बुधवार को भाजपा ने 2019 के आम चुनाव के लिए राज्य प्रभारियों के नाम का ऐलान किया. इसमें जिस नाम ने सबसे ज्यादा चौंकाया वह था गोवर्धन झड़ापिया का. वे एक समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कठोर आलोचक रह चुके हैं. कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी अपने विरोधियों को माफ करते हैं और न भूलते हैं. तो सवाल उठता है कि इसके बावजूद गोवर्धन झड़ापिया को उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य की जिम्मेदारी कैसे मिल गई.
गोवर्धन झड़ापिया की राजनीतिक यात्रा विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) से शुरू हुई. भाजपा में आने से पहले 15 साल वे वीएचपी में ही रहे थे. इसके चलते वे प्रवीण तोगड़िया के सबसे करीबी हो गए. जब गुजरात में केशुभाई पटेल शीर्ष पर थे तो हिंदू राजनीति के प्रतीक प्रवीण तोगड़िया ही थे. उन दिनों नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया अच्छे मित्र थे और कहा जाता है कि गुजरात के पुलिस अफसर तोगड़िया के इशारे पर चलते थे.
धीरे-धीरे प्रवीण तोगड़िया का कद बढ़ता गया और उनकी जुबान तीखी होती गई. एक वक्त ऐसा आया जब वे भाजपा के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भी कंट्रोल से बाहर हो गए. उस वक्त भाजपा में अटल-आडवाणी का राज था. बताया जाता है कि तब प्रवीण तोगड़िया को रास्ते पर लाने के लिए उनके मित्र नरेंद्र मोदी की गुजरात में वापसी हुई. हालांकि शुरू में मोदी के राज में भी तोगड़िया की ही तूती बोलती थी. उस समय उनके ‘राइट हैंड’ माने जाने वाले गोवर्धन झड़ापिया राज्य के गृह मंत्री हुआ करते थे. कहा जाता है कि 2002 में गुजरात में हुए दंगे भी इसीलिए काबू से बाहर हो गए थे
लेकिन 2002 के दंगों के बाद न सिर्फ झड़ापिया की कुर्सी चली गई बल्कि वे पार्टी में भी हाशिए पर चले गए. उनकी जगह यानी गृहमंत्री के पद पर आए अमित शाह. इसके बाद 2009 में गोवर्धन झड़ापिया ने अपनी अलग पार्टी बना ली. यह वह दौर था जब उन्होंने नरेंद्र मोदी पर कई गंभीर आरोप लगाए थे. उनका यह तक कहना था कि नरेंद्र मोदी खुद को लोकतंत्र से भी ऊपर समझते हैं. हालांकि 2014 में गोवर्धन झड़पिया फिर से भाजपा में वापस आ गये थे. लेकिन उनके लिए हालात में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ. 2017 के गुजरात चुनाव में उन्हें टिकट तक नहीं दिया गया था.
लेकिन अब गोवर्धन झड़ापिया उस प्रदेश के प्रभारी बन गए हैं जिसे पिछले लोकसभा चुनाव के समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह देखा करते थे. उस समय भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीती थीं. अब मोदी लहर का असर कम हो रहा है और वहां भाजपा के सामने सपा और बसपा के महागठबंधन से निपटने की भी चुनौती है. ऐसे में सवाल उठता है कि गोवर्धन झड़ापिया को ऐन लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी कैसे मिल गई?
जानकारों के मुताबिक झड़ापिया उस पाटीदार समुदाय से हैं जिसका काम मुख्य तौर पर खेती-किसानी है. पिछले कुछ समय में उन्होंने उत्तर प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में खेती-बाड़ी से जुड़े समुदायों के बीच करीब से काम किया है. माना जा रहा है कि उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देकर भाजपा ने उस किसान समुदाय को बड़ा संदेश दिया है जो आजकल भाजपा से नाराज चल रहा है. गोवर्धन झड़ापिया की छवि कट्टर हिंदूवादी नेता की भी रही है. इसलिए कुछ का यह भी मानना है कि इसके जरिये भाजपा ने सपा-बसपा के महागठबंधन की चुनौती के खिलाफ कट्टर हिंदूवाद का कार्ड भी खेला है.
गोवर्धन झड़ापिया के उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनने के औऱ मतलब भी निकाले जा रहे हैं. एक वर्ग के मुताबिक इसका अर्थ यह है कि आम चुनाव के लिहाज से सबसे अहम सूबे में अब आरएसएस की चल रही है. कुछ विश्लेषक इसे हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा की बड़ी हार के बाद मोदी-शाह के रवैये में आई नरमी का संकेत भी मान रहे हैं. उनके मुताबिक इस जोड़ी ने यह संकेत दिया है कि अब वह पार्टी के भीतर अपने विरोधियों के साथ भी मिलकर काम करने के लिए तैयार है.
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