सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया मामले में फांसी की सजा पाए चार दोषियों में से एक अक्षय कुमार ठाकुर की क्यूरेटिव पिटीशन खारिज कर दी है. जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस रोहिंगटन फली नरीमन, जस्टिस आर भानुमति और जस्टिस अशोक भूषण की की पीठ ने इस याचिका पर चैंबर में ही सुनवाई की.
खबरों के मुताबिक दोषी अक्षय कुमार ठाकुर द्वारा दायर क्यूरेटिव पिटीशन में कहा था कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर जनता का दबाव होता है जिसके चलते अदालतें सभी समस्याओं के समाधान के रूप में फांसी की सजा सुना रही हैं. इसमें कहा गया था, ‘यह दावा खोखला है कि मौत की सजा एक विशेष तरह का प्रतिरोध पैदा करती है जो उम्र कैद की सजा से नहीं हो सकता और उम्र कैद अपराधी को माफ करने जैसी सजा है.’ अक्षय ने अपनी याचिका में यह दावा भी किया था कि बलात्कार और हत्या के करीब 17 मामलों में शीर्ष न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मौत की सजा में बदलाव कर उसे हल्का किया है.
इससे पहले शीर्ष अदालत इस मामले के दो दोषियों मुकेश और विनय की क्यूरेटिव याचिका खारिज कर चुकी है. अब केवल एक दोषी पवन के पास क्यूरेटिव याचिका दाखिल करने का विकल्प है. क्यूरेटिव पिटीशन किसी दोषी के पास अदालत में अंतिम कानूनी उपाय होता है. इसके बाद वह राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेज सकता है. मामले के दो अन्य दोषियों- विनय कुमार शर्मा और मुकेश कुमार सिंह द्वारा दायर क्यूरेटिव याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है. चौथे दोषी पवन गुप्ता ने अभी याचिका दायर नहीं की है. उसके पास अब भी यह विकल्प है.
यानी पूरी संभावना है कि दोषियों को एक फरवरी को दी जाने वाली फांसी की सजा फिर टल जाए. कानूनी कवायदों के चलते यह 22 जनवरी को भी टल गई थी. इस बीच खबर यह भी है कि दोषियों के वकील ने इस फांसी पर रोक की मांग के साथ आज दिल्ली की एक अदालत का रुख किया है. वकील का कहना है कि कुछ दोषियों ने अभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल नहीं किया है.
16 दिसंबर 2012 की रात दक्षिण दिल्ली में एक चलती बस में 23 साल की निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था. बर्बरता के बाद उसे सड़क पर फेंक दिया गया. कई दिनों तक जिंदगी की जंग लड़ने के बाद निर्भया ने 29 दिसंबर को सिंगापुर के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया था. इस घटना के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए थे.
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