सुप्रीम कोर्ट ने आज बिहार के 16 आश्रय गृहों में रहने वाले बच्चों के शारीरिक और यौन शोषण के आरोपों की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी. बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से ऐसा नहीं करने का अनुरोध किया था जिसे शीर्ष अदालत ने ठुकरा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इन मामलों की जांच कर रहे सीबीआई के किसी भी अधिकारी का उसकी पूर्व अनुमति के बिना तबादला न किया जाए. बता दें कि अब तक बिहार पुलिस इन मामलों की जांच कर रही थी.

पीटीआई के मुताबिक न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की रिपोर्ट में राज्य के 17 आश्रय गृहों के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी, इसलिए सीबीआई को ही इनकी जांच करनी चाहिए. सीबीआई इनमें से मुजफ्फरपुर आश्रय गृह यौन शोषण मामले की जांच पहले से कर रही है. वहीं, बाकी मामलों को लेकर उसने सर्वोच्च अदालत से कहा कि सैद्धांतिक रूप से वह जांच का काम अपने हाथ में लेने के लिए तैयार है. केंद्रीय जांच एजेंसी ने न्यायालय को यह भी बताया कि इस मामले में सात दिसंबर तक आरोप पत्र दाखिल किया जा सकता है.

इससे पहले मंगलवार को शीर्ष अदालत ने इन मामलों में उचित कार्रवाई नहीं करने पर बिहार सरकार के आचरण को ‘बहुत ही शर्मनाक’ और ‘अमानवीय’ करार दिया था. कोर्ट ने तभी संकेत दिए थे कि वह इन मामलों को सीबीआई के हवाले कर सकता है. इस दौरान न्यायालय ने काफी तल्ख शब्दों में कहा था कि ऐसे अपराध करने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के मामले में सरकार का रवैया ‘बहुत ही नरम’ और ‘पक्षपातपूर्ण’ रहा है. न्यायालय ने बिहार सरकार से सवाल किया था कि क्या ये बच्चे इस देश के नागरिक नहीं हैं?