गुजरात में एक नए दलित-आदिवासी आंदोलन की सुगबुगाहट है. वजह है राज्य सरकार की तरफ से अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी) को मिलने वाले विशेष बजट के उचित निर्धारण और उपयोग के लिए उचित व्यवस्था की मांग. इसके लिए दसादा विधानसभा क्षेत्र से आने वाले कांग्रेस के विधायक नौशाद सोलंकी ने 2018 में गुजरात विधानसभा में प्राइवेट बिल पेश किया था. लेकिन जब बजट सत्र के दौरान इस बिल पर चर्चा की बारी आई तो स्पीकर राजेंद्र त्रिवेदी ने इस पर मतदान की मंज़ूरी ही नहीं दी. इससे सदन में मौजूद कांग्रेस समेत सभी विपक्षी विधायक नारेबाज़ी करते हुए पहले वेल में धरने पर बैठे और फिर सदन से वॉकआउट कर गए.

इस बिल का आधार क्या है?

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साल 1980 में इंदिरा गांधी सरकार के समय स्पेशल कंपोनेंट प्लान एंड ट्राइबल सबप्लान नाम की एक योजना बनाई गई थी. इसे बाद में शेड्यूल कास्ट सबप्लान एंड ट्राइबल सबप्लान (एससीएसपी एंड टीएसपी) नाम से जाना गया. इस योजना के तहत सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा उनके कुल वार्षिक बजट का एक तय हिस्सा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के विकास से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में खर्च करने के प्रावधान बनाए गए. इसे सुनिश्चित करने के लिए योजना आयोग ने भी बक़ायदा निर्देश जारी किए. इन निर्देशों को आसान भाषा में समझें तो किसी भी प्रदेश में अनुसूचित जाति या जनजाति की आबादी पांच-पांच फीसदी होने की स्थिति में उस प्रदेश के कुल बजट का पांच-पांच फीसदी हिस्सा इन दोनों तबकों के नाम पर आरक्षित रखा जाना और उसे उपयोग में लाना ज़रूरी है.

लेकिन एससीएसपी एंड टीएसपी से जुड़े योजना आयोग के निर्देश देश भर में एक तरीके से लागू नहीं किए जा सके. अलग-अलग राज्यों ने इन्हें अपने हिसाब से संशोधित कर अलग-अलग रूपों में अपनाया. एक तरफ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलांगाना जैसे राज्यों ने दलितों और आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस योजना को कानून की शक्ल दी तो दूसरी तरफ देश के कई अन्य राज्यों की तरह गुजरात ने इस दिशा में ज्यादा कुछ नहीं किया.

गुजरात में इस कानून की जरूरत पर बात करते हुए नौशाद सोलंकी राज्य के 2020-21 के बजट का उदाहरण देते हैं. वे कहते हैं, ‘इस बार गुजरात का बजट 2,17,000 करोड़ का है. निर्देशों के मुताबिक प्रदेश के दलितों को उनकी सात फीसदी आबादी के हिसाब से 15,000 करोड़ रुपए से ज्यादा राशि मिलनी चाहिए थी. लेकिन उन्हें आवंटित हुए महज (करीब) 4,500 करोड़ रुपए. इसी तरह जनजातियों को अपनी 13 फीसदी आबादी के लिहाज से तकरीबन 28,000 करोड़ रुपए से ज्यादा बजट मिलना चाहिए था. लेकिन उन्हें मिले सिर्फ 13,000 करोड़ ’. नौशाद सोलंकी के मुताबिक गुजरात में अनुसूचित जाति/जनजाति सबप्लान कानून के लागू होने के बाद पहला बड़ा फायदा यह होगा कि प्रदेश सरकार चाहकर भी इन समुदायों को मिलने वाले फंड में रत्ती भर भी कटौती नहीं कर पाएगी.

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‘पिछले दस सालों में गुजरात में करीब चालीस हजार करोड़ रुपए दलितों और तकरीबन दस लाख करोड़ रुपए आदिवासियों के नाम पर आवंटित किए जा चुके हैं. लेकिन जमीनी हक़ीकत इस बात का सबूत है कि एससी/एसटी सबप्लान कानून के अभाव में पहले से कम आवंटित हुई इस राशि का भी न के बराबर हिस्सा सीधे तौर पर इन समुदायों के विकास लिए उपयोग में लाया जाता है’ सोलंकी कहते हैं.

कानून के अभाव में दलित/आदिवासियों को कटौती के बाद मिली राशि का भी न्यायोचित इस्तेमाल नहीं होता

इस बारे में चर्चा करते हुए प्रदेश के वरिष्ठ दलित-सामाजिक कार्यकर्ता वालजी भाई पटेल का कहना है, ‘एससी-एसटी फंड का जितना दुरुपयोग पिछले कई सालों में गुजरात की सरकारों ने किया है उतना शायद ही कहीं हुआ हो.’ इसकी बानगी के तौर पर पटेल प्रदेश के सूचना एवं जनसंचार विभाग का उदाहरण देते हैं. 2015 से 2017 के बीच सूचना के अधिकार के तहत मिली विभिन्न जानकारियों के आधार पर उनका कहना है, ‘2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में मोदी जी की सक्रियता दिखाने के लिए विज्ञापनों में एससी/एसटी फंड से एक करोड़ पैंसठ लाख रुपए खर्च कर दिए गए.’ पटेल, प्रधानमंत्री मोदी के गृह जिले वड़नगर पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म के निर्माण में भी दलित-आदिवासियों के हक़ के चार लाख रुपए खर्च किए जाने का आरोप लगाते हैं.

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ऐसे कुछ और उदाहरण देते हुए वालजी पटेल हमें बताते हैं, ‘गुजरात सरकार की छवि चमकाने के लिए टीवी, अखबारों में चलाई जाने वाली विज्ञापन श्रृंखलाओं पर प्रतिवर्ष खर्च किए जाने वाले पांच करोड़ रुपए दलित और आदिवासियों के ही हिस्से के होते हैं.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘स्टेच्यू ऑफ सरदार पटेल से जुड़े विज्ञापनों को भी इसी बजट के एक करोड़ पैंतालीस लाख रुपए की बदौलत प्रसारित किया गया.’ कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि इस स्टेच्यू के निर्माण के लिए पूरे हिंदुस्तान से जो लोहा इकठ्ठा किया गया था, उसके एकत्रीकरण का ख़र्चा भी एससी/एसटी बजट से ही लिया गया था.

गुजरात के चर्चित पाटीदार आरक्षण आंदोलन की याद करते हुए वालजी पटेल कहते हैं, ‘रूठे पाटीदारों को मनाने के लिए प्रदेश की भाजपा सरकार ने करीब एक हजार करोड़ रुपए की योजनाएं बनाईं और इसके प्रचार-प्रसार के लिए छपवाए गए तीन लाख पर्चों की लागत में लगे 7,44,841 रुपए भी दलित कोष से लिए गए थे.’ आक्रोश जताते हुए पटेल कहते हैं कि सरकार की यह कारस्तानी दलितों और आदिवासियों के मुंह से उनका निवाला छीनने जैसी है.

वालजी पटेल के पास ऐसे खर्चों की एक लंबी फेहरिस्त है जिनसे दलित और आदिवासियों का सीधा सरोकार न होने के बावजूद इनमें उनके फंड का इस्तेमाल किया गया. इनमें से कुछ आंकड़े नीचे दी गई सूची में दर्ज हैं.

अलग-अलग आरटीआई के हवाले से वालजी भाई पटेल द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित

बड़ी कारस्तानियां

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गुजरात में अनुसूचित जाति और जनजाति को मिलने वाली राशि को प्रदेश सरकार किस चतुराई से दूसरे उपयोग में लेती है, दलित समुदाय से आने वाले नौशाद सोलंकी इस बारे में विस्तार से बताते हैं. सड़क और भवन निर्माण विभाग का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, ‘इस विभाग को एससी/एसटी के विकास के लिए लगभग छह सौ करोड़ रुपए मिलते हैं. लेकिन इनमें से एक भी पैसा ऐसा नहीं है जो विशुद्ध रूप से दलित या आदिवासियों के काम आया हो.’

बकौल सोलंकी, ‘यदि गुजरात के एक शहर/कस्बे/गांव में कुछ दलित या आदिवासी बसते हैं और ऐसे ही किसी दूसरे शहर/कस्बे/गांव में भी दलित या आदिवासियों की करीब उतनी ही आबादी निवास करती है तो इन दोनों शहरों/कस्बों/गांवों के बीच बनने वाली हर सड़क और पुल जैसे तमाम कार्यों को दलित-आदिवासियों के हितार्थ बताकर उनके निर्माण में इन समुदायों के बजट का इस्तेमाल कर लिया जाता है. जबकि कायदे से ये सारे काम सामान्य बजट से होने चाहिए.’

इसी तरह सोलंकी सिंचाई विभाग का भी उदहारण देते हैं. वे कहते हैं, ‘यदि किसी गांव में दो-ढाई सौ दलित या आदिवासी भी रहते हैं तो उस इलाके में नहरें और छोटे-मोटे बांध उन्हीं के फंड से बनाए जाते हैं.’ बनासकांठा जिले में बने बांध के निर्माण में दलित/आदिवासियों के एक करोड़ इक्यावन लाख रुपयों का इस्तेमाल ऐसी ही एक बानगी है.

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नौशाद सोलंकी के शब्दों में, ‘गुजरात सरकार ने पांच साल पहले प्रदेश में बीस समरस छात्रावासों की नींव रखी थी. इनमें से दस छात्रों के लिए थे और दस छात्राओं के लिए. सरकार ने प्रचार किया कि दलित और आदिवासी छात्र-छात्राओं को मुख्यधारा के तौर-तरीकों से अवगत करवाने के लिए उन्हें इन छात्रावासों में दूसरे समुदायों के बच्चों के साथ रखा जाएगा. इस दलील को आधार बनाकर इन होटलनुमा छात्रावासों के निर्माण में अनुसूचित जाति के फंड से करीब छह सौ करोड़ रुपए लिए गए. लेकिन बाद में पता चला कि इन छात्रावासों में पूरा पैसा दलितों का ही लगा होने के बावजूद यहां उनके बच्चों के लिए पंद्रह फीसदी ही सीटें आरक्षित रखी गईं जिनमें आदिवासी बच्चों का भी हिस्सा शामिल है.’

कांग्रेस के एक अन्य विधायक अनंत पटेल इस चर्चा को आगे ले जाते हैं. अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाले अनंत पटेल वासदा विधानसभा क्षेत्र से आते हैं. वे कहते हैं, ‘योजना (अब नीति) आयोग ने बहुत सोच-समझकर अनुसूचित जाति और जनजातियों के बजट को सामान्य बजट से अलग रखने के निर्देश इसलिए दिए थे ताकि इन समुदायों को मिलने वाली राशि उचित ढंग से इन्हीं के उत्थान के लिए उपयोग में लाई जा सके. लेकिन जब कोई सरकार तकरीबन इस पूरे बजट का इस्तेमाल सामान्य बजट के अधीन आने वाले उद्देश्यों में ही करने लगे तो फ़िर नीति आयोग के निर्देशों का औचित्य क्या रहेगा?’

पटेल के शब्दों में, ‘पिछले सिर्फ दस वर्षों की बात करें तो इस दौरान आवंटित हुए कई लाख करोड़ रुपयों को यदि ईमानदारी से कुछ लाख दलित/आदिवासियों के बच्चों को शिक्षित करने, रोजगार देने, उनके स्वास्थ्य पर या फिर उनके रहवास के लिए खर्च किया जाता तो क्या ये लोग आज तक पिछड़े रह पाते?’

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सत्याग्रह से हुई बातचीत में अनंत पटेल आगे जोड़ते हैं, ‘सरकार ने तमाम योजनाओं के साथ ‘अंबेडकर, वन और पर्यावरण नाम जोड़कर दलित व आदिवासियों के हिस्से की रकम को हड़पने का खास तरीका अख़्तियार कर लिया है. जैसे अस्पतालों में एक्सरे या अन्य मशीनें या फिर बेंच और वॉटर कूलर तक लगाते समय कहा जाता है कि चूंकि इनसे बीमार-परेशान दलितों और आदिवासियों को बड़ी राहत मिलती है इसलिए इन उद्देश्यों में उनके फंड का पैसा लिया जा सकता है. लेकिन यह सरासर ग़लत है. पटेल के शब्दों में ‘इस तरह की वस्तुओं या प्रोजेक्टों पर नाम अंबेडकर का होता है और विज्ञापन मोदी जी का.’

कानून का दर भी अछूता नहीं

निजी स्तर पर जुटाई गई कुछ अन्य जानकारियों के आधार पर वालजी भाई पटेल दावा करते हैं कि ‘केंद्र सरकार प्रतिवर्ष गुजरात को 2 करोड़ 55 लाख रुपए का अनुदान देती है ताकि यहां दलितों के लिए विशेष अदालतें शुरु कर उन्हें जल्द से जल्द न्याय दिलवाया जा सके. लेकिन प्रदेश में ऐसी एक भी अदालत नहीं शुरु की गई, जबकि उनके नाम पर बीते पांच वर्षों में गुजरात सरकार भी करीब 12 करोड़ रुपए अलग से आवंटित कर चुकी है.’

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‘क़ायदे से इस पूरे फंड का इस्तेमाल दलित उत्पीड़न अदालतों के लिए ज़रूरी ढांचा खड़ा करने में किया जाना चाहिए था. इसमें जजों, सरकारी वकीलों और अन्य स्टाफ की भर्ती और उनके वेतन का भी भुगतान शामिल है. लेकिन इस राशि को सामान्य अदालतों और अन्य उद्देश्यों में खर्च कर दिया गया. जबकि पिछले बीस साल से गुजरात में दलितों पर अत्याचार के 800 से ज्यादा मामले अदालतों में लंबित पड़े हैं और उनके आरोपित इत्मीनान से बाहर घूम रहे हैं.’ वालजी पटेल आगे कहते हैं. वे इस बारे में मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को भी बीती जुलाई अवगत करा चुके हैं, लेकिन अभी तक उन्हें कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

गुजरात हाईकोर्ट में अधिवक्ता और दलित कार्यकर्ता केवल सिंह राठौड़ इस मुद्दे से जुड़े कुछ और पहलुओं की तरफ़ हमारा ध्यान ले जाते हैं. वे कहते हैं, ‘नियमानुसार दलित/जनजाति उत्पीड़न के मामलों में आरोपितों को जमानत मिलने पर राज्य सरकार को उसे बड़ी अदालतों में चुनौती देनी होती है. लेकिन गुजरात सरकार ने आज तक एक भी केस में ऐसा नहीं किया है और न ही पीड़ित पक्ष को ऐसा करने लिए कोई वकील उपलब्ध कराया है. जबकि इसके लिए एससीएसपी एंड टीएसपी फंड से पैसा लिया जाता है. इसी तरह एससी-एसटी अत्याचार पीड़ितों को पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाने के नाम पर भी एक निश्चित धनराशि जारी की जाती है, लेकिन उत्पीड़न के करीब 95 फीसदी मामलों में पीड़ितों को कोई सुरक्षा नहीं मिलती.’

केवल सिंह आगे जोड़ते हैं, ‘आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए सरकार दलित-आदिवासियों के नाम पर धनराशि जारी तो कर देती है, लेकिन विभागीय दांव-पेंचों के चलते इसका बड़ा हिस्सा ख़र्च ही नहीं हो पाता और वापिस सरकार के हाथ में पहुंच जाता है जिसे वह मन-माफ़िक़ कामों में इस्तेमाल करती है. लेकिन ये आंकड़े कभी सार्वजनिक नहीं किए जाते.’

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अपनी बात के पक्ष में राठौड़ दलील देते हैं, ‘गुजरात के समाज कल्याण विभाग ने दलित खेतिहर मजदूरों को कृषि योग्य ज़मीन खरीदने के लिए दो लाख रुपए की मदद की घोषणा की है. लेकिन प्रदेश के राजस्व विभाग की गाइडलाइन है कि कृषि योग्य ज़मीन सिर्फ़ एक किसान ही खरीद सकता है (मजदूर नहीं). नतीजतन इस उद्देश्य के लिए आवटिंत हुई राशि जस की तस वापिस राजकोष में पहुंच जाती है. विदेशों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए शुरु की गई अंबेडकर छात्रवृत्ति से लेकर नए दलित-आदिवासी उद्यमियों को दिए जाने वाले ऋण तक हर जगह यही हाल है.’

‘इसे रोकने और एससीएसपी व टीएसपी फंड की निगरानी के लिए जिला स्तर पर प्रत्येक तीन महीने में और राज्य स्तर पर प्रत्येक छह महीने में कम से कम एक बार विशेष सतर्कता कमेटी की बैठक आयोजित करने के प्रावधान हैं जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री को करनी होती है. लेकिन गुजरात में बीते साढ़े तीन साल में ऐसी सिर्फ़ एक ही बैठक हो पाई है. उसमें मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी संस्थाओं और दलित-आदिवासी पीड़ितों की बजाय सिर्फ़ अपने पसंदीदा मंत्रियों को ही शामिल किया. लेकिन इसके बाद एक बार भी एससीएसपी और टीएसपी फंड के लेखा-जोखा की जांच नहीं करवाई गई. यह दलित-आदिवासियों के हक़-हुक़ूक़ के प्रति मौजूदा भाजपा सरकार की उदासीनता को दिखाता है’ राठौड़ आगे जोड़ते हैं.

गुजरात की भाजपा सरकार का इस बारे में क्या रुख़ है?

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भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से ईडर से विधायक हितु कनोडिया इस बिल की ज़रूरत को सिरे से नकार देते हैं. उनका कहना है कि ‘प्रदेश सरकार दलितों और आदिवासियों के हितों को लेकर पूरी संवेदनशील है. बिल के पक्ष में दी जा रही दलीलें और हमारी सरकार पर लगाए जा रहे सभी इल्ज़ाम बेबुनियाद हैं.’ उन से पहले प्रदेश के वन और जनजाति मंत्री गनपत बसावा और सामाजिक न्याय व सशक्तिकरण मंत्री ईश्वर परमार भी इस बारे में मीडिया को कुछ ऐसे ही बयान दे चुके हैं.

इस पर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार चंदू भाई महरिया का मानना है कि पूरे प्रदेश में बिखरे होने की वजह से दलित निर्णायक भूमिका में नहीं आ पाते हैं इसलिए सरकार को भी उनकी फ़िक्र नहीं है. वे कहते हैं, ‘उत्तरप्रदेश या पंजाब जैसे राज्यों में सरकार दलितों की तरफ से आंखें नहीं फेर सकती क्योंकि वे वहां राजनैतिक समीकरण बनाने और बिगाड़ने की स्थिति में हैं. लेकिन गुजरात में ऐसा नहीं है.’

गुजरात लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य मूलचंद राणा, महरिया से सहमति जताते हैं. वे कहते हैं, ‘प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री विजय रूपाणी निजी बातचीतों में कई बार यह इशारा दे चुके हैं कि सात प्रतिशत दलितों के साथ होने या न होने से सूबे में भारतीय जनता पार्टी को कुछ खास फ़र्क नहीं पड़ता.’ मूलचंद राणा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के समरसता मंच की प्रदेश इकाई में भी लंबे समय तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.

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गुजरात सरकार से यह कानून बनाने की सिफ़ारिश पहले भी की जा चुकी है

मूलचंद राणा बताते हैं, ‘वर्ष 2016 में हमने भी गुजरात में एससी/एसटी सबप्लान कानून को लागू कराने के लिए आरएसएस की तरफ से मुख्यमंत्री विजय भाई रूपाणी से मुलाकात की थी. लेकिन उन्होंने दो टूक कह दिया कि जिन राज्यों में यह कानून लागू हुआ वहां भाजपा की सरकार नहीं थी, इसलिए हम इसे गुजरात में लागू नहीं कर सकते.’ बकौल राणा उन्होंने सरकार को चेतावनी भी दी कि यदि यह कानून नहीं बनाया गया तो वे नागपुर से लेकर दिल्ली तक आंदोलन करेंगे, लेकिन तब भी उसके कान पर जूं नहीं रेंगी. गुजरात में दलितों के प्रति भाजपा सरकार की बेरुख़ी से आक्रोशित राणा ने जीवन के 48 वर्ष आरएसएस को देने के बाद उससे नाता तोड़ दिया.

इसी तरह भारत सरकार के पूर्व सचिव रह चुके पीएस कृष्णन बताते हैं कि देश के अन्य राज्यों की तरह उन्होंने गुजरात सरकार से भी सिफारिश की थी कि वहां इस दिशा में उचित कानून बनाया जाए ताकि दलित और आदिवासियों के जीवन स्तर को सुधारने में मदद मिले. लेकिन वहां से सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिला. इसके लिए कृष्णन ने एक ड्राफ्ट भी तैयार कर प्रदेश सरकार को सौंपा था जिस पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली. बता दें कि रिपोर्ट में ऊपर जिस स्पेशल कंपोनेंट प्लान एंड ट्राइबल सबप्लान (1980) का जिक्र किया गया है उसका ड्राफ्ट 1978 में कृष्णन ने ही तैयार किया था. कृष्णन कहते हैं कि सरकारों ने नीति आयोग के निर्देशों को सिर्फ आंकड़ों का खेल बनाकर रख दिया है और कुछ नहीं.

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आगे क्या?

इस बारे में चर्चा करने पर नौशाद सोलंकी हमें बताते हैं कि इस बिल को मंजूरी दिलवाने के लिए वे प्रदेश भर के दलित और आदिवासियों से मुलाकात कर एक व्यापक अभियान चला रहे हैं. बकौल सोलंकी, ‘सरकार चाहती है कि अभावों से तंग आकर दलित सड़कों पर उतरकर हिंसा करे ताकि सवर्ण वोट बैंक का ध्रुवीकरण किया जा सके. लेकिन हम ऐसा नहीं होने दे सकते. हमारा मकसद लोगों को जागरुक करना है. लेकिन सरकार ने हमारी बातें नहीं मानीं तो हम एक प्रदेशव्यापी मुहिम छेड़ेंगे.’

कुछ ऐसी ही बात अनंत पटेल भी दोहराते हैं. वे कहते हैं कि ‘हम गांव-गांव जाकर लोगों को भाजपा सरकार का असली चेहरा उजागर करेंगे और दलित व आदिवासियों को उनका हक़ दिलवाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे. अगर इसके लिए हमें एक बड़ा आंदोलन भी छेड़ने की ज़रूरत पड़ी तो हम पीछे नहीं हटेंगे.’

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इस पूरे घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार बसंत रावत अपनी राय रखते हैं, ‘2017 के विधानसभा चुनावों के बाद गुजरात में कांग्रेस मानो पूरे परिदृश्य से गायब हो गई थी. लेकिन अब पार्टी में कुछ लोग सक्रिय दिख रहे हैं. बीते कुछ सालों में कई आंदोलनों को देख चुके गुजरात में यदि कांग्रेस मुसलमानों के साथ दलितों और जनजातियों को एक जाजम पर लाने में कामयाब हो पाई तो ये मुद्दा भारतीय जनता पार्टी को परेशान कर सकता है. बशर्ते इस बार गुजरात कांग्रेस अपनी अंदरूनी खींचतान को भूलकर सही मायने में विपक्ष की भूमिका निभाए!’

हालांकि इस रिपोर्ट के लिखे जाने के वक्त पूरे देश में लॉकडाउन लग गया है और फिलहाल इस मामले में गुजरात की विजय रूपाणी सरकार को राहत मिल गई है. अब देखना यह है कि 21 दिनों का यह लॉकडाउन जब 15 अप्रैल को खत्म होगा तब तक इस आंदोलन को लेकर इसके नेताओं में कितना उत्साह बचा रहता है. क्योंकि कोरोना वायरस ने जिस तरह की परिस्थितियां उत्पन्न कर दी हैं उसे देखते हुए ऐसा करना आसान नहीं होगा. इसके अलावा जिस तरह से कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ रही है उसमें यह भी तय नहीं है कि 15 अप्रैल को लॉकडाउन खत्म हो ही जाएगा.