करीब 20 महिला पत्रकारों द्वारा यौन कदाचार के आरोप लगाए जाने के बाद विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने बुधवार को आख़िर इस्तीफ़ा दे ही दिया या शायद देना पड़ा. इस्तीफ़े के बाद जारी बयान में उन्होंने कहा है, ‘चूंकि मैंने न्याय पाने के लिए निजी स्तर पर अदालत जाने का फैसला किया है, इसलिए यह उचित होगा कि मैं पद छोड़कर निजी स्तर पर ही अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोपों को चुनौती दूं. इसीलिए मैंने विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा दिया है.’ जबकि यही अकबर मंगलवार तक पूरी तरह निश्चिंत नज़र आ रहे थे. वे अपने ऊपर लगाए गए आरोप और ऐसे अन्य आरोपाें को ‘कुछ वर्गों का वायरल बुखार’ बता रहे थे. कुछ ख़बरें ‘सुनी-सुनाई’ जैसी यह भी थीं कि सरकार और पार्टी नेतृत्व की तरफ से अकबर पूरी तरह आश्वस्त हैं और वे इस्तीफ़ा नहीं देंगे. लेकिन अचानक इस्तीफ़ा हो गया. सो ऐसे में सवाल हो सकता है कि पहले ऐसा क्या था जिसके दम पर अकबर निश्चिंत थे और फिर अचानक क्या हुआ कि उन्हें पद छोड़ना पड़ा या छोड़ने के लिए कह दिया गया.
इस्तीफ़ों और बर्ख़ास्तगियों पर मोदी सरकार का रिकॉर्ड अकबर को शायद आश्वस्त कर रहा था
अपने ऊपर लगे आरोपों पर जब अकबर ने अपना पक्ष रख दिया तो भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा ने जो कहा वह ग़ौर करने लायक था. इस मसले पर मीडिया के सवालों का ज़वाब देते हुए नरसिम्हा का कहना था, ‘एमजे अकबर ने इस विवाद पर अपना पक्ष रख दिया है. इस पर पार्टी का उनसे सहमत या असहमत होना कोई मुद्दा नहीं है.’ इससे एक संकेत स्पष्ट था कि इस मामले में पार्टी अकबर के साथ खड़ी है. फिर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का रिकॉर्ड भी था, जो अकबर की ‘आश्वस्ति का आधार’ बना हुआ था.
ग़ौर करने लायक बात है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार के बीते साढ़े चार साल के कार्यकाल में ऐसे कई मौके आए हैं जब केंद्रीय मंत्री विवादों में फंसे और उनके इस्तीफ़े मांगे गए. मसलन- शुरू-शुरू में ही मोदी सरकार को स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े विवाद का सामना करना पड़ा. मामला फर्ज़ी डिग्री हासिल करने का था. लेकिन सरकार पूरी मज़बूती से ईरानी के साथ खड़ी रही. हालांकि इस तरह का आरोप सिर्फ ईरानी पर लगा हो, ऐसा भी नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी पर भी ऐसे आरोप लगे. और अभी हाल में ही दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष अंकिव बसोया पर भी, जाे भाजपा के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र इकाई- अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता हैं. लेकिन मज़ाल है कि इनमें से किसी भी मामले में मोदी सरकार या भाजपा पर कोई फर्क पड़ा हो. तीनों मामलों में न कोई जांच हुई, न कार्रवाई.
वहीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर भी आरोप लगे थे कि उन्होंने ललित मोदी को भारत से भागने में मदद की थी. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के संस्थापक अध्यक्ष ललित मोदी पर वित्तीय अनियमितताओं के तमाम आरोप हैं. साथ ही काले धन को वैध बनाने की कोशिशों के भी. तब भी स्वराज और वसुंधरा के इस्तीफे की मांग हुई पर उस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ठप्पे से कहा था, ‘हमारे मंत्री इस्तीफा नहीं दिया करते. यह उनकी (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की तरफ इशारा) सरकार नहीं है.’
राजनाथ सिंह ने काफी हद तक सही ही कहा था क्योंकि यह इस्तीफ़ों और बर्ख़ास्तगियों का सिलसिला ही था जिसने यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार की छवि ‘भ्रष्ट और नाकारा सरकार’ की बना दी थी. यूपीए सरकार में शशि थरूर पहले मंत्री थे जिनसे इस्तीफ़ा लिया गया. थरूर पर आरोप थे कि उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर पत्नी सुनंदा पुष्कर को आईपीएल की कोच्चि फ्रेंचाइजी में हिस्सेदारी दिलवाई. यह मामला सामने आने के बाद सुनंदा ने हिस्सेदारी लौटा दी थी. इसके बावज़ूद यूपीए की चेयरपर्सन और कांग्रेस की तब अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे इस्तीफ़ा ले लिया था.
इसके बाद तो आरोप-दर-आरोप और इस्तीफा-दर-इस्तीफा का सिलसिला चल पड़ा. केंद्रीय संचार एवं सूचना मंत्री ए राजा, केंद्रीय कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण, रेल मंत्री पवन कुमार बंसल, लघु उद्योग मंत्री वीरभद्र सिंह, पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय, कानून मंत्री अश्विनी कुमार तक यह क्रम चलता रहा. इस सबसे बनी सरकार की ‘भ्रष्ट और नाकारा छवि’ ने यूपीए को लगातार तीसरी बार सत्ता तक पहुंचने से रोक दिया. राजनाथ के बयान से साफ था कि मोदी सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती सरकार की इस ग़लती से सबक सीखा है और वह इस्तीफ़ों-बर्ख़ास्तगियों से बनने वाली जनधारणा को लेकर भी सचेत है.
तो फिर अब अचानक क्या हुआ कि अकबर की विदाई हो गई?
इस सवाल का ज़वाब ‘टाइम्स नाऊ’ की एक ख़बर से कुछ-कुछ मिलता है. इसके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद इस पूरे मामले पर नज़र रखे हुए थे. उन्होंने अकबर को उनका पक्ष रखने के लिए वक़्त दिया और उन्होंने रखा भी. लेकिन आरोप लगाने वाली महिला पत्रकारों पर मानहानि का मुकदमा दायर करने का अकबर का फैसला उनके ख़िलाफ़ चला गया. बताया जाता है कि महिला पत्रकाराें पर मुकदमा दायर करने का फैसला पूरी तरह उनका अपना था. यानी इस बारे में उन्होंने सरकार के स्तर पर किसी से शायद मशविरा तक नहीं किया.
इसीलिए जब पता चला कि अकबर आरोप लगाने वाली महिला पत्रकारों पर मुकदमा दायर कर रहे हैं तो मोदी सरकार के तीन वरिष्ठ मंत्रियों ने इस बाबत खुले तौर पर प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी आपत्ति जता दी. इन मंत्रियों में दो वरिष्ठ महिला मंत्री भी थीं, जिन्हाेंने प्रधानमंत्री से साफ कहा कि महिला पत्रकारों पर ‘मुकदमा दायर किए जाने के बाद अकबर का समर्थन अब संभव नहीं होगा. सरकार की सेहत के लिए भी यह ठीक नहीं होगा.’ अकबर ने इस्तीफ़ा देते हुए जो बयान दिया है उससे भी इस ख़बर की काफ़ी हद तक पुष्टि होती है.
द इकॉनॉमिक टाइम्स की ख़बर भी अंदर की कहानी बताती है. इसके मुताबिक पार्टी और सरकार को पहले-पहल लगा था कि अकबर पर लगे आरोप फ़ौरी हैं. ये सोशल मीडिया की हलचल है जो कुछ दिन में ठंडी पड़ जाएगी. लेकिन जब लगातार आरोप-दर-आरोप सामने आते गए तो मुश्किल पेश आने लगी. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते भी हैं, ‘एक बाद एक आरोप रोज अख़बाराें की सुर्ख़ियां बटोर रहे थे. उन सब में समान रूप से एक ही बात कही जा रही थी. इससे सरकार की छवि पर सवाल उठ रहा था. पार्टी को भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा था.’ इसी तरह एक अन्य नेता कहते हैं, ‘अकबर पर लगे आरोपों का बचाव मुश्किल होता जा रहा था.’
सूत्र यह भी बताते हैं कि पार्टी और सरकार पर आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का भी दबाव था. आरएसएस के सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले संकेत दे चुके थे कि अकबर को गद्दी छोड़ देनी चाहिए. तिस पर ‘अकबर के शाहाना अंदाज़’ में दिए गए स्पष्टीकरण ने रही-सही क़सर पूरी कर दी. पार्टी के एक नेता की मानें तो, ‘अकबर पर आरोप लगाने वाली महिलाएं विस्तृत विवरणों के साथ सामने आ रही थीं. जबकि उन्होंने इन आरोपों के बचाव में जो बयान दिया उसमें स्पष्टीकरण कम और आरोप लगाने वालों को देख लेने का दंभ ज़्यादा दिख रहा था. अपने स्तर पर ही उन्होंने मानहानि का जो मुकदमा दायर करने का फैसला किया इससे भी यही बात साबित हुई. इसके बाद उनका बचाव कैसे संभव था?’
यानी आरोपों के बावज़ूद मंत्रियों के इस्तीफ़े न लेने का मोदी सरकार का सिलसिला अगर अकबर पर आकर टूटा है ताे इसके लिए सिर्फ उन पर लगे आरोप ज़िम्मेदार नहीं हैं, काफ़ी हद तक वे ख़ुद भी हैं.
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