पर आ गई. रामचंद्र गुहा बड़े शानदार तरीक़े से इसे समझाते हैं, ‘आख़िर बांग्लादेश बनाकर भारत ने पाकिस्तान की मुस्लिम मुल्क की धारणा को तोड़ दिया था. उसके लिए कश्मीर को भारत से अलग करना अपना हिसाब बराबर करने का ख़्वाब है.’

कुलदीप नैय्यर लिखते हैं, ‘अगर पीछे मुड़कर देखा जाए तो दोनों मुल्कों को जंग की व्यर्थता समझ आ गयी थी. ये सही है कि 1999 में कारगिल का हादसा हुआ था पर ये जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ का दुस्साहस था. उसके बाद कोई बड़ी जंग नहीं हुई है. 2011 में तब पाक प्रधानमंत्री युसूफ रज़ा गिलानी ने कहा था कि कश्मीर का मसला जंग से नहीं बातचीत से हल होगा और यह इस्लामाबाद की नियति है.

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साहिर लुधियानवी ने अगली जंग से खौफ़ खाते हुए इसलिए कहा है कि:

‘गुजिश्ता (बीती) जंग में घर ही जले मगर इस बार

अजब नहीं कि ये तन्हाइयां भी जल जाएं

गुजिश्ता जंग में पैकर (शरीर) जले मगर इस बार

अजब नहीं कि ये परछाइयां भी जल जाएं

तसव्वुरात की परछाइयां उभरती हैं’