सभी राजनीतिक पार्टियां कमोबेश ऐसा ही करती हैं जैसा 2014 से पहले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी ने किया. उसने लोगों को कई सपने दिखाए - वो देखो 15 लाख, वो देखो राम मंदिर, वो देखो भ्रष्टाचारी, वो देखो राष्ट्र का दामाद, वो अनुच्छेद 370….’ मोदी जी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आए, प्रधानमंत्री बने और अब पहला कार्यकाल पूरा भी करने वाले हैं. लेकिन जिन्होंने भी देखें होंगे उनके सपने अभी भी सपने ही हैं.

2019 फिर से चुनाव का साल है. इसमें एक नया सपना दिखाया जा रहा है - ‘एक नये आरक्षण का सपना’. इस मुद्दे को सपना कहना कितना सही है इसे जानने के लिए इससे जुड़े सभी पहलुओं को एक-एक कर समझते हैं:

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सबसे पहले चर्चा करते हैं ‘आर्थिक आरक्षण’ से जुड़ी क़ानूनी बहस पर. हमारे संविधान में कहीं भी आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है. अनुच्छेद 15 और 16 सिर्फ़ ‘सामाजिक और शैक्षणिक’ रूप से पिछड़े समुदाय को आरक्षण देने की बात करते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे संविधान निर्माताओं ने माना है कि ‘आरक्षण कोई ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है. लिहाज़ा इसका आधार आर्थिक पिछड़ापन नहीं बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन होगा.’

इससे इतना तो साफ़ है कि अगर सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण देना चाहती है तो पहले उसे संविधान में संशोधन करना होगा. सरकार ने इससे जुड़ा विधेयक लोकसभा में पारित करवा लिया है. जिस तरह का समर्थन इसे वहां मिला है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इसे राज्यसभा में भी ज्यादा मुश्किल नहीं होने वाली.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आगे इसकी राह में बस फूल ही फूल हैं. यह पहली बार नहीं है जब कोई सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात कर रही है. मंडल कमीशन लागू होने के बाद जब आरक्षण का ज़बरदस्त विरोध हुआ था, तब भी तत्कालीन सरकार ने दस प्रतिशत आरक्षण आर्थिक आधार पर देने की बात कही थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत ही उसके इस फ़ैसले को लंगड़ी मार दी थी. कई राज्यों ने भी समय-समय पर ऐसा आर्थिक आरक्षण देने के प्रयास किए जो विफल रहे.

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अगर मोदी सरकार की इस कोशिश को संसद की मंजूरी मिल जाती है तो उसे आगे जाकर इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट से भी निपटना ही होगा. अब अगर यह भी मान लें कि सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करता और ‘ग़रीब सवर्ण’ आरक्षण का पात्र बन जाता है (हालांकि इसकी संभावनाएं नगण्य हैं). तो अब आइए इस आरक्षण के व्यावहारिक पहलू पर.

अव्वल तो सवाल यह है कि ‘ग़रीब सवर्ण’ होगा कौन? वह जो ‘ग़रीब’ भी हो और ‘सवर्ण’ भी? पहले बात करते हैं ‘सवर्ण’ की. इस सवर्ण की परिभाषा में सिर्फ़ हिंदू सवर्ण होंगे या मुस्लिम, जैन, पारसी, बौद्ध, सिख, ईसाई आदि भी? आर्थिक आधार पर अगर कोई आरक्षण दिया जाता है, जो मौजूदा आरक्षण से इतर होगा, तो उसमें सभी ऐसे ग़रीब शामिल होंगे जो ‘अनुसूचित जाति’ ‘अनुसूचित जनजाति’ या ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ में नहीं आते. यानी एससी, एसटी और ओबीसी के अलावा सभी ग़रीब लोगों को इस नए आरक्षण का पात्र माना जाएगा चाहे वे किसी भी धर्म के हों.

‘ग़रीब सवर्ण’ को परिभाषित करने के क्रम में ‘सवर्ण’ की व्याख्या करना तो आसान है लेकिन ग़रीब कौन होगा? वह जो पीढ़ियों से ग़रीब है या जो हाल ही में ग़रीब हुआ है, वह जो पैदा ही ग़रीब हुआ था या जो बाप के बेदख़ल करने से ग़रीब हुआ? किसी अमीर की बेटी अगर ग़रीब से शादी कर लेती है तो क्या वह भी अब ग़रीब मानी जाएगी? कोई अगर अपना करोड़ों का व्यापार लुटाकर दिवालिया हो जाता है तो वह ग़रीब माना जाएगा या नहीं? और जिसका दिवाला अपनी जुआ खेलने की लत के कारण निकला हो, क्या उसे भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए?

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चलिए ये भी मान लेते हैं कि मोदी सरकार इन सभी सवालों से पार पाकर आरक्षण देने में सफल हो जाती है, तो फिर क्या होगा?

मीडिया रिपोर्टंस के अनुसार सरकार ग़रीब को परिभाषित करने के लिए जो पैमाने बना रही है उसमें एक यह भी है कि उस व्यक्ति की सालाना आय आठ लाख या उससे कम हो. आठ लाख सालाना आय का मतलब हुआ महीने के क़रीब 67 हज़ार रुपये. भारत में प्रति व्यक्ति आय 1.13 लाख रुपये सालाना है. इस लिहाज़ से देखें तो देश में गरीबों की औसत आय से सात गुना ज़्यादा कमाने वाले लोग भी इस आरक्षण के लिहाज से ‘ग़रीब’ माने जाएंगे. यानी कि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग इस आरक्षण के दायरे में आ जाएगा.

इससे संभवतः यह होगा कि सामान्य श्रेणी से ज़्यादा लोग ‘ग़रीब सवर्ण’ की श्रेणी में आवेदन करने लगेंगे. नतीजतन यहां भी मेरिट लगभग उतनी ही रहेगी जितनी सामान्य (जनरल) या अनारक्षित वर्ग में रहती है. यानी इस आरक्षण से न तो प्रतिस्पर्धा कम होने जा रही है और न ही ग़रीब सवर्णों को कोई अतिरिक्त लाभ मिलने जा रहा है. होगा सिर्फ़ इतना कि इस वर्ग में भी आवेदनकर्ता लगभग सामान्य वर्ग जितने ही अंक हासिल करके परीक्षा पास करेंगे लेकिन कहलाएंगे ‘आरक्षण के लाभार्थी’.

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अति आशावादी होकर कहा जा सकता है कि इस आरक्षण से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि अब हर जगह न्यूनतम दस प्रतिशत प्रतिनिधित्व ‘ग़रीब सवर्णों’ का होगा. लेकिन ये सवर्ण वास्तव में कितने गरीब होंगे यह हम ऊपर देख ही चुके हैं. नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में ऐसे ‘गरीब सवर्णों का प्रतिनिधित्व तो अभी भी 10 फीसदी से ज्यादा ही होगा.

यदि इस आरक्षण के दुष्परिणामों की बात करें तो इनकी फ़ेहरिस्त लंबी है. ऊपर लिखे तथ्यों और संभावनाओं के अलावा यह आरक्षण नये आरक्षणों की मांग को मजबूती देने का काम भी कर सकता है. तमाम विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछड़े वर्गों को मिल रहा आरक्षण उनकी आबादी की तुलना में काफ़ी कम है. अब अगर सरकार 50 प्रतिशत की ‘लक्ष्मण रेखा’ लांघ जाती है तो उस पर जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने और पिछड़े वर्ग को उसकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने का दबाव बनेगा. अब तक तो सरकार के पास यह तर्क था कि वह सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से बाध्य है इसलिए 50 प्रतिशत से ज़्यादा आरक्षण नहीं दे सकती.

इन तमाम पहलुओं से साफ़ है कि ‘ग़रीब सवर्ण’ को आरक्षण नाम का जो सपना मोदी सरकार दिखा रही है, वह पिछले कई सपनों की तरह दिन का सपना ही है. लेकिन इस बार खासियत यह है कि अगर किसी तरह यह सच हो भी गया, तो भी जनता के किसी काम का नहीं होगा.