हाल ही में बने नागरिकता संशोधन कानून - जिसको अंग्रेजी में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट कहा जा रहा है - को देश भर में मुस्लिम विरोधी कहा जा रहा है और लगभग पूरे देश में ही इसके खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं.

लेकिन जम्मू-कश्मीर और उसमें भी खास तौर पर कश्मीर घाटी में इस कानून के खिलाफ अभी तक कोई प्रदर्शन नहीं हुए हैं. हालांकि जम्मू-कश्मीर देश का इकलौता मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य था जो हाल-फिलहाल में ही केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया है.

तो क्या वजह है कि कश्मीर घाटी में 90 प्रतिशत से ज़्यादा मुस्लिम आबादी होने के बावजूद यहां नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक भी प्रदर्शन अभी तक नहीं हुआ है?

Advertisement

कारण कई हैं. आम आदमी नज़र दौड़ाए, तो यहां के पिछले पांच महीनों के हालात को सबसे बड़ा कारण मानेगा. लेकिन जानकारों की सुनें तो सबसे बड़ा कारण हालात नहीं बल्कि लोगों की राजनीतिक सोच या यूं कहें राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं, जो देश के दूसरे हिस्से के लोगों से अलग हैं.

कश्मीर के जाने-माने राजनीतिक टिप्पणीकार और कश्मीर विश्वविध्यालय में पॉलिटिकल साइन्स विभाग के प्रमुख रहे, नूर अहमद बाबा कहते हैं कि कश्मीर के मुसलमानों की समस्याएँ और चिंताएं हमेशा हिंदुस्तान के बाकी हिस्सों के मुसलमानो से अलग रही हैं.

“कश्मीर की राजनीति, यहां के लोगों की पहचान और उनकी महत्वाकांक्षाएं हमेशा से अलग रही है” सत्याग्रह से बात करते हुए नूर अहमद बाबा कहते हैं कि हिंदुस्तान के बाकी हिस्सों के मुसलमानों की एक ही प्रतिबद्धता रही है और वह है भारत का धर्मनिशपेक्ष होना. वहीं, बाबा बताते हैं, कश्मीर के मुसलमान की राजनीतिक सोच इससे बिलकुल परे है.

Advertisement

“यहां कुछ कश्मीर की विशेष स्थिति वापिस चाहते हैं, कुछ अपना फैसला खुद करना चाहते हैं (राइट टू सेल्फ डिटर्मिनेशन), कुछ सोचते हैं कि कश्मीर वो नहीं है जो होना चाहिए था और कुछ यह चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान और भारत के बीच एक पुल बने” बाबा बताते हैं कि कुल मिलाकर भारत के मुसलमान कश्मीर के मुसलमानों की चिंताओं की कदर नहीं करते और कश्मीरी मुसलमान भी भारत के विभिन्न भागों में रह रहे मुसलमानों की चिंताएं नहीं पहचानता.

सिर्फ नूर अहमद बाबा ऐसा नहीं सोचते. सत्याग्रह ने कश्मीर में और भी जानकारों से बात की. इनमें से कई बाबा की राय से इत्तेफाक रखते हैं.

टिप्पणीकार और लेखक, एजाज़ अशरफ वानी, भी इनमें से एक हैं. लेकिन वे यह भी कहते हैं कि कश्मीर का मुसलमान सिर्फ भारत के मुसलमानों से नहीं बल्कि सारे लोगों से बेज़ार है, और यहां लोगों को लगता ही नहीं है कि यह मुद्दा उनका है. लेकिन यह दोतरफा है.

Advertisement

“हाल ही में 370 हटा दिया गया, कश्मीर चार महीने बंद रहा. भारत में कितनी जगह प्रदर्शन हुए” वानी पूछते हैं, “चलें छोड़ें 370 को, यह राजनीतिक मुद्दा है. यहां इंटरनेट बंद है, स्कूल कॉलेज बंद हैं इन सब मुद्दों पर कितने प्रदर्शन हुए हैं भारत में.”

एजाज़ अशरफ वानी कहते हैं कि कश्मीर के लोगों और भारत के बाकी हिस्सों में जो दरार है वह इस मुद्दे से फिर एक बार सामने आई है. उन्हे लगता है कि न सिर्फ भारत सरकार को बल्कि लोगों को भी इस बारे में सोच-विचार करने की ज़रूरत है.

बाबा और वानी की ये बातें सच तो लगती हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि चाहे सीरिया हो या फ़लस्तीन, कश्मीर में लोग दुनिया के बाकी मुसलमानों के मुद्दों को लेकर भी अक्सर सड़कों पर उतरते रहे हैं.

Advertisement

तो इस समय क्यों नहीं निकल रहे हैं लोग बाहर? सत्याग्रह ने काफी आम लोगों और जानकारों से इस बारे में बात की और इस बात के जो कारण सामने आए वे इस तरह हैं.

कश्मीर घाटी में बीती चार अगस्त से इंटरनेट बंद है और कुछ लोगों को लगता है कि यह प्रदर्शन न होने के सबसे बड़े कारणों में से एक है. यहां इंटरनेट अनुच्छेद 370, जो कश्मीर को भारत के संविधान में एक विशेष स्थिति प्रदान करता था, हटाये जाने से एक दिन पहले बंद कर दिया गया था और अभी तक बहाल नहीं हुआ है.

इंटरनेट न होने की वजह से ज्यादातर लोग बाहर की दुनिया की अधिकतर खबरों से बेखबर हैं. लोग टीवी पर समाचारों को देख तो सकते हैं पर ज्यादातर लोगों ने उस तरह से समाचारों को देखना अब बंद कर दिया है.

Advertisement

“मैं भी लोगों से बात कर रहा हूं और मुझे कोई आश्चर्य नहीं है कि ऐसा है क्यूंकि इंटरनेट बंद होने की वजह से लोग चीजों से बेखबर हैं,” श्रीनगर में काम कर रहे पत्रकार, मुहम्मद राफि, ने सत्याग्रह से बात करते हुआ कहा.

दूसरी तरफ देखा जाये तो जहां भी नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं, वहां छात्र सबसे आगे हैं. लेकिन कश्मीर में पिछले पांच महीनों से शिक्षा के सारे केंद्र बंद हैं.

370 हटाये जाने के समय सरकार ने यहां के सभी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी बंद करने का ऐलान किया था. बाद में सरकार ने तो बोल दिया कि स्कूल खोल दिये जाएं लेकिन अब तक ऐसा हो नहीं सका है.

Advertisement

“भले ही कश्मीर के मुसलमान इस मुद्दे को अपना मुद्दा न समझते हों लेकिन मुझे यकीन है कि अगर यहां कॉलेज और विश्वविध्यालय खुले होते तो प्रदर्शन ज़रूर होते” सिविल सर्विस की तैयारी करने वाले छात्रों को पॉलिटिकल साइन्स पढ़ाने वाले, इम्तियाज़ शेख, इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि कश्मीर के छात्र राजनीतिक रूप से काफी जानकार हैं और वे इस मुद्दे पर भारत के भिन्न भागों के छात्रों का साथ जरूर देते.

इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून एक राजनीतिक मुद्दा है और राजनीति तो हमेशा राजनेता ही करते हैं. लेकिन कश्मीर में हर प्रकार के राजनेता, चाहे वे मुख्य धारा के हों या अलगाववादी, पिछले पांच महीनों से हिरासत में हैं.

दो पूर्व मुख्यमंत्री, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती, चार अगस्त से अलग-अलग जगहों पर बंद हैं. कश्मीर के वरिष्ठ राजनेता और पूर्व मुख्यमंत्री रहे फारूक अब्दुल्ला अपने घर में नज़रबंद हैं.

Advertisement

“कुल मिला के देखें तो कश्मीर में एक राजनीतिक निर्वात बन गया है, तो इस मुद्दे पर बयानबाज़ी या राजनीति करने वाला कोई नहीं है” मुख्य धारा के एक मध्यवर्ग के राजनेता ने सत्यग्रह से बात करते हुए कहा.

उन्होने कहा कि उनका नाम न प्रकाशित किया जाये. “में अभी अभी छूटा हूँ, नाम आया तो शायद फिर बंद कर दिया जाऊं.”

कुछ लोगों को लगता है कि कश्मीर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन न होने की एक और वजह है - लोगों की थकान.

पांच अगस्त को जब यहां प्रतिबंध लगे तो कश्मीर घाटी में ज़्यादा प्रदर्शन नहीं हुए. उस वक्त सुरक्षा का काफी सख्त बंदोबस्त था और लोग काफी डरे हुए थे. लेकिन प्रतिबंध हटने के बाद भी कश्मीर में सबकुछ सामान्य कुछ नहीं हुआ. यहां कुछ जगहों पर कामकाज होने लगा है, पर कुछ इलाके अभी भी बंद पड़े हुए हैं.

Advertisement

श्रीनगर को ही ले लें जहां एक बजे के बाद अभी भी काफी इलाकों में दुकानें बंद हो जाती हैं.

“तो इतना लंबा प्रदर्शन - जो कश्मीर के लोगों ने अपना काम काज ठप्प करके किया है - करने के बाद थकान का आना लाज़मी है. फिर से उसी दिशा में जाना अभी शायद लोगों को सही नहीं लग रहा है” श्रीनगर के एक और पत्रकार, शम्स इरफान कहते हैं.

तो अब कारण जितने भी गिनाए जाएं, मुद्दे की बात यह है कि कश्मीर में नागरिकता संशोधन कानून को लेके प्रदर्शन नहीं हो रहे हैं और शायद होने की कोई संभावना भी नहीं है.