इस साल कांवड़ियों के उत्पात को लेकर बहुत चर्चा हुई. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात का संज्ञान लिया. कांवड़िये हर काल श्रावण के महीने में निकलते हैं और पिछले कई वर्षों से उन दिनों में लगभग यही माहौल रहता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई सड़कें पूरी तरह या आंशिक रूप से उनके आने जाने के लिए बंद कर दी जाती हैं. जगह जगह उनके विश्राम के लिए भव्य शिविर लगाए जाते हैं. आम लोग डरे-सहमे रहते हैं कि कहीं किसा कांवड़िये से कोई हल्का सा टकराव भी न हो जाए वरना शामत आ सकती है.

लेकिन इस बात की अब तक इतनी चर्चा नहीं होती थी. लोग उसे एक सालाना दिक़्क़त मान कर बर्दाश्त कर लेते थे. इस साल उसकी इतनी चर्चा शायद इसलिए हुई है क्योंकि हिंदुत्व का सर्वव्यापी माहौल जैसे बनाया गया है, उसके साथ ही उसका विरोध भी बढ़ा है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने हेलिकॉप्टर से फूल बरसा कर विरोध की इस आग में घी डाल दिया. चूंकि कांवड़ियों के उत्पात को व्यापक हिंदुत्व परियोजना के हिस्से की तरह देखा गया , इसलिए इस बार इस पर विवाद भी ज्यादा हुआ.

आज से क़रीब 30 साल पहले तक कांवड़ियों की ऐसी डराने वाली छवि नहीं थी. तब भी लोग कांवड़ लेकर निकलते थे लेकिन उनकी तादाद कम रहती थी और उनके स्वागत और आवभगत के लिए ऐसी तैयारियां भी नहीं होती थीं. तब यह एक परंपरागत धार्मिक आयोजन ज्यादा था, हिंदुत्व की परियोजना का हिस्सा नहीं था. रामजन्मभूमि आंदोलन के साथ इस तरह की धार्मिकता बहुत बढ़ी.अब भी हो सकता है कि बडी तादाद में कांवड़ लेकर आने वाले लोग शुद्ध धार्मिक भाव से ऐसा करते हों, लेकिन अब उसमें मिलावट बहुत ज्यादा हो गई है. जो नए लोग इस यात्रा में शामिल हो रहे हैं उनमें से ज़्यादातर सात्विक धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि नए उग्र हिंदुत्व के तहत ज्यादा आ रहे हैं. इसलिए वे ज्यादा उग्र और हिंसक भी हैं. ये लोग आजकल के गोसेवकों के ज्यादा क़रीब हैं , बल्कि हो सकता है कि इन्हीं में से काफी ‘गोसेवा’ का पवित्र कार्य भी करते हों.

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हम देखते हैं कि उग्र और आक्रामक युवाओं की एक भीड़ इस वक्त देश में अनौपचारिक रूप से संगठित है. यह भीड़ सड़क पर मॉब लिंचिंग में व्यस्त है तो सोशल मीडिया पर चरित्र हनन में जुटी हुई है. कहीं यह भीड़ किसी असहमत लेखक का भाषण रुकवाने में लगी है तो कभी किसी किसी किताब का प्रकाशन रुकवाने में. किसकी पगड़ी यह भीड़ उछाल दे या किसे सड़क पर पीट दे, कोई ठिकाना नहीं. इसी भीड़ के ज्यादा उग्र सदस्य गोली बंदूक़ और देसी बमों का भी सहारा ले रहे हैं.

अराजक और उग्र युवाओं का राजनीति में ऐसा इस्तेमाल हमने संजय गांधी के दौर में देखा था जब युवा कांग्रेसी उपद्रव मचाए थे. उन दिनों अगर युवा कांग्रेस सम्मेलन होता था तो रेलवे स्टेशनों पर दहशत छा जाती थी और दुकानदार दुकानें बंद करके भाग जाते थे. उनमें से ज़्यादातर ऐसे ही युवा थे जिन्हें अंग्रेजी भाषा में लुंपेन कहा जाता है. अर्धशिक्षित, आंशिक या पूर्ण बेरोज़गार और दिशाहीन युवा जिन्हें किसी सुप्रीम नेता ने कोई पहचान दिलाई हो. ऐसे लोग समाज में अक्सर उपेक्षित रहते हैं जिन्हें संजय गांधी के पांचसूत्री कार्यक्रम या हिंदुत्व ने समाज में डर की बदौलत ही सही इज्जत दिलाई हो. जिनसे पहले सिपाही भी ठीक से बात न करता हो उन पर पुलिस का आला अफ़सर हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए तो वे अपने नेता और मिशन के प्रति वफ़ादार और कृतज्ञ क्यों नहीं होंगे? साथ में अन्य आर्थिक और समाजिक लाभ तो हैं ही.

दिशाहीन युवाओं का ऐसा इस्तेमाल हमेशा से एकाधिकारवादी नेता एक गैरसंवैधानिक ताक़त के लिए करते आए हैं. बहुत सारे काम हैं जो किसी सरकार या पार्टी के अनुशासन के भीतर संभव नहीं होते. वे काम ये युवा करते हैं. दूसरे, इन नेताओं की वफ़ादारी किसी कार्यक्रम या संगठन से ज्यादा नेता या नेताओं के प्रति होती है इसलिए जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल निजी सेना की तरह किसी नेता या व्यवस्था के ख़िलाफ़ या अपने संगठन में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए किया जा सकता है. चूंकि ये उग्र युवा एक तरह से स्वतंत्र होते हैं इसलिए ये जो करते हैं उससे आधिकारिक तौर पर दूरी बनाई जा सकती है. उनकी हरकतों की ज़िम्मेदारी से इन्कार किया जा सकता है या उनकी औपचारिक निंदा भी की जा सकती है. जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा के वरिष्ठ नेता औपचारिक तौर पर मॉब लिंचिंग की आलोचना करते हैं लेकिन वे और कथित गोरक्षक भी इस आलोचना की असलियत जानते हैं.

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इस तरह के युवाओं के इस्तेमाल का एक बड़ा उदाहरण चीन से लिया जा सकता है. पचास का दशक ख़त्म होते होते माओ की ‘द ग्रेट लीफ फॉरवर्ड’ नीति के दुष्परिणाम सामने आ गए थे. चीन की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई थी. तब देंग जियाओ पिंग जैसे वरिष्ठ नेताओं ने माओ को किनारे करके सत्ता के सूत्र अपने हाथ में लेने का फ़ैसला किया. माओ ने जब यह देखा तो उन्होने सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर ऐसी ही नौजवानों की भीड़ को सक्रिय कर दिया. इन नौजवानों ने पार्टी और सरकार के समूचे ढांचे को तहस नहस कर दिया. इस ताक़त का अहसास उन उद्दंड नौजवानों के लिए किसी नशे से कम नहीं था कि बड़े बडे लोगों को वे सड़क पर लाकर पीट सकते थे. इस तरह माओ ने फिर अपनी सत्ता और केंद्रीय स्थिति हासिल कर ली.

युवा कांग्रेसियों की सत्ता उतनी तो नहीं थी लेकिन इतनी ज़रूर थी कि वे अपनी ही पार्टी के परंपरागत नेताओं को डरने पर मजबूर कर सकते थे. ऐसी कई कहानियां हैं कि कैसे युवा कांग्रेसियों ने किसी वरिष्ठ नेता की टोपी उछाल दी या उसे दूसरी तरह से अपमानित किया. अब के हिंदुत्ववादी वीर नौजवान भी वैसी ही सत्ता बनते नजर आ रहे हैं जिनसे भाजपा के अपेक्षाकृत उदार नेता भी या तो डरते हैं या उन्हें ख़ुश रखने की कोशिश करते हैं. सुषमा स्वराज का ट्रोल किया जाना या जयंत सिन्हा का मॉब लिंचिंग के आरोपितों को हार पहनाना क्या जतलाता है?

धर्म के नाम पर ऐसा माहौल बनने से धर्म की हानि ही होती है भले ही ऊपर से ऐसा लगे कि बहुत धार्मिकता का प्रसार हो रहा है. अगर धर्म अपनी आध्यात्मिकता, नैतिकता और परदुखकातरता को छोड़ कर ताक़त और सत्ता का व्यापार बन जाए तो यह धर्म का नुक़सान है. इस तरह के व्यापार को बढ़ावा देने वाले लोग करोड़ों लोगों को धर्म की वास्तविकता से विमुख करते हैं. माओ या संजय गांधी के सेक्युलर युवाओं के बरक्स धर्म के नाम पर दिशाहीन युवाओं को लेकर एक बड़ा ख़तरा यह है कि धर्म एक ज्यादा स्थायी तत्व है इसलिए धार्मिक उन्माद भी ज्यादा दिन टिक सकता है. ऐसे में यह प्रवृत्ति युवाओं को ज्यादा उग्र नेताओं की तरफ़ ले जा सकती है. तब ये युवा उन नेताओं के नियंत्रण से निकल जाएंगे जो अब उन्हें नियंत्रित कर रहे हैं. ज्यादा उग्र धार्मिक नौजवानों के ऐसे स्वायत्त समूह बहुत बड़ा ख़तरा बन सकते हैं जैसा कि पाकिस्तान में हुआ है जहां उग्रवादी गिरोह अब सेना तक के क़ाबू में नहीं हैं.

यह नौजवानों के लिए भी बुरा है कि वे देश और समाज के लिए कोई रचनात्मक योगदान देने की बजाय छद्म धार्मिकता , नफ़रत और हिंसा की आग में खुद जलें और दूसरों को भी जलाएं. इन पर ग़ुस्सा करने की बजाय इनसे सहानुभूति के साथ संवाद करना ज़रूरी है ताकि ये भस्मासुर न बनें.