निर्देशक : जॉन फैवरो

कलाकार : शाहरुख खान, आर्यन खान, संजय मिश्रा, असरानी, आशीष विद्यार्थी, श्रेयस तलपड़े

रेटिंग : 3/5

जॉन फैवरो निर्देशित ‘द लायन किंग’ 1994 में आई डिज्नी की ओरिजनल ‘द लायन किंग’ का तकरीबन फ्रेम दर फ्रेम रीमेक है. कैमरा एंगल्स से लेकर तकरीबन सारी इमेजरी पुरानी क्लासिक फिल्म की ही याद दिलाती है. संवाद भी ओरिजनल फिल्म के संवादों में थोड़े-बहुत प्रिफिक्स- सफिक्स जोड़कर रचे गए हैं और हिंदी में अनुवाद होने के बाद भी मौलिक की महक उनमें मौजूद मिलती है. 88 मिनट की ओरिजनल फिल्म यहां 118 मिनट की हुई है और यह 30 मिनट की अतिरिक्त लंबाई भी कहानी में कुछ खास या नया जोड़ने में असफल रही है.

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लगा था कि ‘द जंगल बुक’ (2106) की ही तरह इस बार भी निर्देशक जॉन फैवरो नॉस्टेल्जिया की तगड़ी खुराक देने के साथ-साथ एक नया आयाम, एक नया कंटेम्पररी विचार इस क्लासिक कहानी में जोड़ेंगे. दुख की बात है कि अद्भुत कम्प्यूटर कारीगरी का मुलम्मा चढ़ा होने के बावजूद आज की ‘द लायन किंग’ सिर्फ एक साधारण एडप्टेशन बनकर हमारे बीच पहुंची है.

इसकी कम्प्यूटर कारीगरी का तो क्या ही कहना! जिस फोटोरियलिस्टिक कम्प्यूटर एनीमेशन को जॉन फैवरो ने ‘द जंगल बुक’ में कुशलता से उपयोग किया था, यहां उसी तकनीक का उच्च रूप देखने को मिलता है. समझ आता है कि यथार्थलोक और कल्पनालोक के बीच झूलती यही तकनीक अब रूमानी किस्म की एनीमेशन फिल्मों का वर्तमान और भविष्य होने वाली है.

हालांकि कई लोग इस फिल्म को ‘लाइव-एक्शन’ फिल्म भी कह रहे हैं, लेकिन तकनीक की थोड़ी-बहुत जो समझ हमारी बनी है उसके हिसाब से कह सकते हैं कि यह अधिकतर हिस्सों में कम्प्यूटर जनित एनीमेशन ही है. लाइव-एक्शन वह विधा होती है जिसमें असली इंसानों और जानवरों का उपयोग किया जाता है और बाकायदा कैमरे की मदद लेकर दृश्य रचे जाते हैं. ‘द जंगल बुक’ एक लाइव-एक्शन ‘एनीमेशन’ फिल्म थी क्योंकि उसमें सभी जानवर कम्प्यूटर पर रचे गए थे और मोगली के रूप में एक इंसान लाइव-एक्शन तकनीक का उपयोग कर उस एनीमेटिड संसार का हिस्सा बनाया गया था.

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वहीं, केवल जानवरों की कहानी कहने वाली नई ‘द लायन किंग’ कम्प्यूटर पर बने एनीमेटिड जानवरों से लैस एक फोटोरियलिस्टिक फिल्म है, जो कि लाइव-एक्शन होने का भ्रम इसलिए देती है क्योंकि वह शेर के हवा से झूलते बालों से लेकर मां के बच्चे को सहलाने की अदा तक में यथार्थ का पुट भरने में सफल होती है. इसके जानवरों को देखकर आपको लगेगा कि आप डिस्कवरी या नेटफ्लिक्स पर कोई वाइल्डलाइफ डॉक्यूमेंट्री देख रहे हैं और साथ ही यह भी सनद रहेगी कि यह उसी किस्म का एक स्वप्नलोक है जिसमें डिज्नी वाली सारी खूबियां मौजूद हैं.

कहने का मकसद है कि ऊंची गुणवत्ता की यह तकनीक वाकई में क्रांतिकारी है और किसी भी मायने में लाइव-एक्शन से कमतर मालूम नहीं होती. सिर्फ इस तकनीक की मदद से रचे ‘द लायन किंग’ के नयनाभिराम संसार का नैनसुख लेने भर के लिए आपका थियेटर तक की यात्रा करना सुखद हो जाएगा.

लेकिन अद्भुत कम्प्यूटर कारीगरी की भी एक सीमा होती है. यह भी आपको ‘द लायन किंग’ देखकर समझ आएगा. 1994 में आई ओरिजनल ‘द लायन किंग’ उस पारंपरिक 2-डी एनीमेशन तकनीक की मदद लेकर बनी थी जिसमें हर फ्रेम को हाथों से कागज पर उकेरा जाता था और हर इमोशन को व्यक्त करना असंभव काम था. लेकिन आज भी उस क्लासिक को देखने पर न सिर्फ नॉस्टेल्जिया की तगड़ी खुराक मिलती है बल्कि उसका एनीमेशन तक आपको ‘पुराने वक्त की एक सस्ती तकनीक’ कहने की नुक्ताचीनी नहीं करने देता.

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हमने हाल ही में उस ओरिजनल म्यूजिकल फिल्म को दोबारा देखा – बचपन में देखा था तो ‘हकूना मटाटा’ पर महीनों दिल फिदा रहा था! – और हैरत की बात है कि आज की ‘द लायन किंग’ से बेहतर आज के समय में भी उस मौलिक फिल्म को देखना ही है. उसकी सरलता, मासूमियत और कहानी के अनुसार ही अपना कैनवास रखने की खूबी उसे वाकई में क्लासिक बनाती है. बताईए! इससे ज्यादा तबाह कोई नयी फिल्म और क्या होगी कि उससे बेहतर पुरानी फिल्म कही जा रही है.

हिंदी में डब हुए ‘द लायन किंग’ के संवाद और गीत मयूर पुरी ने लिखे हैं. ‘द जंगल बुक’ में भी उनका काम खासा प्रभावी था (‘एवेंजर्स - एंड गेम’ में नहीं!) और यहां भी वे अंग्रेजी संवादों का सीधे-सीधे हिंदी तर्जुमा करने की जगह एक सक्षम लेखक की तरह कई जगह ढेर सारी कल्पनाशीलता का उपयोग करते हैं. न सिर्फ हिंदी संवादों में क्रिएटिविटी नजर आती है बल्कि सह-कलाकारों को भी मयूर काफी सारी देसी और हास्य से भरपूर पंक्तियां देते हैं. मुख्य कलाकारों के संवाद पहले से इतने आइकॉनिक हैं कि उनको बदलने का विकल्प उन्हें शायद दिया ही नहीं गया होगा.

हिंदी गानों में वह असर पैदा नहीं हो पाता जो क्लासिक का दर्जा रखने वाले मौलिक अंग्रेजी गानों में है. एल्टन जॉन के रचे नए अंग्रेजी गीतों पर चढ़े हिंदी शब्द इन गीतों को केवल बॉलीवुड के चलताऊ गीतों का रंग और मिजाज दे पाते हैं. किसी म्यूजिकल फिल्म के लिए यह अच्छी बात कतई नहीं है, वह भी तब जब डिज्नी की कई मौजूदा रीमेक अपने म्यूजिक को एक खूबी मानकर चलती हैं. बस ‘हकूना मटाटा’ का हिंदी वर्जन दिल जीत पाता है, और परदे पर खूबसूरत विजुअल्स के सहारे बेहद खूबसूरत रूप अख्तियार करता है.

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हिंदी वर्जन में शेर मुफासा की आवाज शाहरुख खान बने हैं और मुफासा के पुत्र सिम्बा के युवा होने पर उसकी आवाज शाहरुख के पुत्र आर्यन खान. फिल्म में सिम्बा का चाचा स्कार (आशीष विद्यार्थी) हुकूमत पाने के लिए षडयंत्र रचता है और बड़े होने के बाद सिम्बा इस हुकूमत के लिए स्कार से एक लड़ाई लड़ता है.

बताते चलें कि शाहरुख और आर्यन की इन आवाजों का फिल्म से जुड़ना कहीं से भी ‘द लायन किंग’ को कोई अलहदा पहचान नहीं दे पाता. जब इन आवाजों को सुनने की आपकी उत्सुकता समाप्त हो जाती है और फिल्म में बाकी के पेशेवर वॉइस-ओवर आर्टिस्ट्स व फिल्मी दुनिया के दूसरे कलाकारों की आवाजों को आप लगातार सुनते चलते हैं तो पता चलता है कि शाहरुख और आर्यन की आवाज केवल फिल्म को हिंदुस्तान में लोकप्रिय बनाने की ‘गिमिक्री’ भर थी.

बिना किसी खास वॉइस माड्यूलेशन वाली शाहरुख की आवाज मुफासा को जरूरी बड़प्पन और दार्शनिकता तो देती है, लेकिन अगर आपने ओरिजनल फिल्म में एक्टर जेम्स अर्ल जोन्स की बेहद प्रभावी आवाज सुनी है तो आप आसानी से समझ सकेंगे कि एक्टर होना और वॉइस-ओवर आर्टिस्ट होना हमेशा एक बात नहीं होती.

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आर्यन खान युवा सिम्बा को आवाज देते हैं और किशोर अवस्था की आवाज की जरूरत को पूरा तो करते हैं, लेकिन उनकी आवाज अपरिपक्व होने के अलावा अभी तक खुले गले की आवाज भी नहीं है. और वॉइस-ओवर में जब तक आवाज खुले गले से नहीं निकलती तब तक किरदार नहीं बनती. उनकी तुलना में तो बचपन के सिम्बा की खुली आवाज बना कलाकार ज्यादा प्रभावित करता है.

ये नेपोटिज्म है कि नहीं, इसका फैसला आप स्वयं लें. लेकिन कृपा करके ‘हाए! इसकी वॉइस तो शाहरुख से कितनी मिलती है’ जैसी बचकानी बातों से ऊपर उठें.

बाकी, स्कार के रोल में आशीष विद्यार्थी की आवाज एकदम उम्दा है और ओरिजनल फिल्म में उपयोग हुई ब्रिटिश एक्टर जेरेमी आइरन्स की कमाल आवाज के स्तर की शैतानियत व चालाकी लिए है. पक्षी जाजू की आवाज बनकर असरानी कमाल का असर छोड़ते हैं और बेहद वरिष्ठ हो चुके इस कलाकार से इस स्तर की ऊर्जावान और जिंदादिल आवाज की उम्मीद बिलकुल नहीं थी.

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आखिर में सिम्बा के दोस्त बने पुम्बा और टिमोन की आवाज बने क्रमश: संजय मिश्रा और श्रेयस तलपड़े की बात करना बेहद जरूरी है. असरानी के अलावा ये दोनों ही आवाजें इस फिल्म में आपका सबसे ज्यादा मनोरंजन करने वाली हैं. मयूर पुरी ने उन्हें टपोरी बंबईया भाषा जरूर दी है, जो वैसे तो डबिंग के संसार का एक चिढ़ पैदा करने वाला क्लीशे बन चुकी है, लेकिन दिलचस्प लेखन की वजह से इस फिल्म में गजब का असर छोड़ती है.

और संजय मिश्रा और श्रेयस तलपड़े की जोड़ी यह भी बेहतर तरीके से बता देती है कि फिल्मी कलाकारों को केवल आवाजों के सहारे आखिर किस स्तर का अभिनय करना चाहिए.