स्वामी अग्निवेश पर हुए हमले को न्यायोचित ठहराया जाना जारी है. कहा जा रहा है कि कोई भी हमारे ‘धर्म’ के बारे में कुछ बोलेगा, तो हम उसे ये कर देंगे, वो कर देंगे! यहां तक कह रहे हैं कि अग्निवेश को केवल इतना ही पीटकर नहीं छोड़ना चाहिए था, बल्कि और भी बर्बरता की जानी चाहिए थी. यानी अब हमारी भीड़ हिंस्रता पूरी ढिठाई पर उतर आई है.

तर्क दिया जा रहा है कि स्वामी अग्निवेश ने अमरनाथ गुफा में बनने वाले बर्फ के शिवलिंग को प्राकृतिक परिघटना बताया था और मूर्तिपूजा की भी आलोचना की थी. आर्य समाज शुरू से ही हिंदू धर्म में रेडिकल सुधारों का आग्रह रखने वाला आंदोलन रहा है. धर्मसुधार के उसके तीखे रवैये पर पहले भी इसी मंच पर एक आलेख में विस्तार से चर्चा की जा चुकी है.

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भारत जैसे देश में धर्मसुधार केवल बुद्धिवादी रवैये से नहीं हो सकता. क्योंकि बुद्धिमानों की बातों को बिल्कुल उसी भावना में समझने के लिए उसी स्तर की बुद्धिमत्ता की जरूरत होती है. और उस स्तर की बुद्धिमत्ता और वैचारिक सहिष्णुता भारत की मौजूदा बहुसंख्यक आबादी में बहुत कम ही देखी जा रही है. इसके कई ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण रहे हैं.

दूसरी बात यह है कि जब धर्मसुधारक में एक खास प्रकार की सार्वजनीन करुणा देखी जाती है, जब उस सुधारक में वैज्ञानिक तथ्यों को भी आध्यात्मिक लहजे में रखने का कौशल होता है, तो समाज उसके रेडिकल विचारों को भी पचाने को तैयार हो जाता है. गांधी और विनोबा भारत में ऐसे ही हिंदू धर्मसुधारक के रूप में सामने आते हैं.

अमरनाथ यात्रा और मूर्तिपूजा, दोनों ही विषयों पर महात्मा गांधी और विनोबा के विचार देखें तो उन्होंने भी इन दोनों की व्यर्थता की ओर इशारा किया था, लेकिन उनका व्यक्तित्व और लहजा इस प्रकार का था कि लोगों में उसकी कोई ऐसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली थी. सितंबर, 1928 में अमरनाथ यात्रा के दौरान मूसलाधार बारिश में 5000 तीर्थयात्रियों के घिरने और बाकी दुनिया से संपर्क कटने की खबर आई, तो इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए महात्मा गांधी ने 16 सिंतबर, 1928 के गुजराती पत्र ‘नवजीवन’ में लिखा था -

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‘कहां अमरनाथ और कहां मोटर लारी? एक समय ऐसा था जब असंख्य लोग कन्याकुमारी से कश्मीर तक पैदल यात्रा करते थे और अनेक कष्ट सहकर अमरनाथ पर चढ़ते थे. जान का डर उस समय भी था. उस समय पुण्य की खोज में कितनों ने अपनी प्यारी जान गंवाई होगी, इसके आंकड़े आज हमारे पास नहीं है और न तब किसी के पास थे. वही सच्ची तीर्थ यात्रा थी. आज तो ठेठ अमरनाथ की तलहटी तक, लारियां जैसे माल लेकर जाती हैं वैसे ही मोटरें यात्रियों को लेकर जाती हैं और इस प्रकार यात्री सुखपूर्वक यात्रा करने में पुण्य समझते हैं...’

‘...इसके बाद का जो मार्ग पैदल या घोड़े से तय करना रह जाता है, उसे यात्री किसी तरह पूरा कर लेते हैं. यदि कोई उन्हें अंत तक लारियों में ले जाए या हवाई जहाज से अमरनाथ के शिखर पर उतार दे, तो वे इसी तरह जाना चाहेंगे. इस प्रकार मनुष्य सुख की खोज करता हुआ धर्म भावना के कारण कष्ट सहन करता है और मृत्यु आए तो उसका भी आलिंगन करता है. यह अन्धश्रद्धा है. अन्धश्रद्धा सुख की खोज करती हुई दुख सहन करने के लिए तैयार रहती है. सात्विक श्रद्धा दुख सहन करने में सुख मानती है...’

‘....सच्ची यात्रा हृदय के भाव पर निर्भर है. सच्ची यात्रा लोक-कल्याण की भावना से कष्टों का स्वागत करने और उन्हें सहन करने में है. पाठक देखेंगे कि मैंने अमरनाथ यात्रियों के कष्ट-निवारण के निमित्त कोई सहायता नहीं मांगी. मैंने उनके लिए दुःख भी प्रकट नहीं किया. वे यात्री सहायता ले ही नहीं सकते. उन्हें जो थोड़ी सी सहायता चाहिए वह उन्हें वहीं मिल जाएगी. जो मर गए सो मर गए. जो बचे थे वे नीचे पहुंचकर कष्टमुक्त हो गए. ऊंचे-ऊंचे पर्वतशिखरों पर चढ़नेवाले अनेक लोगों की दृष्टि से अमरनाथ का यह अनुभव स्पष्ट ही एक सामान्य घटना है.’

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ठीक इसी तरह जब विनोबा पूरे कश्मीर में पदयात्रा कर रहे थे, तो उन्हें भी किसी ने अमरनाथ यात्रा का सुझाव दिया होगा. इस पर 13 अगस्त, 1959 को कश्मीर के पहलगांव में अमरनाथ दर्शन करने वाले यात्रियों को संबोधित करते हुए विनोबा ने कहा था - ‘मैं तो रोज ही अमरनाथ दर्शन का आनंद लेता हूं, जब मैं अलग-अलग गांवों में गरीबों और लाचारों से मिलता हूं और भूख और बेरोजगारी की समस्या पर उनसे बात करता हूं. मेरे लिए तो पूरा जगत ही एक परिवार है, और जहां कहीं भी मैं जाता हूं वहां मेरे अपने ही भाई-बहन मुझसे मिलते हैं. ध्यान, जप, तप, सत्संगति, संयम, यात्रा आदि कुछ न कुछ किया जाए तो उससे चित्त बनाने में मदद मिलती है. वैसे इन चीजों से इसमें मुश्किलात भी पैदा हो सकती है. जैसे पापजाल में फंसकर मनुष्य का मन बंधन में पड़कर गिर सकता है, वैसे ही पुण्यजाल में फंसकर भी गिर सकता है....आज देश में गरीबों की माली गिरावट (आर्थिक पतन) हुई है और अमीरों की रूहानी गिरावट (आध्यात्मिक पतन). इसका मतलब यह नहीं है कि गरीब रूहानियत में आगे बढ़े हैं. दोनों की दोनों किस्म की गिरावट न हो यही मेरा उद्देश्य है.’

ठीक इसी तरह अपनी पुस्तक धर्मतत्व में विनोबा ने मूर्तिपूजा पर लिखा है - ‘मूर्तिपूजा तो दरअसल छोटे बच्चों के खेल सा है. कई लोगों की मनःस्थिति बच्चों की सी होती है, इसलिए भक्तिमार्ग में इन मूर्तियों का कुछ-न-कुछ उपयोग होता है. परंतु मूर्तिपूजा प्राइमरी स्कूल की पहली कक्षा है, एमए की नहीं. मूर्तिपूजा को हिन्दू धर्म में बहुत ऊंचा स्थान नहीं दिया गया है. जैसे अक्षर सीखने के लिए पत्थरों का उपयोग करते हैं, वैसी ही यह मूर्ति है. एक बार अक्षर पढ़ना आ जाए, पढ़ना-लिखना सीख जाएं, तो आप ग्रंथ पढ़ेंगे, और पत्थर (मूर्ति) को छोड़ देंगे. पत्थर की ऐसी मिसाल इस श्लोक में दी गई है-

अक्षरावगम-लब्ध्ये यथा स्थूल-वर्तुल-दृषत् परिग्रहः।

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शुद्धं बुद्धं परिलब्धये तथा दारु-मृण्मय-शिलामयार्चनम्।।

हिन्दू धर्म में मूर्तिपूजा के साथ-साथ मूर्तिगौणता का विचार भी समझाया गया है. ...अगर आपका मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं है, तो आपको उसकी उपेक्षा ही करनी चाहिए. मूर्तियां तो कई दफा तोड़ी गई हैं, लेकिन उससे मूर्तिपूजा मिटी नहीं, क्योंकि उसे मिटाने का वह तरीका नहीं है. आप मूर्तिपूजा को मुक्ति देना चाहते हैं, तो आपको ज्ञान-प्रचार करना होगा; मूर्ति से भी कोई महान चीज सामने रखनी होगी. जब भावना निर्माण होगी तब मूर्तिपूजा नहीं रहेगी. रामकृष्ण परमहंस पहले मूर्तिपूजा करते थे. बाद में उनका विचार बदला, दूसरा विचार सामने आया. तब वे मूर्ति के सामने बैठते थे, लेकिन उनके हाथों से पूजा होती ही नहीं थी. उनके मन में विचार आता था कि यदि यह मूर्ति परमेश्वर है, तो क्या यह फूल परमेश्वर नहीं है? तो फिर यह फूल क्यों यहां से उठाकर वहां रखना चाहिए? जहां यह विचार आया, वहां पूजा खत्म हो गई. इसलिए छोटे विचार को मिटाना है, तो ऊंचे विचार को लाना चाहिए. आप लोगों को विचार भी नहीं देंगे, और पत्थर भी फेंक देंगे, तो चलेगा नहीं.’

हां यह जरूर है कि स्वामी अग्निवेश या किसी भी ऐसे सुधारवादी व्यक्ति पर धर्मरक्षा के नाम पर हमला एक बर्बर और असभ्य समाज की निशानी है. ऐसा करने वालों को स्वामी विवेकानंद का इस विषय में दिया गया एक प्रसिद्ध वक्तव्य पढ़ना-समझना चाहिए. विवेकानंद ने कहा था - ‘आप लोगों में से कुछ को यह सुनकर आश्चर्य होता होगा कि भारत ही एक ऐसा देश है, जहां किसी विरोधी पंथ के लोगों पर कभी अत्याचार नहीं हुआ और जहां किसी मनुष्य को उसके पंथगत विश्वास के कारण तंग नहीं किया गया. आस्तिक, नास्तिक, अद्वैतवादी, द्वैतवादी, एकेश्वरवादी सभी वहां वास करते हैं और एक साथ बिना द्वेषभाव के रहते हैं...’

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‘जड़वादी चार्वाकों ने ‘ब्राह्मणों’ के मन्दिरों की सीढ़ियों पर से देवताओं के विरुद्ध, यहां तक कि स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध भी प्रचार किया; वे सारे देश-भर में यह उपदेश देते फिरे कि ईश्वर को मानना निरा अन्धविश्वास है; देव-देवता, वेद और धर्म आदि की बातें निरी कपोल-कल्पनाएं हैं, जिन्हें पुरोहितों ने अपने स्वार्थ और लाभ के लिए गढ़ा है. पर ऐसे प्रचारकों पर भी भारत में अत्याचार नहीं किया गया. बुद्धदेव जहां कहीं गये, उन्होंने हिन्दुओं द्वारा पवित्र मानी जाने वाली सभी पुरातन बातों को मिट्टी में मिला देने का प्रयत्न किया, पर उनके विरुद्ध एक आवाज तक न उठायी गयी और उन्होंने परिपक्व वृद्धावस्था में अपने शरीर का त्याग किया! ऐसा ही जैनियों के संबंध में हुआ. वे तो ईश्वर संबंधी धारणा की हंसी उड़ाते थे. उनका कहना था, ‘ईश्वर हो ही कैसे सकता है? ईश्वर की कल्पना तो केवल अन्धविश्वास है...’

‘...इसी प्रकार अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं....उस प्राचीन युग में मनुष्य उस रूप में ‘सभ्य’ नहीं था, जैसा कि हम आज उसे समझते हैं! तब उसने यह नहीं सीखा था कि वह इसलिए अपने भाई का गला काट ले कि वह उससे कुछ अलग विचार रखता है; उसने पंथ के नाम पर संसार को रक्त से नहीं नहलाया था, वह अपने भाई के लिए राक्षस नहीं बना था. तब वह मानवता के नाम पर सारी मानवजाति का वध नहीं करता था.’

यह कहा था स्वामी विवेकानंद ने. और आधुनिक भारत का संविधान बनाने वालों और बाद की सरकारों ने भी कहीं भी ‘ईशनिंदा’ या ‘ब्लैस्फेमी’ का कानून बनाने की जरूरत नहीं समझी. औपनिवेशिक शासकों द्वारा बनाए गए ‘भारतीय दंड संहिता’ में अवश्य ही धारा-295ए में इस तरह का प्रावधान मिलता है. लेकिन इसका इस्तेमाल भी केवल हेट स्पीच या धार्मिक उन्माद भड़काने के संदर्भ में ही बहुत सीमित रूप से होता रहा है. इस धारा को समाप्त करने की मांग भी होती रही है.

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देखा यही गया है कि जिन समाजों ने ईशनिंदा के कानूनों को सख्ती से लागू किया है, वहां पर धर्मसुधारों के सामान्य से सामान्य आग्रहों को भी सरकार और समाज दोनों के ही द्वारा बर्बरतापूर्वक कुचला गया है. इस तरह उन समाजों ने अपने सुधार के सारे द्वार अपने ही हाथों बंद कर लिए हैं. ऐसा करके उन्होंने अपनी नई पीढ़ियों को भी कट्टरता और धर्मांधता के भंवर में फंसा दिया है. भारत अभी तक ऐसा नहीं रहा है, लेकिन हाल की घटनाओं से ऐसे संकेत अवश्य मिल रहे हैं कि हो न हो हम भी उसी राह पर चलने को आमादा होते जा रहे हैं. यदि स्वामी अग्निवेश ने कुछ भी ‘भड़काऊ’ कहा और किया भी, तो धारा-295ए के तहत उनपर कानूनी कार्रवाई हो सकती थी. ये क्या कि कोई भी दस-बीस लोगों की भीड़ इकट्ठी हो और किसी को भी घेरकर मारने लगे! यह कहते हुए कि हमारी कथित आस्था और भावना को ठेस पहुंची है.

कठिन वैचारिक और सामाजिक संघर्षों के बाद राजनीतिक विकास के लंबे दौर में मनुष्यों ने ‘रूल ऑफ लॉ’ या ‘कानून के शासन’ की खोज की है. क्योंकि यदि कानून सर्वोपरि न होता, तो जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति होती. हर कोई हर किसी से लड़ रहा होता और हर कोई हर किसी से असुरक्षित होता. कानून का शासन आया तो स्वयं शासक तक उसी कानून से समान रूप से बंध गया.

भारत का मौजूदा भीड़वाद देखकर तो यही लगता है कि हम अपनी जनता में, अपने नागरिकों में ‘कानून के शासन’ के प्रति स्वाभाविक निष्ठा नहीं पैदा कर सके हैं. इसलिए हमारे सामने ऐसे जनमानस का निर्माण करने की चुनौती है जिसे कानून के शासन की समझ हो. उसमें जन्म से ही इस प्रकार के अघोषित सामाजिक अनुबंध का संस्कार डल चुका हो. दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति उसमें सहिष्णुता और सम्मान की भावना पूरी तरह विकसित हो चुकी हो. किसी विरोधी विचार का विरोध भी केवल वैचारिक रूप से अपने तर्क और विचार द्वारा करने का सलीका विकसित हो चुका हो.

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अभी एक और प्रवृत्ति देखने में आ रही है जहां सुधारकों को बार-बार यह कहा जाने लगता है कि आप केवल हमारे (किसी एक) धर्म के बारे में ही क्यों बोलते हैं, दूसरे धर्म की बुराइयों पर क्यों नहीं बोलते? यह तर्क दरअसल बहुत ही बचकाना है और अपने दोषों पर पर्दा ढंकने की कोशिश है. उदाहरण के लिए, यदि मैं अपने बच्चे में सुधार के लिए उसे डांटूं-समझाऊं और मेरा बच्चा कहे कि आप केवल मुझे ही क्यों डांटते हो, पड़ोसी के बच्चे को क्यों नहीं डांटते या अन्य सभी बच्चों को क्यों नहीं डांटते, तो यह कितना बेतुका होगा.

हर धर्म के मानने वालों का अधिकार और कर्तव्य है कि वह सबसे पहले केवल और केवल अपने धर्म में सुधार का प्रयास करे. पहले अपने घर को ठीक करे. सभी धर्मों पर टीका-टिप्पणी तो वही कर सकता है जो सार्वजनीन करुणा से युक्त होकर संत या बुद्ध बन चुका हो. गुरुवायूर मंदिर में दलितों के प्रवेश-आंदोलन के दौरान गांधीजी ने मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों को इस आंदोलन से दूर रहने को कहा था. क्योंकि इससे मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाकर इसे एक धर्म बनाम दूसरे धर्म के झगड़े का रूप दे दिया जाता है.

आज जो लोग इस तरह की दलील देते हैं, उनकी मंशा भी यही होती है. जो समाज भीड़-हिंसा को किसी भी तर्क या बहाने से उचित साबित करने लग जाए, उसके बारे में समझ लेना चाहिए कि वह बर्बरता और विनाश की राह पर चल चुका है. हमारा सारा प्रयास इस कुवृत्ति के उपचार की ओर होना चाहिए.