निर्देशक : आनंद एल राय

लेखक : हिमांशु शर्मा

कलाकार : शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा, कैटरीना कैफ, तिग्मांशु धूलिया, शीबा चड्ढा, मोहम्मद जीशान अय्यूब, ब्रिजेंद्र काला

रेटिंग : 1.5/ 5

सालों की मेहनत से तैयार रोमांटिक हीरो की ‘छवि’ अब शाहरुख खान के लिए बोझ सरीखी बन चुकी है. यह बात तब बेहतर समझ आती है जब आप ‘जब हैरी मेट सेजल’ और ‘जीरो’ जैसी फिल्में देखते हैं. इन दोनों ही फिल्मों के निर्देशक मुख्तलिफ तौर-तरीकों वाली सुघड़ प्रेम-कहानियां कहने के लिए ही जाने जाते हैं लेकिन ताज्जुब की बात है कि प्रेम के सिनेमाई देवता शाहरुख खान के होने की वजह से ही उनकी ये रोमांटिक फिल्में निखर नहीं पातीं.

Advertisement

बात अभिनय की नहीं है. ‘जब हैरी मेट सेजल’ की ही तरह ‘जीरो’ में भी शाहरुख ने जबरदस्त काम किया है. बात है उस ग्रैंड तरीके से सच्ची मोहब्बत को परदे पर दिखाने की जिसके लिए शाहरुख नब्बे के दशक से जाने जाते रहे हैं. वहीं इम्तियाज अली और आनंद एल राय उन फिल्मों को बनाने के लिए जाने जाते हैं जो कि जमीनी किरदारों की कहानियां कहती हैं और तमाम सिनेमाई सम्मोहन का इस्तेमाल करने के बावजूद यथार्थ से गहरे जुड़ी होती हैं. लेकिन जब शाहरुख उनकी फिल्मों में आते हैं तो ट्रू लव को अति की भव्यता से दिखाने के चक्कर में हिंदी फिल्मों के ये न्यू एज फिल्मकार स्टोरीटेलिंग में चूक जाते हैं. प्यार पर एक महान फिल्म बनाने की उनकी महत्वाकांक्षा भारी-भरकम प्रवचन-नुमा महत्वहीन सिनेमा रच देती है.

मध्यांतर से पहले की ‘जीरो’ बवाल है. बउआ बवाल है और हिमांशु शर्मा की लिखाई बवाल है. शाहरुख, अनुष्का और कैट के तीन मुख्य किरदारों को दिलचस्प अंदाज में स्थापित किया जाता है और जनेऊ-धारी बउआ सिंह को केंद्र में रखकर आनंद एल राय एकदम राजकुमार हिरानी के स्तर का हास्य में डूबा मनोरंजन परोसते हैं. सेट आधारित इमारतों के घरों में सुर्ख रंगों के प्रयोग से लेकर जिंदादिल नायक, मुन्नाभाई एमबीबीएस जैसा स्कूटर-बाइक और बाकी की भी ज्यादातर विशेषताएं आपको हिरानी के सिनेमा की भरसक याद दिलाती हैं. आनंद एल राय की फिल्मों में होली और रंगों का मोटिफ भी हमेशा मिलता है और ‘जीरो’ में भी रंगों के इर्द-गिर्द एक बेहद प्यारा गीत ‘जब तक जहां में सुबह-शाम है’ रचा जाता है.

लेकिन, जैसा कि रोमांटिक हीरो की ‘छवि’ में ‘कैद’ शाहरुख खान की तकरीबन हर फिल्म के साथ होता है, ‘जीरो’ भी प्रिडिक्टिबल होने लग जाती है. और फिर धीरे-धीरे बोर करने लगती है. गीत गाते-गाते लड़का-लड़की एक-दूसरे को चाहने लग जाते हैं. फिर किसी कारणवश बहुत दूर हो जाते हैं. बाद में चलकर किसी तीसरे की वजह से हीरो को ट्रू लव का एहसास होता है और नायिका को पाने के लिए नायक पृथ्वी-मंगल एक कर देता है!

Advertisement

कुछ-कुछ ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘डीडीएलजे’ जैसी फिल्मों की कहानी लग रही है न ये? यही ‘जीरो’ की दिक्कत है. वो तमाम नए मसाले डालने के बावजूद – बौना शाहरुख, सरीब्रल पॉल्सी से ग्रस्त वैज्ञानिक अनुष्का शर्मा, प्यार की भूखी एक्ट्रेस कैटरीना, मेरठ से अमेरिका तक की अविश्वसनीय यात्रा - सब्जी वही पुरानी पकाती है. आखिर जब अरबी की ही सब्जी बनानी थी तो पनीर क्यों खरीदा?

पकाने से याद आया कि मध्यांतर के बाद ‘जीरो’ ड्रामा फिल्मों की एप्रोच पकड़कर पकाती भी बहुत है. पाक विधा में जिसे माहिर होकर कहानी अच्छी पकानी थी, वो पकाने वाली विधा न जाने कहां से सीख आती है और दो घंटे पैंतालीस मिनट की लंबी फिल्म मध्यांतर के बाद खूब विचित्र और खूब ही अझेल होती चलती है. ऐसा आनंद एल राय की फिल्मों में होते हुए देखा नहीं था क्योंकि अंत तक उनकी पुरानी फिल्में मनोरंजक बनी रही थीं.

लेकिन वही बात है न, कि रोमांटिक हीरो की सुपरछवि में कैद एक सुपरसितारे के लिए प्रेम का भव्य अनुष्ठान रचने और लिखने के चक्कर में ‘जीरो’ वह सब करने लग जाती है जिस पर विश्वास करना बेहद मुश्किल होता है. यथार्थवादी सिनेमा रचना छोड़कर आनंद एल राय और हिमांशु शर्मा सतही दृश्य-संरचना करने लग जाते हैं और मध्यांतर के बाद के शुरुआती कुछ दृश्य ही बता देते हैं कि वे अपने सिनेमा का हाथ झटककर पलायनवादी सिनेमा का हाथ पकड़ चुके हैं.

Advertisement

इन दृश्यों में से एक में शाहरुख तपाक से एक डांस कॉम्प्टीशन के फाइनल में पहुंच जाते हैं और सलमान संग ‘इश्कबाजी’ में ठुमके लगाते हैं. दूसरे में कई सारी स्थापित हीरोइनों को व्यर्थ किया जाता है और ये दृश्य खासा बेड़ागर्क बन पड़ा है.

‘जीरो’ पैसा खूब खर्च करती है और डिटेल में, तफ्सील से अपनी कहानी कहती है. लेकिन ऐसे कहती है कि लगता है कि मध्यांतर के पहले की स्क्रिप्ट जिन बेहद प्रतिभाशाली लेखक हिमांशु शर्मा ने लिखी है, उन्होंने इंटरवल के बाद काम से छुट्टी ले ली है! चिंपैंजी से लेकर चांद-तारे, मंगल-पृथ्वी तक कहानी का हिस्सा बनते हैं लेकिन परी-कथा के मिजाज की होने के बावजूद ऐसी अविश्वसनीय पटकथा से देखने वाले का कनेक्ट नहीं हो पाता. फिर यह भी होता है कि अमेरिका वाला घटनाक्रम लंबा इतना चलता है कि केवल शाहरुख खान की ट्रेनिंग के एक-से विजुअल्स देख-देखकर आंखें दर्द करने लगती हैं. आनंद एल राय कोई क्रिस्टोफर नोलन नहीं हैं, यह बात खुद उन्हें समझनी चाहिए थी.

बौने के रोल में शाहरुख खान ‘फैन’ के स्तर का बढ़िया काम करते हैं. उनका सर्वश्रेष्ठ काम अगर ‘स्वदेश’ और ‘चक दे इंडिया’ है तो ‘फैन’ के बाद ‘जीरो’ को भी उनके उम्दा काम के तौर पर याद किया जाएगा. हिमांशु शर्मा के लिखे छोटे शहर के इस स्वार्थी किरदार को उन्होंने न सिर्फ परदे पर जीवंत किया है बल्कि अपने पुराने हो चुके एक्सप्रेशन्स से उसे काफी हद तक मुक्त रखा है. उनकी एनर्जी का तेज अलहदा है जिस वजह से वे एक बार फिर दर्शकों को अपने प्यार में पड़ने पर मजबूर करने वाले हैं! ये भी होने वाला है कि खां साहब के चाहने वालों को उनका इतना बढ़िया अभिनय देखकर यह स्वीकार करने में वक्त लगने वाला है कि ‘जीरो’ एक अच्छी फिल्म कतई नहीं है!

Advertisement

सरीब्रल पॉल्सी नामक रोग की अभिव्यक्ति हिंदी सिनेमा में सबसे उम्दा तरीके से कल्कि केकला ने ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रा’ में की थी. ‘जीरो’ में अनुष्का शर्मा द्वारा की गई इसकी अभिव्यक्ति राजकुमार हिरानी के सिनेमा सरीखी ज्यादा है और सटल होने की जगह ऑन योर फेस होकर कई बार थोड़ी चुभती है. लेकिन ऐसे रिस्की किरदार को निभाने के लिए अनुष्का की दाद देनी होगी जो परदे पर सुंदर नहीं नजर आता, और फिल्म में उनका समर्पण देखकर उनकी ईमानदार नीयत की भी तारीफ होनी चाहिए.

ये बात और है कि अनुष्का और शाहरुख के बीच वाले प्रेम में वह इंटेन्सिटी नहीं है जो कि भव्य तरीके से ट्रू लव को पोट्रे करने की जरूरी आवश्यकता होती है. अगर यह प्रेम फिल्म के पहले हिस्से में हमें गहराई तक छू पाता तो दूसरे हिस्से की कई कमियों को ढकने के काम आ सकता था. एक सीन में जब कई सारे तारे टूटने लग जाते हैं और फिल्म दर्शकों को लंबे वक्त बाद इमोशनल करने में कामयाब होती है, तब जाकर यह बात और बेहतर समझ आती है.

आश्चर्यजनक रूप से कैटरीना कैफ ‘जीरो’ में अच्छा काम करती हैं. बवाल बउआ सिंह के अलावा यह चमत्कार देखने के लिए भी आप ‘जीरो’ देख सकते हैं!