80 के दशक की शुरुआत में मुंबई (बॉम्बे) की कपड़ा मिलों में हुई हड़ताल ने शहर की स्काइलाइन और देश में मजदूर संघ और प्रबंधन के बीच के समीकरण हमेशा के लिए बदल दिए थे. यूं तो यह एक ग़ैर राजनैतिक हड़ताल थी, पर इसने केंद्र की कांग्रेस और राज्य सरकार की पेशानी पर सिलवटें डाल दी थीं. हड़ताल की अगुवाई करने वाला कोई कामगार नहीं बल्कि पेशे से डॉक्टर था. ये थे दत्तात्रेय या दत्ता सामंत जिन्हें मिलों के कामगार ‘डॉक्टर साहब’ कहकर बुलाते थे. बड़े से बड़े उनसे राजनेता खौफ़ खाते थे. दत्ता सामंत मज़दूरों के आन्दोलन को हिंसक रुप देने में अहम भूमिका निभाई थी. यह जनवरी 1982 का किस्सा है.

दत्ता सामंत का उभार

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दत्तात्रेय सामंत महाराष्ट्र के पश्चिमी भाग यानी कोंकण से आते थे. यहीं से मुंबई की कपड़ा मिलों को मज़दूर मिला करते थे. दत्ता सामंत की कोई राजनैतिक विचारधारा तो नहीं कही जा सकती, पर मिल कामगारों पर उनका ज़बरदस्त प्रभाव था. मुंबई की मिलें ठाणे-मुंबई इंडस्ट्रियल बेल्ट में थीं और यहीं घाटकोपर में डॉ सामंत का क्लीनिक था. वहां बीमार कामगार उनसे इलाज करवाने आते. दत्ता सामंत उनसे बातें करते. उनकी परेशानियों और मजबूरियों को सुनते-सुनते वे कब उनके खैरख्वाह बन गए, यह उन्हें भी मालूम नहीं हुआ.

उस दौर में मिल मालिकों और इन संगठनों के बीच अक्सर तनातनी रहती थी जो कभी कभी हिंसा में परिवर्तित हो जाती थी. सारे कामगार जॉर्ज फ़र्नांडिस, रसिकभाई जीवनभाई मेहता, शिव सेना और सेंटर फॉर ट्रेड यूनियन (सीटू) जैसे संगठनों के झंडे तले बंटे हुए थे. दत्ता सामंत इस सिलसिले की आख़िरी कड़ी थे और शायद मजदूरों के सबसे बड़े पैरोकार भी.

दत्ता सामंत की पहली सफल हड़ताल एम्पायर डाइंग के प्रबंधन के ख़िलाफ़ हुई थी. इसमें वे कामगारों की पगार 200 रुपए महीना बढ़वाने में सफल हुए थे. इसके बाद तो मिल वर्करों का हर छोटा- बड़ा संगठन उन्हें अपने यहां बुलाने लगा. दत्ता सामंत अपने विचारों और तेज़तर्रार रवैये के कारण मिल मालिकों के लिए इस कदर खौफ़ का पर्याय बन गए थे कि मिल मालिक उनके घर जाकर मज़दूरों की मांगों पर अपनी सहमति दिया करते.

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दरअसल, सत्तर के दशक में मजूदर संघ देश भर में फैल गए थे. कांग्रेस का आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस एक मज़बूत संगठन हुआ करता था. दत्ता सामंत इसी से जुड़े हुए थे. 1972 में वे महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर मुलुंड से जीतकर विधायक भी बने. पर कांग्रेस से जल्द ही उनका मोहभंग हो गया. आपातकाल में पत्रकारों के बाद इन मज़दूर संगठनों पर सबसे ज़्यादा गाज गिरी थी. जॉर्ज फ़र्नांडिस और कांग्रेस के संगठन से जुड़े होने के बावजूद दत्ता सामंत जैसे यूनियन लीडरों को सरकार ने जेल में डाल दिया था. आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में उद्योग मंत्री जॉर्ज फ़र्नान्डिस ने सीटू को बढ़ावा दिया और दत्ता सामंत इस संगठन से जुड़ गए.

गिरगांव ख़ामोश हो गया

मराठी में गिरगांव का मतलब ‘मिलों का गांव’ होता है. ये सेंट्रल बॉम्बे का हिस्सा था. यहां पर लगभग डेढ़ सौ कपड़ा मिलें थीं जिनमें तकरीबन तीन लाख कामगार काम करते थे. दत्ता सामंत की हड़तालों और हिंसक प्रदर्शनों के प्रभाव के चलते इन मिल मजदूरों की पगार काफ़ी बढ़ गयी थी. 1981 के मध्य में सामंत ने मिल मालिकों से न्यूनतम मज़दूरी को 670 रुपये से बढाकर 940 रुपये करने को कहा. मिल मालिकों इससे इनकार कर दिया. नतीजे में 18 जनवरी 1982 को दत्ता सामंत ने मिलों में काम रोकने का आह्वान कर दिया. गिरगांव ख़ामोश हो गया. यह ख़ामोशी लगभग दो साल तक चली. तकरीबन दो लाख कामगार दत्ता सामंत की सरपरस्ती में खड़े हो गए थे.

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इंदिरा गांधी को भी ख़तरा महसूस हुआ

इस हड़ताल ने देश में माहौल गरमा दिया. हज़ारों कामगारों ने गिरफ्तारियां दीं, कई जगह ख़ूनी झड़पें होने लगीं और मुंबई के बाकी उद्योगों पर भी इसका असर पड़ा. असर इस कदर था कि पुलिस कांस्टेबलों ने भी अपनी तनख्वाह बढ़ाने की मांग को लेकर यूनियन बना ली. बात इतनी बिगड़ गयी कि अर्धसैनिकों बलों को बुलाकर पुलिस की इस बगावत पर काबू पाया गया.

ज़ाहिर है यह सब इंदिरा गांधी की नीदें उड़ाने के लिए काफ़ी था. कांग्रेस को महाराष्ट्र में दत्ता सामंत से चुनौती महसूस हुई. जानकारों के मुताबिक इंदिरा गांधी ने फरमान जारी कर दिया कि चाहे जो हो जाये, दत्ता सामंत के आगे नहीं झुका जाएगा. झुकने का मतलब था कि मुंबई के बाकी उद्योगों के कामगारों की मांगें भी माननी पड़ सकती थीं. महाराष्ट्र सरकार ने मिल मालिक संगठनों के पीछे पूरी ताक़त झोंक दी. इन मालिकों को शुरुआत में तो दिक्कत हुई पर यह कुछ और भी योजना बना रहे थे.

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मुंबई की स्काइलाइन को बदलने की योजना

जैसा ऊपर लिखा गया है, गिरगांव सेंट्रल मुंबई का हिस्सा था. मुंबई की रिहाइशी ज़रूरतें तेज़ी से बढ़ रही थीं. बिल्डरों की इस इलाके पर पहले से ही नज़र थी. तो हुआ यह कि मिल मालिक हड़ताल का हवाला देकर अपनी मिलों को मुंबई के बाहर ले जाने लगे और मिलों की ज़मीनों को ऊंचे दामों पर बेचकर भारी मुनाफ़ा कमाने लगे. एक मायने में हड़ताल उनके लिए फ़ायदे का सौदा साबित होने लगी. उधर बेरोज़गारी बढ़ने लगी.

हड़ताल का नतीजा क्या हुआ?

दो साल लंबा समय होता है. मिलें बंद होने के नाम पर कामगारों को प्रोविडेंट फंड और अन्य जमाराशि से भी हाथ धोना पड़ गया. उनमें फूट पड़ गयी और हड़ताल की धार कुंद होती चली गयी. सरकार नहीं झुकी और दत्ता सामंत अपने जीवन की सबसे अहम लड़ाई हार गए. सेंट्रल मुंबई में शॉपिंग मॉल और रिहाइशी इमारतें खड़ी होने लगीं. बेचारे कामगारों के हाथों कुछ नहीं आया.

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इस नतीजे के कई मायने थे. मजदूर संगठनों की हार को भारत में वैश्वीकरण के लिए शुभ माना गया. ज़्यादातर मिलें गुजरात स्थापित हो गयीं थी तो इस हड़ताल को सूरत (गुजरात) और अन्य इलाकों के कपड़ा बाज़ार बनने की वजह के तौर पर भी जाना जाता है.

दत्ता सामंत का अंत भी बेहद खौफ़नाक हुआ. 1997 में जब वे अपने घर से दफ़्तर जा रहे थे तो उनकी कार को धोखे से रुकवाकर उनके जिस्म को गोलियों से छलनी कर दिया गया. कुछ लोगों ने इसे राजनैतिक हत्या बताया पर कुछ सालों बाद खबर आई कि इसमें छोटा राजन गैंग का हाथ था. दत्ता सामंत के बाद फिर कोई उन जैसा तेज़तर्रार यूनियन लीडर नहीं हुआ और न ही कोई हड़ताल इतनी लंबी चली.