जब हम अंधविश्वासों की बात करते हैं तो हमेशा ही धार्मिक या रूढ़िवादी अंधविश्वासों की सोचते हैं. हमारा मानना अमूमन यह होता है कि अंधविश्वास पुराने दौर की मान्यताओं और आधुनिकता के प्रति अज्ञान से पैदा होता है और अाधुनिक विचारों और जीवन शैली में अंधविश्वासों की कोई जगह नहीं होती. यह सच भी है कि धर्म और जाति या सामाजिक मान्यताओं के आंख मूंदकर अनुसरण से अंधविश्वास पैदा होते हैं जिनका नतीजा कभी ऑनर किलिंग, कभी किसी को डायन मानकर मार देने या किसी ढोंगी धर्मगुरु के प्रति अंधे समर्पण के रूप में सामने आता है. इस तरह की ख़बरें हम आए दिन देखते सुनते रहते हैं.

लेकिन अंधविश्वास का अर्थ अगर बिना सोचे-समझे किसी बात पर पूरी तरह भरोसा कर लेना है और उसके ख़िलाफ़ किसी अन्य तर्क या प्रमाण को नकार देना है तो ऐसा सिर्फ़ धर्म और रूढ़ियों तक तो सीमित नहीं रहता. हम अपनी ज़िंदगी में देखते हैं कि कई आधुनिक और ‘सेकुलर’ चीज़ों या लोगों के प्रति भी अंधविश्वास या अंधश्रद्धा पैदा हो सकती है. अगर किसी ढोंगी बाबा के प्रति श्रद्धा गलत है तो किसी फ़िल्म स्टार या खिलाड़ी या नेता का अंधभक्त होना भी तो उसी तरह की बात है. विज्ञापन तो हमें अंधश्रद्धालु बनाने का ही धंधा करते हैं. करोड़ों लोग गोरा बनाने की क्रीम का प्रयोग कैसे करते हैं जबकि यह प्रमाणित तथ्य है कि ये क्रीमें बेकार हैं? कैसे हम मान लेते हैं कि जो जीन्स कोई फ़िल्मस्टार या मॉडल पहनने का दावा करता है या करती है, वह श्रेष्ठ है? विज्ञापन बनाने वाले यह कैसे मान लेते हैं कि वे दावा करेंगे कि उनका टूथपेस्ट इस्तेमाल करने से दांत चमकने लगेंगे या उनका चॉकलेट पेय पीने से बच्चे सचमुच लंबे और बुद्धिमान हो जाएंगे? वे दावा करते हैं कि इसके वैज्ञानिक प्रमाण हैं और किसी कथित शोध के कथित निष्कर्ष भी पेश करते हैं.

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इससे यह पता चलता है कि विज्ञान के नाम पर भी अंधविश्वास फैलाए जा सकते हैं. ऐसा सिर्फ़ विज्ञापनों की दुनिया में नहीं होता. वास्तव में दुनिया के बहुसंख्य लोग इतना विज्ञान नहीं पढ़े होते, न ही यह संभव है कि हर कोई हर कथन की वैज्ञानिक सत्यता जांच ले, इसलिए विज्ञान के नाम पर बहुत सी भ्रांतियां फैलाई जा सकती हैं. हम लोगों को यह आदत हो गई है कि अगर यह कह दिया जाए कि अमुक अमेरिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ऐसा कहा है तो हम अक्सर बिना हील हुज्जत के उसे मान लेते हैं. यह वैज्ञानिक अंधविश्वास का एक रूप है.

वैज्ञानिक अंधविश्वास के दो रूप हम पहचान सकते हैं. पहला यह मानना कि दुनिया की हर बात को विज्ञान के ज़रिये जाना जा सकता है, बल्कि जाना जा चुका है. ऐसा विश्वास उन्नीसवीं सदी में बहुत मज़बूत हुआ. तब विज्ञान की तेजी से होती तरक़्क़ी से कई वैज्ञानिकों और अन्य क्षेत्र के लोगों को यह विश्वास हो गया कि अब इस सृष्टि के सारे नियम खोज लिए गए हैं, इसलिए विज्ञान में करने को कुछ नहीं बचा है, सिवाय जानकारियां जुटा कर उन नियमों के आधार पर उन्हें जांचने के. वास्तविकता यह थी कि तब तक परमाणु की संरचना तक नहीं पता थी.अक्सर विज्ञान पर यह विश्वास इतना पक्का होता है कि इसे मानने वाले लोग ऐसी बातों के अस्तित्व से ही इन्कार कर देते हैं जिसकी वे व्याख्या नहीं कर पाते.

‘विज्ञान सब कुछ जानता है और हर समस्या हल कर सकता है’ की धारणा ने विज्ञान को ही नुक़सान पहुंचाया क्योंकि अाखिर विज्ञान जो नहीं जाना गया है उसकी खोज ही तो है

इसके पहले एक विचारधारा पश्चिमी दर्शन में थी जिसे व्यवस्थित रूप उन्नीसवीं सदी के शुरु में प्रख्यात चिंतक ऑगस्ट कॉम्टे ने दिया. इसे ‘पॉजिटिविज्म’ कहते हैं. इस विचारधारा के प्रमुख सूत्र ये हैं कि तर्क और बुद्धि से जो चीज़ें समझी जा सकती हैं वे ही सत्य हैं. भावना या कल्पना का कोई मतलब नहीं है. इस दर्शन के मुताबिक समाज को भी एक यंत्र की तरह किसी व्यवस्था के रूप में समझा जा सकता है. इसलिए सामाजिक विज्ञान व्यर्थ हैं, सिर्फ़ प्राकृतिक विज्ञान ही सत्य तक पहुंचने के लिए ज़रूरी है. विज्ञान की तरक़्क़ी ने दर्शन शास्त्र की जरूरत को ख़त्म कर दिया है.

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इस विचार धारा का काफी विरोध बीसवीं सदी में हुआ. मैक्स वेबर और कार्ल पेपर जैसे नामी विचारकों ने इसका खंडन किया. अब ‘साइंसिटिज़्म’ और ‘पॉजिटिविज़्म’ के प्रत्यक्ष पैरोकार तो नहीं मिलते लेकिन ये प्रवृत्तियां किसी न किसी रूप में मौजूद हैं. इन प्रवृत्तियों से एक बड़ा नुक़सान यह हुआ कि विज्ञान के मौजूदा और आधिकारिक ज्ञान को ही प्रमाण मान लिया गया और तमाम ग़ैर पश्चिमी समाजों के सारे के सारे परंपरागत ज्ञान को हेय और अवैज्ञानिक मान लिया गया. उसमें बहुत कुछ सचमुच त्याज्य था लेकिन बहुत कुछ तत्कालीन पश्चिमी ‘वैज्ञानिक’ ज्ञान से ज्यादा वैज्ञानिक था. इससे उपनिवेशवाद को बल मिला.

इस तरह विज्ञान बड़े अर्थ में सत्य की खोज की बजाय एक ख़ास क़िस्म की व्यवस्था का नाम हो गया जिस पर सवाल खड़े करने का हक़ किसी को नहीं था. जैसे कि कई विद्वानों ने कहा कि ‘विज्ञान सब कुछ जानता है और हर समस्या हल कर सकता है’ की धारणा ने विज्ञान को ही नुक़सान पहुंचाया क्योंकि अाखिर विज्ञान जो नहीं जाना गया है उसकी खोज ही तो है. अगर हम अनजाने चीज़ के अस्तित्व से ही इन्कार कर देंगे तो उसकी सचाई तक कैसे पहुंचेंगे? जैसे बहुत वक्त तक पर्यावरण की चिंताओं को पिछड़े लोगों की गप्प मान कर ख़ारिज कर दिया गया था.

इसके सबसे व्यावहारिक उदाहरण स्वास्थ्य के क्षेत्र में मिलते हैं. जब हम मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे तब हमें पढ़ाया जाता था कि शिशु के स्वास्थ्य के लिए उसे तीन महीने के बाद से ठोस आहार देना ज़रूरी है. तब यह सरकारी प्रचार होता था कि गंवार और अनपढ़ लोग बच्चे को छह महीने तक कुछ ठोस आहार नहीं देते और बच्चे के स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंचाते हैं. अब वही स्वास्थ्य व्यवस्था बताती है कि बच्चे को छह महीने तक मां के दूध के अलावा कुछ नहीं देना चाहिए. बीच में एक दौर आया था जब डॉक्टर कहते थे कि किसी भी तरह का फ़ैट शरीर के लिए नुक़सानदेह है. तब लोगों से घी तेल छोड़ने को कहा जाता था. फिर बात यहां तक आई कि कुछ तेल तो अच्छे हैं, लेकिन जो परंपरागत खाने के तेल हैं, जैसे सरसों, मूंगफली वग़ैरह वे ठीक नहीं हैं, जो अखाद्य तेल रिफाइन करके खाने लायक बनाए जा सकते हैं, जैसे बिनौले, सूरजमुखी वग़ैरह वे बढ़िया हैं. घी, मक्खन तब त्याज्य था. फिर बात यहां तक आई कि थोड़ा घी मक्खन तो सेहत के लिए अच्छा है, और परंपरागत खाने के तेल ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक हैं.

हर तानाशाही की तरह विज्ञान की तानाशाही भी बुद्धि को बंद करना चाहती है. वास्तव में वैज्ञानिक नज़रिये का मतलब यह नहीं कि विज्ञान के नाम पर हर बात को मान लिया जाए और बाक़ी बातों को या तो गलत या अस्तित्वहीन क़रार दे या जाए  

काफी सालों तक यह कहा जाता था कि अंडे की सफ़ेदी तो ठीक है लेकिन इसका पीला हिस्सा तो ख़तरनाक है. तब नकचढ़े समृद्ध लोग अंडे की सफ़ेदी का ऑमलेट या हाफफ्राइड खाते थे, फिर यह ज्ञान आया कि अंडे की ज़र्दी के भी फ़ायदे हैं. हालांकि अब भी कुछ लोग अंडे की सफ़ेदी भर खाने का उपदेश देते हुए मिल जाएंगे. भारत में कई डॉक्टर अपने मधुमेह के मरीज़ों को आम से महरूम रखते हैं जबकि नया ज्ञान इसके ख़िलाफ़ है.

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इसकी वजहों पर इवान इल्यिच और डॉ मनु कोठारी जैसे कई विशेषज्ञों ने काफी लिखा है. पहली वजह तो यह है कि चिकित्सा तंत्र एक बहुत बड़ा बाज़ार है जो इस दावे पर ही खड़ा है कि वह सब कुछ जानता है. अगर आपका डॉक्टर विनम्रता से यह कहे कि आप को क्या बीमारी है या इसका क्या इलाज है, यह मैं नहीं जानता तो आप उसे मोटी फ़ीस क्यों देंगे ? इसीलिए यह तंत्र अक्सर आधे अधूरे ज्ञान को सत्य कह कर प्रचारित करता है जो तब तक चलता है जब तक और ज्यादा शोध उसे गलत नहीं साबित कर देता.

दूसरे, चिकित्सा में शोध बहुत मुश्किल और जटिल प्रक्रिया है. इसमें इतने जाने अनजाने कारक शामिल होते हैं कि पूरी ईमानदारी के बावजूद गलत निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है.आजकल हर अख़बार में स्वास्थ्य पर ख़ूब ख़बरें छपती हैं जिनमें किसी विदेशी संस्थान के शोध के हवाले से बताया जाता है कि अमुक विटामिन से बुढ़ापा दूर होता है या अमुक चीज़ सुपर फ़ूड है. दो दिन बाद फिर ख़बर छपती है कि ये बातें बेकार हैं. एक बार मैंने एक ही अख़बार के तीन पन्नों पर विटामिन बी के बारे में तीन विरोधाभासी ख़बरें देखी हैं.

ये ज़्यादातर शोध सांख्यिकीय होते हैं यानी किसी स्वास्थ्य व्यवस्था के आंकड़ों को लेकर उनसे निष्कर्ष निकालने की कोशिश की जाती है, जिसमें ज़ाहिर है काफी गड़बड़ी होने की संभावना है. हो सकता है कि डेनमार्क के पिछले बीस साल के पांच हज़ार लोगों के आंकड़े अमेरिका में पचास साल में चालीस हज़ार लोगों के आंकड़ों से अलग निष्कर्ष दें. कभी-कभार सनसनीख़ेज़ ख़बर बनाने और प्रचार पाने की इच्छा वैज्ञानिकों को भी तो हो सकती है. आख़िरकार वे भी इंसान हैं, और इसमें शोध के लिए फ़ंडिंग पाने में भी आसानी होती है. इसीलिए आप पाते हैं कि ख़बरों में अक्सर किसी बीमारी का अक्सीर इलाज पाने या किसी नई दवा को ढूंढने के जो दावे होते हैं, उनमें से ज़्यादातर ज़मीन पर नहीं अवतरित होते.

इन सब बातों का अर्थ यह नहीं कि आप विज्ञान पर विश्वास न करें. इनका अर्थ यही है कि विज्ञान पर अंधविश्वास न हो. हर तानाशाही की तरह विज्ञान की तानाशाही भी बुद्धि को बंद करना चाहती है. वास्तव में वैज्ञानिक नज़रिये का मतलब यह नहीं कि विज्ञान के नाम पर हर बात को मान लिया जाए और बाक़ी बातों को या तो गलत या अस्तित्वहीन क़रार दे या जाए. दुनिया में रहस्य हैं, इसलिए दुनिया दिलचस्प है और उन्हें खोजना भी अर्थवान है. अपने आंख-कान और दिमाग़ को खुले रखने का नाम ही वैज्ञानिकता है. इसी तरह अपने डॉक्टर पर भी भरोसा करें, लेकिन यह मानते हुए कि वह इंसान है, भगवान नहीं. अख़बारों और इंटरनेट पर छपने वाले स्वास्थ्य संबंधी दावों को तो ज़रा बारीक छलनी से ही छान कर मानिए.