जैसी कि उम्मीद थी रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए एक बार फिर अपनी ब्याज दरों में कटौती की घोषणा की. आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की यह लगातार पांचवीं बैठक थी, जब रेपो रेट में कटौती की घोषणा की गई. इस बार यह कटौती 25 बेसिस प्वाइंट या .25 फीसदी की रही. अगर इससे पहले की भी चार बार की कटौतियों को जोड़ दिया जाए तो आरबीआई इस साल अपनी ब्याज दर 1.35 फीसद कम कर चुका है. शुक्रवार के बाद यह 5.15 फीसद के स्तर पर आ गई हैं जो पिछले नौ सालों में सबसे कम हैं. ब्याज दर में कटौती की इस घोषणा के साथ आरबीआई ने अपना जो रूख रखा है, वह यह है कि अगर जरूरत पड़ी तो इसमें और कटौती कर सकता है.

लेकिन आरबीआई के रेपो रेट में फिर से कमी करने के बाद भी बाजार कुछ खास उत्साहित नहीं दिखा और सेंसेक्स 400 से ज्यादा अंक लुढ़क गया. कुछ जानकारों का मानना है कि वह ब्याज दरों में इससे ज्यादा कमी की उम्मीद कर रहा था. वही, कुछ का मानना है कि ब्याज दर कम करने से बाजार में खुशी तो आई, लेकिन चालू वित्तीय वर्ष में आर्थिक वृद्धि के अनुमान में कमी ने उसे मायूस कर दिया. आरबीआई ने 2019-20 के वित्त वर्ष में जीडीपी की वृद्धि दर के अनुमान को 6.9 से घटाकर सीधे 6.1 फीसद कर दिया है.

Advertisement

मंदी को आए हुए लगभग एक साल हो चुका है और इससे निपटने के लिए आरबीआई लगातार कर्ज सस्ते कर रहा है. लेकिन आर्थिक गतिविधियों में इसके चलते बहुत तेजी आई हो, ऐसा नहीं दिखता है. तो क्या कर्ज सस्ते कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की आरबीआई की तरकीब काम नहीं कर रही है? अब यह सवाल उठने लगा है कि सिद्धांत के रूप में कर्ज सस्ता करने की बात ठीक लगती है, लेकिन क्या व्यवहारिक रूप से अर्थव्यवस्था की दिक्कतें दूसरी हैं?

कर्ज सस्ता हो रहा है, पर न खपत बढ़ रही है निवेश

कर्ज सस्ता होने से अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी, यह धारणा इस बात पर आधारित है कि तब कारोबारी ज्यादा लोन लेंगे और निवेश करेंगे. इसके अलावा कर्ज सस्ते होने से उपभोक्ता भी कार, घर और अपनी जरूरत की चीजें खरीदने की सोचेंगे और इससे खपत बढ़ेगी. लेकिन, ब्याज दरों के नौ साल के अर्से में सबसे नीचे होने पर भी ये दोनों चीजें होती नजर नहीं आ रही हैं. निवेश सलाहकार हरमीत सिंह कहते हैं कि रेपो रेट नीचे आ रहे हैं यानी बैंकों को कर्ज सस्ते में मिल रहा है, लेकिन वे उसका लाभ ग्राहकों तक नहीं पहुंचा रहे हैं. रेपो रेट में अब तक 1.35 फीसद की कटौती हुई, लेकिन ग्राहकों की ईएमआई पर इसका असर महज 0.40 से 0.45 फीसद तक ही देखा गया है.

Advertisement

हरमीत कहते हैं कि इस समय मार्केट के जो हालात हैं, उसमें कोई नए लोन लेकर खर्च करेगा, इसकी संभावना कम हैं. हां, अगर ब्याज दरों में हुई कटौती को बैंक पूरा का पूरा ग्राहकों तक पहुंचा दें तो उसके पास कुछ अतिरिक्त पैसे बचेंगे जिन्हें वह कुछ अन्य चीजों पर खर्च करेगा और यह खपत बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है. लेकिन, पुराने कर्जों की ब्याज दर कम नहीं हो रही है और ईएमआई सस्ती होने की बात सिर्फ हेडलाइंस तक ही सीमित है. इसलिए सस्ते कर्ज से खपत बढ़ाने की तरकीब बहुत कम काम कर रही है. एक प्रकाशन संस्थान में नौकरी करने वाले अभिषेक चौधरी कहते हैं कि कर्ज लेने की इच्छा का सवाल आपकी आय से सीधा जुड़ा होता है. वे कहते हैं कि अगर कमाई अच्छी हो और उसके बढ़ने की संभावना हो तो आदमी कर्ज ले लेता है, भले ही वह कुछ महंगा ही क्यों न हो. लेकिन, अगर कारोबार में सुस्ती हो और आगे का भी कुछ पता न हो तो फिर कर्ज सस्ता ही क्यों न हो लेने की हिम्मत नहीं पड़ती.

ये दोनों बातें बताती हैं कि सस्ते कर्ज के जरिये खपत बढ़ाने का मनोविज्ञान किस तरह से बैंकों की नीयत, रोजगार, आय और उसके स्थायित्व से जुड़ा है. शायद यही वजह है कि आरबीआई की ब्याज दर कम होने के बाद भी बाजार उस तरह की तेजी नहीं पकड़ पा रहा है.

लेकिन यह तो रही एक आम उपभोक्ता की बात जो कर्ज लेते समय तमाम चीजें देखता है. लेकिन कारोबारी सस्ते कर्ज का लाभ उठाकर उद्योग का विस्तार क्यों नहीं कर रहा है? अपना निवेश क्यों नहीं बढ़ा रहा है? रेपो रेट घटने पर कारोबारियों को लाभ होता है, यह सही है. मान लीजिए कि 1000 करोड़ रूपये का कर्ज लेने वाले उद्यमी की किस्त 30 बेसिस प्वाइंट के आधार पर भी घटती है तो कर्ज चुकाने में उसकी खासी बचत हो जाती है. इससे कारोबारी का लाभ बढ़ता है और उम्मीद की जाती है, वह इन पैसों का निवेश करेगा और कुछ और लोगों को रोजगार देगा. लेकिन, ऐसा भी नहीं हो रहा है.

Advertisement

आर्थिक जानकार मानते हैं कि निवेश बाजार की संभावना को देखकर होता है. बाजार में साफ दिख रहा है कि खपत नहीं है तो उद्यमी क्यों निवेश करके अपना पैसा फंसाएगा. ज्यादातर मामलों में तो इस समय कारोबारी पहले से ही मांग से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं. उनके पास स्टॉक भरा पड़ा है और बिक्री नहीं हो रही है. ऐसे में सस्ते कर्ज को वह विस्तार में लगाने के बजाय अपनी लागत घटाने के तौर पर लेता है और अपनी बैलेंसशीट दुरुस्त करता है.

आर्थिक जानकार मानते हैं कि सस्ते कर्ज का लाभ तभी दिखेगा जब बाजार में रोजगार और आय का नया सिलसिला शुरु होगा, कृषि क्षेत्र में सुधार किए जाएंगे और ग्रामीण खपत बढ़ेगी. सस्ते कर्ज का लाभ संगठित उद्योगों को तो थोड़ा बहुत मिल जाता है, लेकिन बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार देने वाले असंगठित उद्योगों को कर्ज मिलना अभी भी कठिन है. सरकार ने अभी हाल ही में शामियाना मेला लगाकर कर्ज देने की घोषणा की थी. लेकिन, अब कहा जा रहा है कि वहां सिर्फ कर्ज के लिए आवेदन लिए जाएंगे, उनका अप्रूवल नहीं किया जाएगा. यह बताता है कि कर्ज सस्ते होने की कितनी भी घोषणाएं की जाएं, लेकिन अभी उन क्षेत्रों को कर्ज मिलना आसान नहीं है, जिन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरुरत है.

बचत पर घटता रिटर्न चिंता और बढ़ाएगा

Advertisement

आरबीआई द्वारा रेपो रेट घटाए जाने का लाभ ग्राहकों तक नहीं पहुंच पा रहा है, आरबीआई भी इसको लेकर चिंतित है. इसके लिए उसने बैंकों के कर्ज को रेपो रेट से लिंक करने को कहा है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने कर्जों को रेपो रेट से लिंक करने की घोषणा कर भी दी है. लेकिन, इसका एक दूसरा पक्ष भी है. बैंक अगर सस्ती दरों पर कर्ज देंगे तो वे अपनी बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज को भी कम करेंगे. यानी कर्ज सस्ता होने के साथ-साथ आपको बचत योजनाओं पर मिलने वाला ब्याज भी कम मिलेगा. आरडी, एफडी सभी इसकी जद में आएंगे. इससे उन लोगों पर तो फर्क पड़ेगा ही जो अपनी बचतों पर निर्भर रहते हैं जैसे रिटायर्ड कर्मचारी. लेकिन, बचत पर कम रिटर्न की आमद सामान्य कमाई वाले की मानसिकता पर भी फर्क डाल सकती है और वह अपने खर्च और घटा सकता है ताकि हाथ मेंं पैसा बना रहे. यह प्रवृत्ति खपत को और घटाएगी. यह इसलिए भी खराब होगा क्योंकि भारत में बचत की वृद्धी दर पिछले एक दशक में सबसे नीचे चल रही है जो यह भी बताती है कि लोगों की आय नहीं बढ़ी है. ऐसे में बचत की ब्याज दर घटी तो बैंकिंग सेक्टर के लिए यह चिंता की बात होगी क्योंकि उनकी आमदनी का सबसे बड़ा जरिया बचत ही है.

क्या आरबीआई ने भी मान लिया है कि मंदी लंबी चलने वाली है

एमपीसी की बैठक में ब्याज दरों में कटौती के साथ इस साल के आर्थिक वृद्धि के अनुमान में भी कटौती की गई. अनुमान में यह कटौती थोड़ी बहुत नहीं बल्कि चौंका देने वाली है. आरबीआई ने इस साल के आर्थिक वृद्धि के अनुमान को 6.9 से सीधे 6.1 फीसद पर ला दिया है. हाल-फिलहाल में कभी आर्थिक वृद्धि का अनुमान इतनी तेजी से नहीं घटाया गया है. ग्रोथ के अनुमान में इतनी तेज कमी का आखिर क्या मतलब निकाला जाए. क्या आरबीआई ने मान लिया है कि अर्थव्यवस्था बहुत जल्द रफ्तार पकड़ने वाली नहीं है? या फिर आर्थिक वृद्धि का अनुमान पहले ज्यादा कर लिया गया था?

Advertisement

आरबीआई इस साल लगातार कर्ज की दर घटा रही है और उसने संकेत दिया है कि आगे वह इसे और घटा सकता है. लेकिन खुद आरबीआई को ही उम्मीद नहीं है कि सस्ते कर्ज के बाद भी हालात तेजी से सुधरेंगे. यानी अर्थव्यवस्था का इलाज सिर्फ सस्ते कर्ज में नहीं है, अपरोक्ष रूप से आरबीआई इसे भी मान रहा है. महंगाई अभी सैंद्धांतिक तौर पर नियंत्रण मेें हैं, लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमतों और खाद्य पदार्थों में उछाल आया तो सस्ते कर्ज के इस रूख को आरबीआई कैसे बरकरार रखेगा, यह चिंता वाली बात है. और तब उसका चालू खाते का घाटा भी और बढ़ सकता है. इसके अलावा लगातार सस्ते कर्ज के साथ सरकार का राजकोषीय घाटा भी उसके लिए चिंता का विषय हो सकता है.

आर्थिक वृद्धि के आकलन मेें 0.8 फीसदी की गिरावट इस एमपीसी की सबसे चिंताजनक बात दिखती है और इसी ने शेयर बाजार को भी गोता लगवा दिया. कॉरपोरेट टैक्स में कटौती से झूमा शेयर बाजार इसके बाद फिर से लगभग अपने पुराने वाले स्तर पर आ चुका है. यानी पिछले कुछ दिनों में बजट को शीर्षासन करा देने जैसी कोशिशें भी अब बहुत ज्यादा असर करती नहीं दिख रही हैं. इसके चलते अर्थव्यवस्था की बुनियाद में कहां दिक्कत आ चुकी है यह देखने की जरूरत है. लेकिन फिलहाल तो इसकी कोई प्रत्यक्ष कोशिश होती नहीं दिख रही है.