पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा बयान खूब चर्चा में रहा. उनका कहना था कि रामायण के दौरान माता सीता का जन्म टेस्ट ट्यूब बेबी प्रोजेक्ट का एक सबूत था. इससे पहले उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू का भी बयान आया था कि प्राचीन भारत में मोतियाबिंद की सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी होती थी. इसके पहले इससे मिलता-जुलता बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दे चुके हैं.
असल में इन दिनों ऐसे बयानों की बयार चल रही है. त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब का महाभारत काल में इंटरनेट और ऐसी ही दूसरी तकनीकें मौजूद होने वाला बयान भी काफी चर्चा में रहा. और तो और, महान वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग की मृत्यु के बाद भारत के विज्ञान और तकनीक मंत्री डॉ हर्षवर्धन दावा कर बैठे कि हॉकिंग ने आधुनिक विज्ञान की कई अवधारणाएं वेदों में मिलने की बात कही थी.
हर्षवर्धन भले आदमी कहे जाते हैं. वे अच्छे ईएनटी सर्जन भी हैं. उन्हें तो किसी कथन की सत्यता की जांच का तरीक़ा मालूम होना चाहिए था. लेकिन वे भी किसी संदेहास्पद साइट की जानकारी के आधार पर हास्यास्पद दावा कर बैठे.
असल में यह प्रवृत्ति भारत में 19वीं सदी में शुरु हुई थी. मौजूदा सरकार के राज में इसे कुछ ज्यादा सम्माजनक जगह मिल गई जो इस सरकार के राजनैतिक रुझान का नतीजा है. हालांकि यह भी ज़रूरी नहीं कि इसके सारे समर्थक हिंदुत्ववादी ही हों.
19वीं सदी में जब भारत का अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद के रूप में पश्चिमी आधुनिकता से सामना हुआ तो बौद्धिक स्तर पर तीन क़िस्म की प्रतिक्रियाएं हुईं. उपनिवेशवाद के समर्थन में अंग्रेज़ आकाओं का कहना यह था कि भारत एक अज्ञान और अराजकता में डूबा हुआ भूखंड है जिसे जिसके पास न तो ज्ञान है, न तमीज़ और इसलिए वे भारत को उबारने आए हैं. कुछ लोगों ने विजेताओं के इस तर्क को स्वीकार कर लिया और कमोबेश मान लिया कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धर्म सब हेय है और वे अंग्रेज़ों की नक़ल करने लगे.
दूसरी प्रतिक्रिया इसके ठीक विपरीत हुई, यानी कुछ लोगों ने यह ताल ठोक दी कि जो कुछ श्रेष्ठ है वह तो भारत में ही है और पश्चिम में भी जो श्रेष्ठ दिख रहा है वह भारत में बहुत पहले से था. चूंकि भारत का वर्तमान तो पश्चिम से मुक़ाबला करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए वे अतीतजीवी हो गए.
तीसरे क़िस्म की प्रतिक्रिया ज्यादा तार्किक और विवेकपूर्ण थी. उन्होने अंग्रेज़ शासकवर्ग के इस दावे का तो सप्रमाण प्रतिकार किया कि भारत सदा से अंधेरे में डूबा एक अज्ञानी देश रहा है, लेकिन भारत की परंपरा के गौरव के साथ यह भी स्वीकार किया कि इस परंपरा में बहुत कुछ ऐसा है जो सड़ रहा है और जिससे मुक्ति की जरूरत है. उन्होंने पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही परंपराओं से जो श्रेष्ठ था उसे चुनने की कोशिश की. यह प्रक्रिया रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद से लेकर गांधी और विनोबा तक चलती आई.
ये तीनों धाराएं बिल्कुल अलग अलग नहीं थीं. जैसे आर्यसमाज में एक ओर धर्म और समाज में प्रगतिशील सुधारों के प्रति आग्रह था, दूसरी ओर ईसाइयत के प्रभाव में मूर्तिपूजा का निषेध और वेदों को क़ुरान और बाइबिल की तरह हिंदूधर्म की एकमात्र पवित्र पुस्तक मानने पर भी ज़ोर था, और तीसरी ओर, वेदों में सब कुछ ज्ञान विज्ञान मौजूद है यह दावा भी वहीं से आया है.
पहली दोनों धाराएं अतार्किकता, अविवेक और अंधविश्वास की तरफ़ झुकने वाली थीं. एक धारा यह मानती थी कि जो कुछ श्रेष्ठ है वह पश्चिम में ही है और अगर अंग्रेज़ आधुनिकता न लाते तो भारत असभ्य बना रहता. दूसरी धारा यह मानती थी कि जो भारत में था वही श्रेष्ठ था, ‘हज़ार वर्षों की ग़ुलामी’ ने भारत को कमज़ोर बना दिया. एक के लिए वह अंग्रेज़ी में लिखा कुछ भी आंख मूंदकर मानने के योग्य था, दूसरे के लिए संस्कृत में लिखा कुछ भी पत्थर की लकीर था. एक ओर पश्चिमी ज्ञान पर और दूसरी ओर प्राचीन भारतीय ज्ञान पर इस अंधविश्वास ने भारतीयों की स्वतंत्र और वैज्ञानिक चिंतन करने की क्षमता को कम कर दिया.
हुआ यह कि भारतीय नौजवान अंग्रेजी में ज्ञान-विज्ञान की किताबों को शास्त्रों की तरह रटकर लकीर के फ़क़ीर बनते रहे और दूसरी ओर प्राचीन भारत की परंपरा के नाम पर बेतुकी बातों पर विश्वास करने का सिलसिला चलता रहा. इसलिए ज़्यादातर भारतीय नौजवान विज्ञान पढ़कर वैज्ञानिक नहीं हुए और न ही परंपरा के पैरोकार कहलाने वाले परंपरा के जानकार हुए. ये दोनों तत्व भी अक्सर एक साथ पाए जाते हैं. इसीलिए अमेरिका में आईटी उद्योग में ऊंची तनख्वाहों पर काम करने वाले भारतीय लोग निहायत दक़ियानूसी और पुरातनपंथी या कट्टर सांप्रदायिक संगठनों के भी समर्थक होते हैं.
मैं हमारे मेडिकल कॉलेज के मित्रों के एक व्हाट्सएप ग्रुप का सदस्य हूं. इस ग्रुप के सारे ही सदस्य प्रतिभाशाली छात्र थे और अब समाज के प्रतिष्ठित डॉक्टर हैं लेकिन, वे सहज ही ऐसी बेसिरपैर की बातों पर यकीन कर लेते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त राष्ट्र संघ ने दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री घोषित किया है या जापान में जापानियों के लिए अरबी भाषा सीखने पर प्रतिबंध है. वे ज़रा ठहर कर इन बातों की सचाई की जांच करने की कोशिश नहीं करते जो कि आज के इंटरनेट वाले युग में तो बहुत आसान है. डॉ हर्षवर्धन कोई अपवाद नहीं हैं.
मुद्दा पश्चिमी सभ्यता के वर्चस्व और कथित भारतीय परंपरा के बीच विरोध का नहीं है. ये दोनों पक्ष तो एक सिक्के के दो पहलू हैं. मुद्दा मानवीय और वैज्ञानिक चिंतन क्षमता और परंपरा की सही समझ का है. ये दोनों भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. हमारी परंपरा सचमुच बहुत समृद्ध और उजली है, इसलिए उसे मनगढ़ंत और हवाई दावों की जरूरत नहीं है.
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