सुप्रीम कोर्ट ने देश के 16 राज्यों के क़रीब 12 लाख आदिवासी व वनवासी परिवारों को जंगलों से बेदख़ल करने के अपने आदेश पर रोक लगा दी है. इस आदेश को लेकर विपक्षी दलों के साथ एक बड़े तबक़े की तरफ़ से कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी. ऐसे में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस पर रोक लगाने के लिए अदालत का रुख़ किया था. अब सर्वोच्च अदालत ने इस पर रोक लगा दी है. लेकिन ऐसा करने से एक दिन पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक टिप्पणी की जिस पर ग़ौर किया जाना चाहिए.

बुधवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि सरकार आदेश से जुड़े पहलुओं को अब क्यों सामने रख रही है. अदालत ने कहा कि ऐसा तब क्यों नहीं किया गया जब कोर्ट आदेश सुना रहा था. वहीं, आदेश पर रोक लगाते हुए उसने कहा कि केंद्र सरकार इतने लंबे समय तक ‘सोती’ क्यों रही.

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सरकार के आवदेन पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि पिछले दो-तीन सालों में कथित रूप से देश के वंचित तबक़ों के ‘ख़िलाफ़’ जितने भी बड़े फ़ैसले सुप्रीम कोर्ट ने दिए हैं, उनमें केंद्र सरकार कहीं न कहीं ज़िम्मेदार है. यह एक तरह की प्रक्रिया सी बन गई है कि पहले दलित, आदिवासी व अन्य पिछड़े वर्गों से संबंधित मामलों में सरकार उनका पक्ष मज़बूती से नहीं रखती, और बाद में शीर्ष अदालत के फ़ैसले को लेकर हुई सामाजिक व राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के मद्देनज़र वह पुनर्विचार याचिका अथवा आवेदन दाख़िल करती है. मौजूदा मामले को ही देखें तो सरकार के इस रुख़ का पता चल जाता है.

वन अधिकार अधिनियम (एफ़आरए) से जुड़ी सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ग़ायब

सुप्रीम कोर्ट ने बीती 13 फ़रवरी को अपने आदेश में कहा था कि जिन अनुसूचित वनवासी जनजातियों व अन्य पारंपरिक वनवासियों के जंगलों में रहने के दावे राज्य सरकारों ने ख़ारिज कर दिए, उन्हें 12 जुलाई तक वनों से निकाल दिया जाए. बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक़ उस दिन केंद्र सरकार के वकील एफ़आरए का पक्ष रखने के लिए अदालत में पेश नहीं हुए. वहीं, उससे पहले की चार सुनवाइयों में सरकार के वकील एफ़आरए के पक्ष में कुछ नहीं बोले. इसीलिए मामले की अंतिम सुनवाई वाले दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाया था कि वह इस मामले में ‘मूक दर्शक’ बनी रही.

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आदिवासियों और अन्य वनवासियों के लिए काम करने वाले लोगों का कहना है कि ज़मीनी स्तर पर एफ़आरए क़ानून को सही तरीक़े से लागू नहीं किया गया है. वहीं, क़ानून के पक्ष में खड़े वकील व कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि सरकार ‘जानबूझकर’ एफ़आरए का बचाव नहीं कर रही थी और पूरी कोशिश में थी कि वनवासियों के अधिकारों की रक्षा करने वाले इस क़ानून को मान्यता न दी जाए. साथ ही, आदिवासियों से जुड़े आंकड़ों में हेराफ़ेरी की जाए ताकि उन्हें जंगल से निकालना आसान हो जाए.

वहीं, कई राज्यों ने निष्कासित होने वाले वनवासियों की संख्या से जुड़ी जानकारियां साझा नहीं की हैं. ज़ाहिर है कि आदेश पर रोक नहीं लगने की सूरत में निष्कासित वनवासियों की संख्या बढ़ती. इस लिहाज़ से भी इस मामले की सुनवाइयों में केंद्र सरकार के वकीलों की मौजूदगी ज़रूरी थी.

लेकिन सरकार उन्हें अदालत में पेश करने में नाकाम रही. परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फ़ैसला सुनाया जिसे एक बहुत बड़े वर्ग ने ‘आदिवासी-विरोधी’ माना. जब आम लोगों से लेकर वन्यजीव वैज्ञानिकों और भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ ने इस आदेश को रद्द करने या पुनर्विचार किए जाने मांग की, तब जाकर सरकार नींद से जागी और शीर्ष अदालत में आवेदन किया कि वह अपने आदेश पर रोक लगाए.

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13 पॉइंट रोस्टर में भी लापरवाह रवैया

मोदी सरकार का यही रवैया 13 पॉइंट रोस्टर मामले में भी देखने को मिला था. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2018 में फ़ैसला सुनाया था कि आगे से केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षक पदों की भर्ती विभाग को इकाई मानते हुए होगी, न कि विश्वविद्यालय को इकाई मानते हुए. यह फ़ैसला आते ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने इसके प्रभाव का अनुमान लगाए बिना इसे सभी विश्वविद्यालयों में लागू करने का फ़रमान जारी कर दिया. बाद में भारी विरोध के चलते मोदी सरकार ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

लेकिन सरकार की अदालती तैयारी अच्छी नहीं थी. वह केवल तीन विश्वविद्यालयों के आंकड़े लेकर शीर्ष अदालत पहुंची. जबकि उसके पास पूरे देश के विश्वविद्यालयों के आंकड़े उपलब्ध थे. विश्लेषणों में कहा जा रहा था कि इस फ़ैसले से विश्वविद्यालयों में आरक्षण व्यवस्था पूरी तरह ख़त्म होने की नौबत आ सकती है. इसके बावजूद सरकार ने कथित रूप से वंचित तबक़ों का पक्ष कमज़ोर तरीक़े से रखा. नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की याचिका ख़ारिज कर दी और तय हो गया अब शिक्षकों की भर्तियां 13 पॉइंट रोस्टर फ़ॉर्मूले के तहत होंगी. बाद में सरकार ने कहा कि वह ज़्यादा आंकड़ों के साथ पुनर्विचार याचिका दायर करेगी. लेकिन सवाल यही है कि क्या ऐसा वह पहले नहीं कर सकती थी!

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एससी-एसटी एक्ट के विरुद्ध दलील

पिछले साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज होने पर आरोपितों की तुरंत गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी. साथ ही, यह भी कहा था कि इस एक्ट से जुड़े किसी मामले में अगर कोई सरकारी कर्मचारी आरोपित हो तो उसकी गिरफ़्तारी के लिए उसके नियोक्ता प्राधिकारी की और किसी सामान्य नागरिक के आरोपित होने की सूरत में ज़िले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की लिखित मंज़ूरी अनिवार्य होगी.

रिपोर्टों के मुताबिक़ जिस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला सुनाया था, उसमें सरकार कोई पक्षकार नहीं थी. लेकिन कोर्ट ने उसकी राय जानने के लिए उसे बुलाया था. सरकार ने कोर्ट से कहा कि एससी-एसटी एक्ट से जुड़े जिन मामलों का ज़िक्र सुप्रीम कोर्ट ने किया, उनमें पहले से ज़मानत देने में कोई दिक़्क़त नहीं है. जानकारों के मुताबिक़ सरकार ने क़ानूनी प्रावधान के विरुद्ध यह दलील देकर एससी-एसटी वर्गों के पक्ष को सही तरीक़े से नहीं रखने का काम किया. उनके मुताबिक़ यह बड़ी वजह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फ़ैसला सुनाया जिससे यह क़ानून कमज़ोर हो गया.

फ़ैसला आने के बाद पूरे देश में हंगामा मच गया. दलित, आदिवासी व अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग इससे बहुत ज़्यादा नाराज़ थे. सरकार की भूमिका पता चलने के बाद यह नाराज़गी और बढ़ गई. उस समय कर्नाटक चुनाव नज़दीक आ चुके थे. मोदी सरकार पर इस क़ानून को वापस पहले की स्थिति में लाने का ज़बर्दस्त दबाव था, क्योंकि कर्नाटक में दलितों की आबादी (2011 की जनगणना के हिसाब से) क़रीब 18 प्रतिशत है. हालात देखते हुए सरकार ने अदालत में समीक्षा याचिका दायर की. लेकिन कोर्ट ने उसे ख़ारिज कर दिया. आख़िरकार सरकार को संसदीय प्रक्रिया के तहत एससी-एसटी एक्ट को इसके मूल स्वरूप में लाने पर मजबूर होना पड़ा.