देश के वित्तीय प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त करने का दावा करने वाली मोदी सरकार इसी मामले में कम से कम एक मोर्चे पर साफ-साफ अनियंत्रित दिख रही है. भाजपा के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014-15 से अब तक 4,880 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर ख़र्च किए हैं. पिछले हफ्ते केंद्रीय सूचना व प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राज्यवर्धन सिंह राठौर ने संसद को यह जानकारी दी थी. राठौर के मुताबिक अप्रैल, 2014 से जुलाई, 2018 तक अपने 52 महीनों के कार्यकाल में सरकार ने अपने फ्लैगशिप कार्यक्रमों के विज्ञापनों पर यह रकम खर्च की है. सरकार द्वारा दी गई इस जानकारी पर इंडियास्पेंड ने एक रिपोर्ट तैयार की है, जो बताती है कि अगर 4,880 करोड़ रुपये की इस रकम को प्रचार से इतर कामकाज पर खर्च किया जाता तो इसका मतलब क्या होता. इंडियास्पेंड के आकलन के मुताबिक़ इस रकम से -
- देश के साढ़े चार करोड़ से ज़्यादा बच्चों को एक साल तक मिड-डे मील दिया जा सकता था.
- राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के लिए इस साल 4,213 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. अगर सरकार विज्ञापन के बजाय इस अभियान में पैसा लगाती तो इस काम के लिए 667 करोड़ रुपये और मिल सकते थे.
- सरकार देश के कई राज्यों में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) खोलने की बात करती है. 2014-15 से अब तक 20 नए एम्स खोलने की बात कही गई है. इनमें से छह एम्स चालू हो चुके हैं. बाक़ी का काम अभी अधूरा है. इस उद्देश्य के लिए अभी तक कुल 4,365.38 करोड़ रुपये की राशि ख़र्च की गई है. सरकारी विज्ञापनों पर ख़र्च हुई रक़म से इस काम के लिए 514.62 करोड़ रुपये और मिल सकते थे.
- स्वच्छ भारत अभियान मोदी सरकार के सबसे अहम कार्यक्रमों में शामिल है. इसके तहत 4,880 करोड़ रुपये में ग्रामीण इलाक़ों में क़रीब छह करोड़ नए शौचालय बनाए जा सकते थे.
- 4,880 करोड़ रुपये से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत 20 करोड़ 60 लाख से ज़्यादा लोगों को एक दिन का काम दिया जा सकता था.
- इस रकम के जरिए 2018-19 में राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव के लिए आवंटित की गई रक़म 67 प्रतिशत बढ़ाई जा सकती थी.
- इससे 920.75 मेगावाट सौर ऊर्जा पैदा की जा सकती थी जिससे चंडीगढ़ जितने बड़े शहर को चार घंटे की बिजली मिलती.
- इसरो ने मात्र 450 करोड़ रुपये की लागत में मंगलयान मिशन पूरा किया था. अगर सरकार अपने विज्ञापन ख़र्च का पैसा इसरो को देती तो वह 10 मंगल ग्रह अभियानों को अंजाम दे सकता था.
इस रिपोर्ट के मुताबिक़ एनडीए सरकार का विज्ञापन ख़र्च पूर्व की यूपीए सरकार द्वारा उसके अंतिम 37 महीनों में किए गए विज्ञापन ख़र्च का दोगुना है. आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली द्वारा हासिल की गई जानकारी में पता चला है कि मार्च 2011 से मार्च 2014 के बीच यूपीए सरकार ने अपने प्रचार में 2,048 करोड़ रुपये ख़र्च किए थे.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि एनडीए सरकार के तीन सालों के दौरान इन 4,880 करोड़ रुपये में से 292.17 करोड़ रुपये चार सरकारी योजनाओं के विज्ञापनों के लिए ख़र्च हुए. ये चार योजनाएं हैं - प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना, स्वच्छ भारत अभियान, स्मार्ट सिटी योजना और सांसद आदर्श ग्राम योजना.
साल दर साल मोदी सरकार ने अपने प्रचार में बढ़ोतरी की है. इससे विज्ञापनों का ख़र्चा भी बढ़ा है. रिपोर्ट बताती है कि साल 2014-15 में सरकार ने 980 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर ख़र्च किए थे. 2017-18 आते-आते इसमें 34 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ और यह रक़म बढ़कर 1,314 करोड़ रुपये हो गई.
सरकार विज्ञापन के लिए माध्यमों पर भी ख़ासा शोध करती लगती है. 2016-17 में सरकार ने प्रिंट विज्ञापनों के ख़र्च में कटौती की थी और रेडियो और टीवी जैसे माध्यमों पर ज़्यादा पैसा खर्च किया था. हालांकि 2017-18 में उसने इन दोनों माध्यमों से ज़्यादा पैसा प्रिंट विज्ञापनों पर ही खर्च किया. यह सिलसिला मौजूदा वित्तीय वर्ष में भी जारी है. इस साल अप्रैल से जुलाई के बीच मोदी सरकार ने प्रिंट विज्ञापनों पर जितना ख़र्च किया है, वह रेडियो और टीवी पर किए गए प्रचार का दोगुना है.
(यह रिपोर्ट इंडिया स्पेंड के लिए श्रेया रमन ने लिखी है. इंडिया स्पेंड एक गैरलाभकारी संस्था है जो आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टें तैयार करती है. यह संस्था सार्वजनिक पदों पर मौजूद व्यक्तियों या सार्वजनिक संस्थाओं के बयानों को तथ्यों के आधार पर जांचती-परखती है.)
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