कुछ महीने पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने 1989 के एससी-एसटी एक्ट के कुछ प्रावधानों को नरम करने का निर्णय दिया तो इससे इन वर्गाें के लोगों में गुस्सा देखा गया. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने इस फैसले को पलटने के लिए कानूनी रास्ता अख्तियार किया. उसने बाकायदा संसद के जरिए कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पहले की स्थिति को बहाल कर दिया.
इसके बाद से देश के अलग-अलग राज्यों से मोदी सरकार और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रति सवर्ण जातियों में गुस्से की बातें आ रही हैं. राजस्थान में भी जमीनी स्तर पर यह गुस्सा दिख रहा है और बिहार में भी. जो वर्ग इस मसले पर केंद्र सरकार से नाराज हैं उन्हें लगता है कि इस कानून के जरिए उनके साथ भेदभाव हो रहा था. उनका मानना है कि इस कानून का दुरुपयोग उनके खिलाफ होता रहा है और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने इसके प्रावधानों को नरम करके उनके साथ न्याय किया था.
इन वर्गों में गुस्सा इस बात को लेकर है कि जिस सरकार को इन लोगों ने 2014 में वोट देकर केंद्र की सत्ता में पहुंचाया, उसी सरकार ने इनके साथ जो न्याय उच्चतम न्यायालय ने किया था, उसे फिर से अन्याय में बदल दिया. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सवर्णों के बीच इस बात को लेकर काफी गुस्सा है. इनसे बातचीत करने पर यह पता चलता है कि ऐसे नाराज लोगों में से बहुत लोग अगले लोकसभा चुनावों में कोई भी उम्मीदवार नहीं चुनने का विकल्प यानी नोटा का इस्तेमाल कर सकते हैं. सोशल मीडिया पर इस तरह के कई अभियान भी चलाए जा रहे हैं.
सवर्ण जातियां पिछले कुछ समय से भाजपा के पक्ष में अधिक रही हैं. पहले इस वर्ग की कुछ जातियां कांग्रेस के साथ भी थीं लेकिन जैसे-जैसे भाजपा मजबूत होती गई, उसके समर्थन वर्ग में कारोबारियों के अलावा सवर्ण जातियां तेजी से जुड़ीं. ऐसे में इस वर्ग में भाजपा की केंद्र सरकार के प्रति नाराजगी की वजह से कुछ लोगों को यह अंदेशा है कि इससे भाजपा को नुकसान होगा.
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? बिहार के गांवों में सवर्णों के साथ-साथ पिछड़ी जातियों के लोगों से बातचीत करने पर इसके उलट तस्वीर उभरती हुई दिख रही है. ऐसा लग रहा है कि एससी/एसटी कानून पर सवर्णों की नाराजगी भाजपा को दूसरी तरीके से फायदा पहुंचा सकती है और यह फायदा उस नाराजगी से उपजे नुकसान पर भारी पड़ सकता है.
सबसे पहली बात तो यह कि भाजपा से नाराज होने के बावजूद सवर्ण मतदाता किसी दूसरी पार्टी को वोट देने की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि अधिकांश लोग नोटा का विकल्प आजमाने की बात कर रहे हैं. भाजपा को लगता है कि अगर सवर्ण मतदाताओं में से कुछ नोटा का विकल्प भी आजमाते हैं और नोटा के पक्ष में माहौल बनता है तो इससे जमीनी स्तर पर उसे दूसरे वर्गों का समर्थन मिल सकता है.
इसे दक्षिण बिहार की जमीनी स्थिति के जरिए समझते हैं. सवर्ण मतदाताओं को आम तौर पर सबसे मुखर माना जाता है. वे सार्वजनिक तौर पर अपने राजनीतिक रुझान को अभिव्यक्त करते हैं. मोदी सरकार से नाराजगी और नोटा के प्रति उनके रुझान से जमीनी स्तर पर अनुसूचित जातियों के लोगों में यह संदेश जा रहा है कि मोदी सरकार ने उनके लिए कुछ ऐसा बड़ा काम किया है कि जिससे अगड़ी जातियों के लोग नाराज हैं. पिछड़ी जातियों को यह लग रहा है कि ब्राह्मण, भूमिहार और ठाकुर अगर भाजपा और मोदी को गाली दे रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि इन अगड़ी जातियों के हित प्रभावित हुए हैं और दलितों के हितों की रक्षा की गई है.
इस इलाके में अनुसूचित जातियां पारंपरिक तौर पर भाजपा के साथ नहीं रही हैं. लेकिन अगड़ी जातियों की मोदी सरकार की नाराजगी की वजह से अपेक्षाकृत कम पढ़े-लिखे अनुसूचित जातियों में सरकार के प्रति सकारात्मक संदेश जाने से इस वर्ग के कुछ मतदाता भाजपा के साथ आ सकते हैं. इन लोगों को यह भी लग सकता है कि अगर सवर्ण नोटा के पक्ष में जा रहे हैं तो उन्हें और एकजुट होकर अपनी पसंद की पार्टी को कामयाब बनाना है.
जानकारों के मुताबिक अगर पिछड़ी जातियों में से एक हिस्सा भी भाजपा के पक्ष में गोलबंद होता है तो इससे पार्टी को सवर्णों की नाराजगी से नुकसान के मुकाबले अधिक फायदा होगा. इसकी वजह यह है कि सवर्ण जातियों के मुकाबले पिछड़ी जातियों में मतदान का प्रतिशत आम तौर पर काफी अधिक होता है. जो सवर्णों के गांव हैं, वहां मतदान प्रतिशत काफी कम होता है. क्योंकि इन गांवों से पलायन काफी ज्यादा है. जबकि पिछड़ी जातियों के गांवों से पलायन अपेक्षाकृत कम होने और संख्या में ज्यादा होने की वजह से मत प्रतिशत अधिक रहता है.
बिहार भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘मोदी सरकार जिस तरह से इस मसले पर कानून लाई उससे हमारे आधार में विस्तार होगा. अभी सवर्णों में से कुछ लोग भले ही पार्टी से नाराज दिख रहे हों लेकिन जो जमीनी राजनीतिक स्थितियां हैं, उनमें यह वर्ग किसी और के साथ नहीं जा सकता और चुनाव आते-आते यह वर्ग फिर से भाजपा के साथ आ जाएगा.’
मोटे तौर पर यही जमीनी स्थिति दूसरे राज्यों के लोगों से बातचीत करने पर वहां भी दिख रही है. ऐसे में अगर एससी/एसटी कानून अगर चुनावी मुद्दा बनता दिखे और भाजपा के समर्थन वर्ग में जमीनी स्तर पर विस्तार करता दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
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