चार फरवरी को राहुल गांधी ने जो कहा उसकी प्रष्ठभूमि 27 जनवरी में और 27 जनवरी को मुंबई में जो हुआ उसकी पृष्ठभूमि 26 जनवरी में देखी जा सकती थी. चार फरवरी को राहुल गांधी ने एक ट्वीट करके कहा - ‘बधाई हो, गडकरी जी. भाजपा में आप अकेले हिम्मत वाले व्यक्ति हैं... ’ इससे पहले तीन जनवरी को नितिन गडकरी ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि उन्हें पहले अपनी घरेलू जिम्मेदारियों की ओर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जो ऐसा नहीं कर सकते वे देश भी नहीं चला सकते.
इससे भी पहले गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और नितिन गडकरी दोनों साथ बैठे और कई बार बड़े सहज तरीके से बातें करते हुए कैमरे में कैद हुए. कांग्रेस अध्यक्ष और नरेंद्र मोदी सरकार के बीच जिस तरह के शब्दबाण चल रहे हैं उस माहौल में किसी केंद्रीय मंत्री की राहुल गांधी से इस तरह की नजदीकी भाजपा के कई नेताओं को खटकनी ही थी. लेकिन अगले ही दिन नितिन गडकरी ने इससे कई कदम आगे निकलते हुए मुंबई में कहा, ‘सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं लेकिन सपने पूरे नहीं हुए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है. मैं सपने दिखाने वालों में से नहीं हू, मैं जो बोलता हूं, डंके की चोट पर पूरा करता हूं.’
नितिन गडकरी ने पिछले दिनों जो कुछ भी कहा वह मीडिया में छाया रहा. दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक इन पर जमकर कयासबाजी हुई. दिलचस्प हेडलाइनें लगाई गईं कि अगर त्रिशंकू लोकसभा बनी तो नितिन गडकरी भी पीएम बनने की रेस में होंगे. आखिर क्या वजह है कि राजनाथ सिंह, अरुण जेटली या फिर सुषमा स्वराज की जगह बार-बार गडकरी का नाम ही प्रधानमंत्री की रेस में शुमार होता है? इस बात में कितना दम है कि गडकरी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना प्रबल हो गई है?
इन दोनों सवालों के जवाब जानने के लिए तीन शहरों - दिल्ली, मुंबई और नागपुर - में मौजूद सत्ताधीशों की सियासत समझनी पड़ेगी.
नागपुर
नागपुर नितिन गडकरी का अपना शहर है. वे यहीं से सांसद हैं और इसी शहर में संघ का मुख्यालय भी है. यहां नितिन गडकरी हफ्ते में एक बार जरूर आते हैं. एक प्रभावशाली स्वयंसेवक की मानें तो संघ के दोनों खेमों के सबसे प्रिय नितिन गडकरी ही हैं. एक खेमा मोहन भागवत, दत्तात्रेय होसबोले जैसे प्रचारकों का है जो नरेंद्र मोदी के करीब तो माना जाता है लेकिन इसकी आत्मीयता सबसे ज्यादा गडकरी से ही है. दूसरा खेमा भैयाजी जोशी, कृष्ण गोपाल और मनमोहन वैद्य का है जिसे नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी का विरोधी माना जाता है. इस खेमे का आशीर्वाद भी गडकरी को ही मिला हुआ है. अब सवाल यह है कि जब संघ की पहली पसंद गडकरी हैं तो फिर इतनी देर और उन्हें लेकर इतना सस्पेंस क्यों?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए सियासत के कुछ बिसरे पन्ने पलटने होंगे. बात 2014 के चुनाव से पहले की है. तब अमित शाह दिल्ली की राजनीति से दूर हुआ करते थे और नितिन गडकरी भाजपा के अध्यक्ष थे. उस वक्त गडकरी का दोबारा अध्यक्ष बनना तय था क्योंकि संघ की तरफ से उनका नाम फाइनल हो चुका था. लेकिन आखिरी राउंड में लालकृष्ण आडवाणी ने उनके नाम पर वीटो लगा दिया.
बाद में नितिन गडकरी के करीबी नेताओं ने कुछ पत्रकारों को बताया कि दरअसल यह वीटो अकेले लालकृष्ण आडवाणी का नहीं था, इसके पीछे उनके साथ-साथ नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और नरेंद्र मोदी सबकी मिली-जुली ताकत थी. इसी एकत्रित ताकत की वजह से अरविंद केजरीवाल ने गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जिनके लिए अब वे अदालत में माफी भी मांग चुके हैं. लेकिन उस वक्त बने माहौल में भाजपा नेताओं की जिद के आगे संघ को झुकना पड़ा और नितिन गडकरी की जगह राजनाथ सिंह को भाजपा अध्यक्ष बना दिया गया.
इस बात को अब पांच साल से ज्यादा हो चुके हैं और संघ के कई नेता यह मानते हैं कि गडकरी को उस वक्त दोबारा अध्यक्ष ना बनाना एक बहुत बड़ी भूल थी क्योंकि ऐसा न होने से भाजपा में ‘बैलेंस ऑफ पावर’ बिगड़ गया. लेकिन संघ की कार्य पद्धति का हवाला देते हुए यही नेता अपनी एक मजबूरी भी बताते हैं. इनका कहना है कि अगर भाजपा अड़ जाए तो संघ उस पर अपने फैसले थोपता नहीं है. नागपुर में मौजूद एक संघ के नेता कहते हैं कि संघ चाहकर भी नितिन गडकरी को अगले कुछ साल तक प्रधानमंत्री नहीं बना सकता क्योंकि उनके नाम पर भाजपा के विरोधी नेता तो तैयार हो जाएंगे लेकिन उसका शीर्ष नेतृत्व वीटो लगा देगा. इसलिए अगर अगले चुनाव में बहुमत का अंकगणित गड़बड़ाया तब भी उनका प्रधानमंत्री बनना बहुत मुश्किल है.
मुंबई
मुंबई का एक नया सियासी समीकरण है जो भाजपा का अगला प्रधानमंत्री और उसे बनाने में संघ की भूमिका के बारे में कुछ संकेत तो दे ही सकता है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस और केंद्र में मंत्री नितिन गडकरी एक ही शहर के हैं. दोनों नागपुर से आते हैं. लेकिन गडकरी को अपना गुरू कहने वाले फड़णवीस पूरी तरह से अमित शाह के खास हैं. मुंबई की सियासत की खबर रखने वाले कहते हैं कि जब गडकरी चाहकर भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री नहीं बन पाए तो प्रधानमंत्री क्या बन पाएंगे. वे एक किस्सा सुनाते हैं - जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का फैसला होने वाला था तो नितिन गडकरी को लगा कि भाजपा नेतृत्व खुद उनसे आग्रह करेगा और शिवसेना को मनाने के लिए कहेगा. लेकिन अमित शाह ने शिवसेना, गडकरी और संघ की परवाह किए बिना फड़णवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ की दिला दी.
शिवसेना से झगड़ा सुलझाने के लिए भी अमित शाह ने नितिन गडकरी को नहीं प्रकाश जावड़ेकर को चुना. इसलिए मुंबई शहर के खांटी पत्रकार कहते हैं कि ‘गडकरी का प्रधानमंत्री बनना उतना ही मुश्किल है जितना उद्धव ठाकरे का महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना. दोनों के चर्चे बहुत होते हैं, किस्से बहुत बनते हैं, लेकिन आज भी कुर्सी पर कोई और है और आगे भी कोई और ही होगा इसी की संभावना ज्यादा है.’
दिल्ली
दिल्ली आकर नितिन गडकरी ने पिछले कुछ सालों में दोस्त भी बनाए और दुश्मन भी. नरेंद्र मोदी सरकार की हलचल पर नजर रखने वाले एक सूत्र बताते हैं कि कैबिनेट में वे ही एक ऐसे मंत्री हैं जो खुलकर प्रधानमंत्री से सवाल पूछ सकते हैं. नोटबंदी के फैसले पर भी भरी कैबिनेट में सिर्फ गडकरी ने ही प्रधानंमंत्री से स्पष्टीकरण मांगा था. कैबिनेट के अंदर की खबर जब बाहर आती है तो ज्यादातर किस्से गडकरी से ही जुड़े होते हैं. नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्री हों या मोदी के विरोधी सब यह मानते हैं कि अगर गडकरी ने एक बार किसी चीज के लिए हां कर दी तो वे उसे हर हाल में निभाते हैं.
अपने इस व्यवहार के चलते नितिन गडकरी ने सरकार और विपक्ष दोनों में ही ढेरों दोस्त बनाए हैं. यह सिर्फ सुनी-सुनाई बात नहीं है कि अरविंद केजरीवाल की व्यक्तिगत दोस्ती नितिन गडकरी से है. कांग्रेस के कई बड़े नेताओं और सरकार के बीच का सूत्र गडकरी भी हैं. इसी तरह शरद पवार हों या फिर शिवसेना या फिर नवीन पटनायक, इन सबके उनसे अच्छे संबंध हैं. इसलिए अगर भाजपा दो सौ से नीचे खिसक गई और मोदी के नाम पर सहयोगी मिलने में मुश्किल हुई तो संघ के आशीर्वाद से गडकरी के नाम पर सहमति बनने की उम्मीद जगती है. अगर गौर से सुनें तो अरविंद केजरीवाल जैसे नेता भी सिर्फ यही नारा देते हैं - मोदी शाह की जोड़ी को भगाना है.
फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर हमसे जुड़ें | सत्याग्रह एप डाउनलोड करें