ऑस्कर्स 2019 की दौड़ से रीमा दास की बहुचर्चित और बेहद प्रशंसित फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’ के बाहर हो जाने पर शायद ही कोई ज्यादा दुखी हुआ होगा. अब हमारे देश में यहां से नामित होकर ऑस्कर्स के लिए भेजी गईं फिल्मों का वहां पहुंचकर शुरुआती दौर में ही बाहर हो जाना किसी को हैरान और परेशान नहीं करता. 1957 से लेकर अबतक हम लगातार भारतीय फिल्में ‘बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज फिल्म’ नाम की श्रेणी के लिए भेजते रहे हैं (साल 2003 छोड़कर) लेकिन केवल तीन बार हमारी फिल्में इस ऑस्कर पुरस्कार के आखिरी पांच नामित दावेदारों में जगह बना पाईं हैं –‘मदर इंडिया’ (1957), ‘सलाम बॉम्बे!’(1988) और ‘लगान’ (2001).

इस श्रेणी में जीत आज तक नहीं मिली है. आज तक कोई ‘भारतीय फिल्म’ ऑस्कर नहीं जीती है. केवल ‘गांधी’ (1982) और ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ (2008) जैसी कुछ ‘विदेशी’ फिल्मों के लिए भानु अथैय्या, गुलजार, एआर रहमान और रसूल पुकुट्टी जैसी हिंदुस्तानी शख्सियतों को व्यक्तिगत ऑस्कर से नवाजा गया है. सत्यजीत रे को 1992 में लाइफटाइम अचीवमेंट ऑस्कर दिया गया था.

Advertisement

पिछले कुछ सालों में ‘न्यूटन’ (2017), ‘विसरनई’ (2016) और ‘कोर्ट’ (2015) जैसी आलातरीन भारतीय फिल्में भी अमेरिकी ज्यूरी को लुभाने में नाकाम रहीं. इस बार यह दुर्भाग्य उस ‘विलेज रॉकस्टार्स’ का रहा जिसे हिंदुस्तान में सभी ने चाहा और रीमा दास नाम की फिल्मकार के सिनेमा बनाने के पैशन के लोग मुरीद बने. लिखने और निर्देशित करने के अलावा ‘विलेज रॉकस्टार्स’ की सिनेमेटोग्राफी, उसका संपादन, उसका निर्माण तक रीमा दास ने अकेले किया था. लेकिन जब यह फिल्म दिसम्बर 2018 में आखिरी पांच दावेदारों में जगह बनाने में सफल नहीं हो पाई तो वही पड़ताल हिंदुस्तानी मीडिया को दोबारा करनी पड़ी कि आखिर क्यों हमारी बेहतरीन फिल्में तक ऑस्कर पुरस्कार के लायक नहीं हो पातीं.

एक वजह तो फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की अंदरूनी राजनीति को माना जाता है. इस संस्था के पास ऑस्कर्स में भारतीय फिल्में भेजने का अधिकार है लेकिन एक तो ये भेजी जाने वाली फिल्म का चयन देर से करती है जिस वजह से इन फिल्मों को तैयारी करने का मौका नहीं मिलता. और सबसे बड़ी बात, कि अक्सर इस संस्था पर उम्दा फिल्मों को ऑस्कर्स के लिए नहीं भेजने का आरोप लगता रहा है. 2013 में जब रितेश बत्रा की ‘द लंचबॉक्स’ के फेस्टिवल सर्किट में उम्दा प्रदर्शन करने के चलते अंतिम पांच नामित फिल्मों में आराम से जगह बनाने के कयास लगाए जा रहे थे तब इस संस्था ने गुजराती फिल्म ‘द गुड रोड’ को अमेरिका भेजा था.

साल 2012 में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘पान सिंह तोमर’ जैसी फिल्में छोड़कर ‘बर्फी!’ को ऑस्कर्स में भेजा गया. 2007 में ‘तारे जमीं पर’ और ‘चक दे! इंडिया’ छोड़कर विधु विनोद चोपड़ा की ‘एकलव्य : द रॉयल गार्ड’ को भेजकर हमने अपना मजाक बनवाया. 1998 में तो ऐश्वर्या राय की ‘जींस’ को भेज दिया, शायद यह सोचकर कि ऐश्वर्या की खूबसूरती ऑस्कर दिलवा देगी!

Advertisement

हालांकि यह भी उतना ही सच है कि जब-जब हमने अपनी श्रेष्ठ फिल्में भेजीं, ऑस्कर्स ने उन्हें भी ठुकरा दिया. ‘न्यूटन’, ‘विसरनई’, ‘कोर्ट’, ‘विलेज रॉकस्टार्स’ के अलावा ‘रंग दे बसंती’ (2006), ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) से लेकर ‘गाइड’ (1965) और अपू ट्रायोलॉजी की तीसरी फिल्म ‘द वर्ल्ड ऑफ अपू’ (1959) तक ऐसा कई-कई बार होता रहा. तो फिर चूक कहां होती है? उम्दा फिल्में भेजने के बाद भी ऑस्कर्स क्यूं हमें नकार देता है?

यह समझने वाली बात है कि जिन फिल्मों को हम अपने यहां उम्दा मानते हैं आखिर उनकी टक्कर ऑस्कर्स में किस स्तर की फिल्मों से होती है. ‘विलेज रॉकस्टार्स’ इस बार जिन फिल्मों के बीच अंतिम पांच में जगह बनाने की कोशिश कर रही थी, उनमें से केवल ‘कोल्ड वॉर’ और ‘शॉपलिफ्टर्स’ देखकर ही आप समझ जाएंगे कि विश्व-सिनेमा में हमारा स्थान कहां है.

जिन भारतीय फिल्मों को हम उत्कृष्ट मानकर उनका गुणगान करते हैं वे विश्व-सिनेमा के मंच पर आखिर कहां खड़ी हैं. खूबसूरती से शूट की गई पोलिश फिल्म ‘कोल्ड वॉर’ देखकर जहां कई दिनों तक आपका दिल उदासी में डूबा रहेगा वहीं जापान की आधिकारिक प्रविष्टि ‘शॉपलिफ्टर्स’ देखकर आप दुकानों में चोरी करने को मजबूर इसके गरीब पात्रों के जीवन-संघर्ष को भुला नहीं पाएंगे. अंतिम पांच में नामित न हो पाई कोरियन फिल्म ‘बर्निंग’ ही देख लीजिए, समझ आ जाएगा कि जिन फिल्मों का हमारी फिल्म की तरह चयन नहीं हुआ, वे फिल्में भी हमसे कितनी आगे हैं. बहुत-बहुत आगे.

ऑस्कर्स में मिलने वाली असफलता की एक दूसरी वजह जो बार-बार रेखांकित की जाती है वो है इस मुहिम में लगने वाला धन. कहा जाता है कि छोटी फिल्में ऑस्कर्स की दौड़ में दौड़ने लायक पैसा नहीं लगा सकतीं और उन्हें सरकारी मदद भी बेहद कम मुहैया करवाई जाती है. ‘विलेज रॉकस्टार्स’ के लिए केंद्र सरकार से रीमा दास को कोई मदद नहीं मिली और केवल असम सरकार की तरफ से एक करोड़ रुपए दिए गए. इसमें से भी टैक्स काटकर उनके पास कुछ 67 लाख रुपए बचे जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्कर्स जैसे महंगे पुरस्कारों में किसी फिल्म को बेहतर ‘विजिबिलिटी’ दिलाने के लिए तीन से पांच करोड़ रुपए का खर्चा मामूली खर्च है. इससे पहले ‘न्यूटन’ और ‘विसरनई’ जैसी दूसरी छोटी फिल्मों को भी कोई खास सरकारी मदद नहीं मिली थी और ये फिल्में भी पुरस्कारों की दौड़ से बहुत पहले बाहर हो गई थीं.

Advertisement

अक्सर ‘लगान’ (2001) का उदाहरण दिया भी जाता है, कि आमिर खान और आशुतोष गोवारिकर के चलते इस फिल्म के पास इतना धन था कि वे ऑस्कर जीतने का प्रयास जी तोड़कर कर सकें. कहा जाता है कि सिर्फ ऑस्कर पब्लिसिटी के लिए उस जमाने में आमिर खान ने दो मिलियन डॉलर का खर्चा किया था. यानी तब के 9.6 करोड़ रुपए. धन से पैदा हुए इसी आत्मविश्वास के चलते उन्होंने ‘लगान’ को कई ज्यूरी सदस्यों तक पहुंचाया था और यह पीरियड फिल्म अंतिम पांच में जगह बनाने में सफल रही थी.

लेकिन फिर, पैसा और पहुंच तो ‘रंग दे बसंती’ (2006) और 2010 में नामित ‘पीपली लाइव’ (2010) वाले आमिर खान के पास भी था! ‘देवदास’ (2002) व ‘बर्फी!’ (2012) जैसी दूसरी नामित फिल्में भी काफी बड़ी फिल्में थीं! फिर क्यों इन्हें सफलता नहीं मिली?

तीसरी वजह कही जाती है कि ऑस्कर्स में जीत हासिल करने की प्रक्रिया इतनी मुश्किल है कि वह अक्सर ही भारतीय फिल्मों के लिए अभेद्य साबित होती है. फिल्म के हिंदुस्तान से अमेरिका पहुंचने के बाद उसे एकेडमी अवॉर्ड्स के ज्यूरी सदस्यों को अंग्रेजी सबटाइटल्स के साथ दिखाया जाना होता है. बेस्ट फॉरन लैंग्वेज फिल्म की इस श्रेणी में दुनिया भर से आईं अनेक फिल्मों में से (हर देश एक फिल्म भेज सकता है) पहले चरण में नौ फिल्में शॉर्टलिस्ट होती हैं, और फिर दूसरे चरण में इन नौ में से अंतिम पांच.

Advertisement

पहला चरण ही वो वक्त होता है जब फिल्म से जुड़े लोग इसकी ‘विजिबिलिटी’ ज्यूरी सदस्यों की नजरों में बढ़ा सकते हैं. ऑस्कर पुरस्कार देने के लिए कुछ 6000 ज्यूरी सदस्य 24 श्रेणियों में बंटी फिल्मों को देखकर वोट करते हैं और यह वोटिंग प्रकिया इतनी जटिल होती है कि इसके लिए एकेडमी पिछले 80 से ज्यादा सालों से प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स (पीडब्लूसी) नामक अकाउंटेंसी फर्म और उनके अकाउंटेंट्स की सेवाएं ले रही है!

एक हफ्ते तक दर्जनभर अकाउंटेंट बिना किसी कम्प्यूटर की मदद लिए केवल हाथों से वोटों की गिनती करते हैं और अंत में जीतने वाले शख्स का नाम लिफाफे में डालकर एक काले सूटकेस में ताला बंद कर दिया जाता है. पीडब्लूसी से जुड़े केवल दो कर्मचारी आखिर में यह जानते हैं कि कौन जीता और कौन दूसरे नम्बर पर रहा. यह सूटकेस फिर लाइव प्रसारित होने वाले ऑस्कर्स में श्रेणी का नाम आने से चंद पल पहले ही खोला जाता है और तभी दुनिया को पता चलता है कि विजेता कौन रहा.

लेकिन दूसरे नम्बर पर कौन आया, वह कितने कम वोटों से हारा, यह राज केवल ये दो लोग ही जानते हैं. और इसे वे अपनी कब्र तक साथ लेकर जाते हैं.

Advertisement

बहरहाल, ये जरूरी नहीं होता कि अंतिम नौ नामित फिल्मों को वोट करने से पहले हर ज्यूरी सदस्य हर नामित फिल्म को देखे ही. न ही फिल्म से जुड़े लोग सीधे तौर पर एकेडमी सदस्यों से संपर्क कर सकते हैं. ऐसे में फिल्म के निर्माता, निर्देशक, स्टार और अमेरिका में वह फिल्म डिस्ट्रीब्यूट करने वाले स्टूडियो को मिलकर अपनी फिल्म का ऐसा प्रचार व लॉबिंग करनी होती है कि वह किसी न किसी तरह से ज्यूरी सदस्यों तक पहुंचे. ऐसा करने के लिए अपनी फिल्म के इर्द-गिर्द एक ‘कैंपेन’ खड़ा करना होता है जिसमें कि अमेरिका के जाने-माने और बेहद महंगे ‘पब्लिसिस्ट’ या ‘अवॉर्ड कंसल्टेंट’ की मदद लेनी पड़ती है. ये लोग एकेडमी के ज्यूरी सदस्यों तक को जानते हैं और उन्हें वे तरीके मालूम होते हैं जिनका उपयोग कर विदेशी फिल्मों की बेहतर ‘छवि’ अमेरिकी ज्यूरी सदस्यों के मानस में गढ़ी जा सकती है.

कान, टोरंटो और वेनिस फिल्म फेस्टिवल जैसे स्थापित महोत्सवों में फिल्म के पूर्व प्रदर्शन और वहां मिले रिस्पॉन्स का भी खासा महत्व होता है. ऐसे में विश्व-सिनेमा में पहले से छाप छोड़ चुके निर्देशकों और उनकी दमदार नयी फिल्मों को अमेरिकी ज्यूरी सदस्य कई बार हिंदुस्तानी निर्देशक और उसकी फिल्म की तुलना में ज्यादा तवज्जो देते हैं. साथ ही ऑस्कर्स से पहले अमेरिका में उस फिल्म के रिलीज होने पर किस तरह की हवा बनती है, किस तरह दर्शक और अमेरिकी समीक्षक उस फिल्म को तौलते हैं, यह सब भी फिल्म को ऑस्कर्स की दौड़ में आगे बढ़ाने के बहुत काम आता है.

हमारे देश में हमेशा कहा जाता रहा है कि ऊपर वर्णित ये दूसरी और तीसरी वजह ही प्रमुखता से भारतीय फिल्मों के ऑस्कर न जीत पाने की मुख्य वजह होती हैं. लेकिन समझने वाली बात यह है कि इन मुश्किलों से केवल भारतीय फिल्मों को ही तो दो-चार नहीं होना पड़ता न! पिछले कुछ वर्षों में बेस्ट फॉरन लैंग्वेज फिल्म का ऑस्कर जीतने वाली फिल्मों की सूची उठाकर देखेंगे तो आप पाएंगे कि बेहद छोटे देशों से आने वाली फिल्मों ने पुरस्कार जीता है. अंतिम पांच तक में नामित कई फिल्में बेहद छोटे और कई बार देश-दुनिया के लिए अंजान देशों से आती रही हैं.

Advertisement

चिली, ईरान, हंगरी, पोलैंड, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क कोई बड़े मुल्क तो हैं नहीं, न उनके फिल्म उद्योग बॉलीवुड या दूसरे भारतीय फिल्म उद्योगों जितने विशाल हैं. लेकिन पिछले दस सालों में इन्हीं देशों से आई फिल्मों ने ऑस्कर जीता है. 2014 में तो अंतिम पांच नामित फिल्मों में शामिल ‘टिम्बक्टू’ (Timbuktu) उस अंजान उत्तर-पश्चिमी अफ्रीकी देश मॉरीटेनिया से आई थी जोकि स्लेवरी के लिए कुख्यात है और जहां सालभर में एक-दो फिल्में बन जाना ही बड़ी बात मानी जाती है.

ऐसे में जो चिर-परिचत वजहें हमें हर साल ऑस्कर न जीत पाने की दी जाती हैं, वे असल में बहाने भर हैं. हमारी किसी भारतीय फिल्म के ऑस्कर न जीत पाने की सबसे बड़ी वजह है कि हम विश्व-सिनेमा के स्तर की फिल्में बनाते ही नहीं हैं. शिल्प से लेकर कहानियां तक आयातित होती हैं. अगर कहानी मौलिक है तो शिल्प आयातित होगा. शिल्प थोड़ा-बहुत मौलिक है तो कहानियों की सेंसिबिलिटी विदेशी होगी और उसमें हम भारतीयता भर के विदेशियों को बेचना चाहेंगे.

एक और मुख्य वजह भारतीय फिल्मों में नाच-गाने की मौजूदगी को बताया जाता है. यही कि बॉलीवुड आज भी पेड़ों के इर्द-गिर्द ही नाच-गा रहा है. लेकिन फिर ऑस्कर्स के इतिहास में ‘शिकागो’ (2002) से लेकर ‘ला ला लैंड’ (2016) जैसी नाच-गानों से लबालब भरी म्यूजिकल फिल्में विभिन्न श्रेणियों के ऑस्कर्स जीतती रही हैं. और इस साल के ऑस्कर्स की प्रबल दावेदार ‘अ स्टार इज बॉर्न’ तो ढेर सारे खूबसूरत गीतों की टेक लेकर ही खुद को सुंदर बनाती है.

Advertisement

फिर ये भी कहा जाता है कि हमारी फिल्में बेहद लंबी होती हैं और दो-सवा दो घंटे की हॉलीवुड फिल्मों के आदी ज्यूरी सदस्यों के लिए इन्हें देख पाना मुश्किल काम होता है. लेकिन इस बहाने की काट यह है कि ‘गॉन विद द विंड’ (1939), ‘लॉरेंस ऑफ अरेबिया’ (1962) जैसी साढ़े तीन घंटे से ज्यादा लंबी अवधि की फिल्मों से लेकर स्टीवन स्पीलबर्ग की महान फिल्म ‘शिंडलर्स लिस्ट’ (1993) और ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स : द रिटर्न ऑफ द किंग’ (2003) जैसी तकरीबन तीन घंटे लंबी फिल्मों तक ने ढेर सारे ऑस्कर्स जीते हुए हैं. लंबाई से फर्क नहीं पड़ता जनाब, उस लंबाई में रोचकता, विस्मयता और गुणवत्ता के लगातार समावेश से पड़ता है.

इस लेख में किसी भारतीय फिल्म के ऑस्कर न जीत पाने की स्थापित वजहों और उन्हें कॉन्ट्राडिक्ट करने वाले उदाहरण देने का केवल यही मकसद है कि हम समझें कि साल दर साल हमें दी जाने वाली ये सब वजहें केवल बहाने हैं. अगर हम विश्व-सिनेमा के स्तर की फिल्में लगातार बनाते आते, तो रास्ते अपने आप खुलते और किसी बहाने को बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं पड़ती. एक जमाने में ईरान की अंजान फिल्मों के लिए भी तो ऐसे ही रास्ते खुले थे. लेकिन हमारा सिनेमा कूपमंडूकता का मारा है और विश्व-सिनेमा के स्तर की फिल्में बनाता ही नहीं है. जिन विचारों को नया समझकर हम एक्सप्लोर करते भी हैं वे विश्व-सिनेमा में दशकों से नए आयामों के साथ एक्सप्लोर होते रहे हैं. हम बस दो-चार हटके फिल्में बनाकर खुद को तोप समझने का मुगालता पाल लेते हैं. ऐसा ही चलता रहा तो दो-चार साल छोड़िए, आने वाले पांच-दस-पंद्रह साल में भी हम कभी विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ऑस्कर अवॉर्ड नहीं जीत पाएंगे.

बहरहाल, निराश मत होइए! ऑस्कर्स 2019 के लिए नामित कई विदेशी फिल्मों में काफी कुछ भारतीयता मौजूद है. पावेल पावलिकोवस्की की अद्भुत श्वेत-श्याम पोलिश फिल्म ‘कोल्ड वॉर’ में आनंद महिंद्रा की मुंबई बेस्ड सिनेस्तान फिल्म कंपनी ने निवेश किया है. ब्रैडली कूपर और लेडी गागा अभिनीत ‘अ स्टार इज बॉर्न’ में भारतीय-अमेरिकी मूल के रवि मेहता बतौर कार्यकारी निर्माता जुड़े हैं. अनिल अंबानी की रिलायंस एंटरटेनमेंट के सहयोग से बनी तीन अमेरिकी फिल्मों को 10 नामांकन हासिल हुए हैं. स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ मिलकर पहले अनिल अंबानी की यह कंपनी ड्रीमवर्क्स स्टूडियो का हिस्सा थी, जिसको अब ऐम्बलिन एंटरटेनमेंट (Amblin) के नाम से जाना जाता है. इस कंपनी ने नामांकित हुईं पीटर फेरली निर्देशित ‘ग्रीन बुक’, डैमिएन शेजेल निर्देशित ‘फर्स्ट मैन’ और स्टीवन स्पीलबर्ग निर्देशत ‘रेडी प्लेयर वन’ का सह-निर्माण किया है.

सबसे खास है कि हिंदुस्तान में बनी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ने इस बार 91वें एकेडमी अवॉर्ड्स की डॉक्यूमेंट्री (शॉर्ट सब्जेक्ट) नामक श्रेणी में नामांकन हासिल किया है. फीचर लेंथ डॉक्यूमेंट्री की एक अलग श्रेणी है, जबकि सेनेटरी पैड्स पर आधारित 26 मिनट की ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस’ ने शॉर्ट सब्जेक्ट नामक श्रेणी में अंतिम पांच में जगह बनाई है. 1978 में विधु विनोद चोपड़ा निर्देशित ‘एन एनकाउंटर विद फेसिस’ नामक शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री को भी यह नामाकंन हासिल हुआ था. बहरहाल, अनुराग कश्यप के साथ लंबे समय तक काम कर चुकीं गुनीत मोंगा ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस’ की कार्यकारी निर्माता हैं और ईरानी-अमेरिकी मूल की रायका जेहताबची (RaykaZehtabchi) ने इसका निर्देशन किया है. इस शानदार वृत्तचित्र को आप नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं.