बीते हफ्ते संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया. यहां पर अपने भाषण के बाद राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले भी लग लिए थे. मीडिया और खासकर सोशल मीडिया पर इस बात की चर्चा अब भी जारी है. इससे जुड़ा शुरूआती विश्लेषण तो सिर्फ इतने तक ही सीमित था कि राहुल गांधी ने संसद में जबर्दस्ती पीएम मोदी के गले लगाकर ठीक किया या नहीं. लेकिन दूसरे दौर की चर्चाओं में यह अंदाजा लगाने की कोशिश भी की जा रही है कि आखिर राहुल गांधी ने ऐसा क्यों किया. कुछ लोगों को यह ढकोसला, तो कुछ को भावुकता में उठाया गया कदम लग रहा है जबकि राजनीति के जानकार यह मानने को तैयार नहीं है कि राहुल गांधी ने बगैर सोचे-समझे ऐसा कदम उठाया होगा. कुल मिलाकर इस एक सवाल के अलग-अलग जवाब बताए जा रहे हैं. आइए इन जवाबों के बारे में जानकर ये समझने की कोशिश करते हैं कि इनमें से कौन सा जवाब सही साबित होने की संभावना सबसे ज्यादा है.

जवाब - 1

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बीते मंगलवार को भाजपा की तरफ से गले लगाए जाने का सबसे अजीबोगरीब कारण बताया गया. दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदरपाल सिंह बग्गा ने एक अखबार से बातचीत करते हुए यह खुलासा किया कि राहुल गांधी ने किसी तांत्रिक के कहने पर प्रधानमंत्री को गले लगाया था. उन्होंने कांग्रेस से जुड़े एक सूत्र के हवाले से यह बात कही. बग्गा के अनुसार तांत्रिक का कहना था कि अगर राहुल गांधी अपने भाषण के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी छू लेंगे तो उनके प्रधानमंत्री बनने का योग मजबूत हो जायेगा.

तजिंदरपाल सिंह बग्गा जिस तरह के बयान देते रहे हैं और जैसा उनका राजनीतिक कद है, इस पर ध्यान दिया जाए तो ज्यादातर लोगों को उनके इस बयान पर नहीं बल्कि इसके खबर बनने पर हैरानी हुई होगी. बग्गा का यह बयान कुछ उसी स्तर का कहा जा सकता है जैसा दूर-दराज के गांव में फुर्सत में बैठा कोई अनपढ़-बेगार आदमी सोचता और बोलता है. मजे-मजे में कहें तो इससे भाजपा के एकदम गहरे जमीनी जुड़ाव का भी पता चलता है. इस तरह के जुड़ाव से कांग्रेस का तो पता नहीं लेकिन नरेंद्र मोदी के हिसाब से ‘नामदार’ और विदेश में पढ़े राहुल गांधी कोसों दूर लगते हैं. बग्गा का बेसिर-पैर वाला यह बयान यह भी बताता है कि भाजपा के छुटभैये नेता और सोशल मीडिया टीम किस तरह से मनगढ़ंत बातों की शुरूआत करते हैं और मीडिया उन्हें प्रचारित करता है.

जवाब - 2

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इससे अलग सोशल मीडिया या नुक्कड़ पर होने वाली चर्चाओं में इस झप्पी के पीछे एक अलग और बहुत ही साधारण कारण बताया जाता है. उदाहरण के लिए, सवाल-जवाबों की वेबसाइट कोरा डॉट कॉम पर भी यह पूछा गया था कि राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी को गले क्यों लगाया? इस सवाल के जवाब में सौरव घोष नाम के एक यूजर का कहना है कि ‘राहुल गांधी एक अच्छे इंसान हैं लेकिन एक योग्य राजनेता नहीं है. वे नरेंद्र मोदी को नहीं हरा सकते हैं लेकिन फिर भी उनमें इतनी हिम्मत है कि वे सही बात कहने के लिए खड़े हो सकते हैं. इसके साथ ही वे जानते हैं नरेंद्र मोदी उनके विरोधी है, दुश्मन नहीं. इसलिए उन्हें गले लगाना एक सामान्य सी बात है. इसके उलट इन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता और समर्थक एक दूसरे को दुश्मन की तरह देखते हैं, उन्हें इससे सीख लेना चाहिए.’

यह जवाब और सोशल मीडिया पर चल रही वे चर्चाएं जो पार्टी समर्थकों के बीच नहीं होती हैं, लगभग एक जैसी ही हैं. सोशल मीडिया पर राहुल गांधी का नरेंद्र मोदी को गले लगाना एक अच्छी शुरूआत की तरह देखा जा रहा है. यहां कहा जा रहा है कि बीते कुछ समय से बने माहौल में विपरीत या अलग विचार रखने वालों को मित्रवत देखने की परंपरा कम हुई है. इसलिए राहुल का, जबरन ही सही, गले लगना एक सहज-सकारात्मक व्यवहार है. इनमें से ज्यादातर लोग इस बात से सहमत और खुश नजर आते हैं कि राहुल गांधी ने अपनी छवि बेहतर करने के साथ-साथ देश का माहौल सुधारने की कोशिश में ऐसा किया है.

जवाब-3

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राहुल गांधी के गले लगने से जुड़ी तीसरी थ्योरी उन मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है जिनमें कहा गया है कि वे लंबे समय से इस बात की तैयारी कर रहे थे. एनडीटीवी की इस रिपोर्ट के अनुसार राहुल गांधी करीब तीन महीने से प्रधानमंत्री को सार्वजनिक तौर पर गले लगाने की इसलिए सोच रहे थे क्योंकि मोदी अक्सर ही उनके परिवार को निशाने पर लेते रहते हैं. यह रिपोर्ट कहती है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री को गले लगाकर अपनी सहिष्णुता का प्रदर्शन करना चाहते थे. वे ऐसा करके देश को दो परस्पर विरोधी राजनीतिक धाराओं के बारे में प्रभावी तरीके से बताना चाहते थे. रिपोर्ट यह भी कहती है कि अगर यह झप्पी कई महीनों की तैयारी का परिणाम न भी हो तो भी कुछ हफ्तों के सोच-विचार के बाद जरूर दी गई थी.

कुछ लोगों को यह कारण सबसे अधिक विश्वसनीय इसलिए भी लग सकता है क्योंकि गांधी परिवार पहले भी ऐसा कर चुका है. साल 2000 में खुद सोनिया गांधी ने अपने पति राजीव गांधी की हत्या की मुख्य अभियुक्त नलिनी श्रीहरन की सजा को मृत्युदंड से आजीवन कारावास में बदलने के लिए दया याचिका लगाई थी. इसके कुछ सालों बाद 2008 में प्रियंका गांधी भी नलिनी से मिलने वेल्लूर जेल गईं थी. जो गांधी परिवार अपने पिता के हत्यारों के साथ ऐसा बर्ताव कर सकता है, उसके लिए सिर्फ जुबानी हमले करने वाले नरेंद्र मोदी को गले लगाना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए!

लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि इस तरह गले लगने का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं हो सकता है. इसका सबसे सटीक उदाहरण साल 1997 में कांग्रेस का इंदर कुमार गुजराल की सरकार से समर्थन वापस ले लेने का है. उस साल जैन कमीशन की एक रिपार्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि राजीव गांधी की हत्या के तार डीएमके से भी जुड़ते हैं. उस समय गुजराल के नेतृत्व में बनी सरकार में डीएमके भी शामिल थी और कांग्रेस उसे बाहर से समर्थन दे रही थी. डीएमके को सरकार से हटाने की शर्त न मानने पर कांग्रेस ने गुजराल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था. लेकिन सात साल बाद - 2004 में - वही डीएमके सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले यूपीए का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.