उत्तर प्रदेश विधानसभा की एक दर्जन से ज्यादा सीटों पर होने वाले उपचुनावों के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने उम्मीदवारों के चयन का सिलसिला शुरू कर दिया है. अमूमन उपचुनावों से दूरी बना कर रखने वाली बसपा इस बार विधानसभा उपचुनावों के लिए काफी संजीदा है. इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उसने इन्हीं चुनावों के नाम पर समाजवादी पार्टी (सपा) से लोकसभा चुनाव वाला गठबंधन भी एक झटके से तोड़ दिया.
बसपा में इन उपचुनावों को लेकर बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो पहले कभी नहीं हुआ. अंदर की जानकारी रखने वालों की मानें तो पार्टी में यह भी पहली बार हो रहा है कि टिकट के दावेदारों से नगद रकम नहीं मांगी जा रही. वैसे टिकट के लिए मोटी रकम मांगे जाने का आरोप बसपा के लिए नया नहीं है. पिछले तीन चार साल में 20 से अधिक बड़े बसपा नेता मायावती पर टिकट के लिए मोटी रकम वसूलने का आरोप लगा कर पार्टी छोड़ चुके हैं. लेकिन इस बार चर्चा है कि उपचुनावों के संभावित दावेदार उम्मीदवारों से नगद रकम के बजाय चुनावी बॉन्ड जैसी पक्की व्यवस्था के जरिए पैसे देने की बात की जा रही है.
बसपा से जुड़े रहे एक बड़े नेता का कहना है कि शायद अपने भाई आनंद कुमार पर कानूनी शिकंजे के चलते मायावती अब टिकट देने के लिए नंबर दो के बजाए नंबर एक की रकम लेना चाहती हैं ताकि आगे उन पर कोई आंच न आए. वे कहते हैं, ‘मायावती पैसे लेना तो छोड़ नहीं सकतीं. हां, भाई के फंसने के बाद अब कम से कम पार्टी के नाम पर जायज तरीके से लेने की बात तो करने लगी हैं.’
जानकारों का मानना है कि अब तक सारी रकम अपने पास ही रखने वालीं मायावती अगर अब पार्टी के नाम पर राजनैतिक चंदे की बात करने लगी हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं उनके भाई आनंद कुमार की कथित काली कमाई के खिलाफ हो रही कानूनी कार्रवाइयों का खौफ है. पिछले दिनों खबर आई थी कि आनंद कुमार के नोएडा स्थित 400 करोड़ के बेनामी प्लाट को आयकर विभाग ने जब्त कर लिया. इसके बाद मायावती के भाई आनंद कुमार और उनकी पत्नी विचित्रलता की कथित बेनामी संपत्तियों के खिलाफ आयकर विभाग और ईडी से लेकर अन्य कई सरकारी एजेंसियों की जांच में बहुत तेजी आ गई है. दूसरी तरफ, मायावती के मुख्यमंत्री रहते हुए उत्तर प्रदेश की 14 चीनी मिलें औने-पौने दाम पर बेचे जाने के मामले की उच्चस्तरीय भी जांच तेज हो गई है. जाहिर है इन सब बातों ने मायावती की परेशानियां बढ़ा दी हैं.
मायावती के लिए समस्या यह भी है कि आनंद कुमार सिर्फ उनके भाई ही नहीं बल्कि बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. उन्होंने मायावती की राजनीति के साथ ही अपनी विकास यात्रा शुरू की थी. 1994 में आनंद कुमार ने नोएडा विकास प्राधिकरण में चतुर्थ श्रेणी कर्मी के रूप में नौकरी की शुरुआत की. 2000 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी. इसके बाद मायावती जब-जब सत्ता में रहीं, आनंद कुमार नोएडा के अघोषित सर्वेसर्वा रहे. वे आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी के बाद भी चर्चा में आए थे जब उनके खातों में 1.43 करोड़ रु के पुराने नोट जमा होने की खबर आई.
2006 में कांशीराम की मृत्यु के बाद बसपा में कांशीराम वाला रुतबा ग्रहण करते हुए मायावती ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा की थी कि बसपा संस्थापक के सपनों को पूरा करने के लिए वे अपने किसी रिश्तेदार को पार्टी में कोई पद नहीं देंगी. उस समय कांशीराम के परिवार द्वारा मायावती पर कांशीराम की राजनीतिक विरासत को जबरन हड़पने का आरोप लगाया जा रहा था. लेकिन मायावती की उस घोषणा पर आखिरकार भाई-बहन का प्यार भारी पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद 23 जून 2019 को मायावती ने आनंद कुमार को बहुजन समाज पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया. इतना ही नहीं उन्होंने आनंद कुमार के पुत्र आकाश को अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए बसपा का राष्ट्रीय संयोजक भी बना दिया.
यानी आनंद कुमार का मामला अब सिर्फ मायावती के परिवार का मामला न रह कर बसपा के राजनीतिक चेहरे का भी मामला हो गया है. इसीलिए बसपा मुखिया आक्रामक हो गई हैं. आनंद कुमार की संपत्ति की जब्ती की कार्रवाई शुरू होते ही मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसे भाजपा की साजिश बताया. उनका कहना था. ‘बीजेपी विरोधियों को फंसाने में लगी है लेकिन हमारी पार्टी डरने और झुकने वाली नहीं है.’
यहां तक तो बात कुछ समझ में आती है लेकिन मायावती आनंद कुमार के बचाव मे यह आरोप लगाने से भी नहीं चूकीं कि भाजपा ने पिछला लोकसभा चुनाव बेनामी संपत्ति के जरिए ही जीता है. उनका कहना था, ‘जब दलित वंचित वर्ग का कोई व्यक्ति तरक्की हासिल करता है तो भाजपा को बहुत परेशानी होती है. लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खाते में दो हजार करोड़ जमा हुए जिसका आजतक कोई खुलासा नहीं हुआ.’
वैसे खुद मायावती का आर्थिक विकास भी कम चमत्कारिक नहीं लगता. 2004 के चुनावी हलफनामे में मायावती की संपत्ति 11 करोड़ रु थी. 2007 के विधान परिषद चुनाव में दिए गए हलफनामे में यह 87.27 करोड़ हो चुकी थी. फिर 2012 के राज्यसभा चुनाव के हलफनामे में बसपा मुखिया की संपत्ति 111 करोड़ रु बताई गई. चूंकि 2012 के बाद मायावती ने कोई चुनाव नहीं लड़ा इसलिए 2012 के बाद उनकी व्यक्तिगत संपत्ति सार्वजनिक नहीं हुई है.
2012 की घोषणा में मायावती ने बादलपुर की पैतृक संपत्ति और घर का जिक्र नहीं किया था. हां, तीन बंगलों को जोड़ कर नई दिल्ली के लुटियन जोन में एक बड़ा बंगला, कनाट प्लेस में बी-34 में ग्राउंड और फर्स्ट फ्लोर में आठ हजार वर्गमीटर से अधिक की वाणिज्यिक सम्पत्ति, नई दिल्ली में ही सरदार पटेल मार्ग पर 43 हजार वर्गफीट की संपत्ति. लखनऊ में नौ माल एवेन्यू में करीब 71 हजार वर्ग फीट में बना भवन और 11 करोड़ की नगदी का उल्लेख उनके हलफनामे में जरूर था. कई जानकार तो यह तक मानते हैं कि मायावती और उनके भाई के परिवार से जुड़ी बेनामी सम्पत्तियों का आंकड़ा एक हजार करोड़ से भी ऊपर है और उन पर कोई उंगली न उठ पाए, इस वजह से वे उपचुनावों के दौरान पैसे के लेन-देन में कोई कच्चा काम करने के खतरे से बचना चाह रही हैं.
मायावती के लिए आनंद कुमार का मामला दोतरफा आफत लेकर आ रहा है. एक ओर इस प्रकरण ने उनके कार्यकाल के दौरान आनंद कुमार के कारनामों की पोल खोलनी शुरू कर दी है. अब बातें हो रही हैं कि किस तरह बसपा शासन में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण में निर्माण कार्यों के ठेकों से लेकर भूमि आवंटन तक के सारे फैसले आनंद कुमार के दरबार में किए जाते थे और इन प्राधिकरणों के जिम्मेदार अधिकारी आनंद कुमार के सामने नतमस्तक दिखते थे. आम्रपाली जैसे दर्जनों बिल्डरों को मात्र 10 फीसदी रकम जमा करके भूमि आवंटित करने का खेल भी आनंद कुमार की ही देन था जिसका खामियाजा आज घर का सपना देखने वाले हजारों लोगों से लेकर ये सारे प्राधिकरण भी झेल रहे हैं.
दूसरी ओर आनंद कुमार को संरक्षण देने के सवाल पर मायावती की राजनीतिक मुश्किलें भी बढ़ने लगी हैं. इसलिए कि भले ही मायावती भाजपा पर बेनामी पैसा जुटाने का कितना भी आरोप लगा लें, इससे उनके खुद के दाग धुलने वाले नहीं हैं. अगर भाजपा ने बेनामी पैसे का चुनावी इस्तेमाल किया है तो इसकी सजा कभी न कभी भाजपा को जरूर मिलेगी. मगर दूसरा बड़ा चोर है, ऐसा कह कर मायावती खुद को आरोपों से बचा नहीं सकतीं. आनंद कुमार के बहाने से ही सही, अगर उत्तर प्रदेश के बड़े कहे जाने वाले राजनेताओं की काली कमाई कानून के शिकंजे में फंसती है और कुछ लोगों को सजाएं मिलती हैं तो शायद देश की राजनीति की कालिख कुछ कम हो सकेगी.
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