अपने बेहतरीन प्रबंधन के चलते बहुत हद तक कोरोना संक्रमण पर क़ाबू पाने में सफल रहा केरल इस महामारी की वजह से पैदा हुई एक अजीब चुनौती से जूझ रहा है. देश में सबसे पहले कोरोना वायरस ने केरल में ही दस्तक दी थी. और कुछ समय पहले तक वह इसका सबसे बड़ा शिकार भी था. राज्य सरकार की कोशिशों के चलते अब वह इस मामले में छठे नंबर पर आ गया है. यहां पर अजीब बात यह है कि इस बीमारी की वजह से तो अब तक केरल में केवल दो लोगों की ही जान गई है, लेकिन बीते सात-आठ दिनों में यहां सात लोगों ने सिर्फ़ इसलिए ख़ुदकुशी कर ली क्योंकि लॉकडाउन के चलते उन्हें शराब नहीं मिल पा रही थी. इनके अलावा केरल में एक व्यक्ति की मौत इसलिए भी हो गई क्योंकि शराब की तलब लगने पर वह आफ्टरशेव लोशन पी गया था. वहीं, राज्य में एक अन्य व्यक्ति को शराबबंदी से कथित तौर पर ऐसा सदमा पहुंचा कि उसे हार्टअटैक आ गया और उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.
क्या केरल सरकार को इस बात का अंदेशा था?
अधिकतर जानकार इस सवाल का जवाब ‘हां’ में देते हैं. शायद यही कारण था कि 23 मार्च को केरल में लॉकडाउन लागू करते समय पिनरायी विजयन सरकार ने शराब के आउटलेट खुले रखने का निर्णय लिया था. अपने इस फैसले की वजह से मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन को जबरदस्त आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. तब आशंका जताई जा रही थी कि शराब की दुकानों पर उमड़ने वाली भीड़ राज्य में कोरोना संक्रमण की बड़ी वजह बन सकती है.
अपने बचाव में पिनरायी विजयन की दलील थी कि केरल में पूर्ण शराबबंदी कर देने के बड़े सामाजिक दुष्परिणाम झेलने पड़ेंगे, जिनसे इस आपदा के समय में निपटना मुश्किल होगा. अपनी बात के पक्ष में उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के ट्वीट का भी हवाला दिया जिसमें सिंह ने लॉकडाउन के दौरान शराब की दुकानों को आवश्यक सेवाओं में शामिल माना था. लेकिन बाद में राष्ट्रीय लॉकडाउन के बाद केरल में शराब की दुकानों को बंद करना पड़ा था.
इसके बाद केरल में कुछ वैसे ही हालात पैदा हो गए हैं जिनका पिनरायी विजयन सरकार को डर था. यहां कोरोना के चलते जबरदस्त दवाब झेल रहे अस्पतालों में ऐसे सैंकड़ों लोग इलाज के लिए पहुंचने लगे जो अल्कोहल न मिलने से भारी तनाव में आ गए थे. केरल में नशे की लत छुड़वाने के लिए आबकारी विभाग ‘विमुक्ति’ नाम का एक कार्यक्रम चलाता है. स्थानीय जानकार बताते हैं कि लॉकडाउन के बाद से इसके फोन नंबरों पर कॉलों की बाढ़ सी आ गई है. यही नहीं, राष्ट्रीय लॉकडाउन के बाद केरल में कई सौ लोगों के अलग-अलग व्यसन मुक्ति केंद्रों पर भर्ती होने की भी सूचना है.
ग़ौरतलब है कि केरल भारत में सबसे ज्यादा शराब की खपत वाले राज्यों में शुमार है. अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य में इस समय करीब 16 लाख लोग शराब पीने के आदी हैं. आंकड़े ये भी बताते हैं कि साल 2014 तक केरल औसतन 8.3 लीटर प्रतिव्यक्ति/प्रतिवर्ष के आंकड़े के साथ मदिरा सेवन के मामले में भारत में शीर्ष पर था.
संभ्रांत छवि वाले केरल वासियों के लिए शराबबंदी से निपटना इतनी मुश्किल क्यों साबित हो रहा है?
केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम से ताल्लुक रखने वाले मनोविकार विज्ञानी डॉक्टर अरुण बी नायर इसके कारणों की तफ़सील से चर्चा करते हैं. वे हमें बताते हैं, ‘प्राकृतिक रूप से केरल हमेशा से समृद्ध रहा है, इसलिए यहां के निवासियों को उस गुरबत का सामना कभी नहीं करना पड़ा जिससे भारत के बाकी हिस्से जूझते रहे हैं. नतीजतन हमारी दवाब और तनाव झेलने की शक्ति भी अपेक्षाकृत घटती चली गई. यही कारण है कि छोटी-छोटी चुनौतियों का सामना करते समय हममें से कइयों के हाथ-पैर फूलने लगते हैं. उस पर यदि शराब जैसे व्यसन के आदी व्यक्ति को नशा न मिले तो स्थिति गंभीर होनी ही है.’
डॉक्टर नायर आगे जोड़ते हैं, ‘केरल के लोगों ने पाश्चत्य जीवनशैली के जिन अंशों को आत्मसात किया उनमें निजता का अधिकार और बेरोक-टोक वाला जीवन प्रमुख था. लेकिन हम पश्चिमी लोगों के आत्म-अनुशासन जैसे सकारात्मक पहलू को ग्रहण कर पाने में नाकाम रहे. इस बात का खामियाजा हमें समय-समय पर अलग-अलग रूपों में उठाना पड़ता है.’
मूलत: केरल से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय (जयपुर) के पूर्व कुलपति सनी सेबस्टियन भी नायर की बातों से सहमति जताते हुए इस मामले से जुड़े कुछ और पहलुओं की तरफ़ हमारा ध्यान ले जाते हैं. वे कहते हैं, ‘दूसरे राज्यों में शराबबंदी होने पर वहां अवैध रुप से शराब मिलने की संभवना बनी रहती हैं. लेकिन बेहद सख़्त कानून-व्यवस्था के चलते केरल में ऐसा अपेक्षाकृत बहुत कम होता है. वहां जो लोग नशे के आदी हैं वे भी इस बात को बख़ूबी जानते हैं, इसलिए उनकी बैचेनी कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है.’ कई मीडिया रिपोर्ट सनी सेबस्टियन की बात को बल देती हैं. इनमें से एक के मुताबिक बीती 25 मार्च से लेकर अब तक केरल में दस हजार लीटर अवैध शराब जब्त की जा चुकी है.
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सेबस्टियन कहते हैं, ‘सामुहिक चेतना को प्रभावित करने वाली किसी घटना की प्रतिक्रिया में यदि कोई एक भी व्यक्ति आत्महत्या कर ले तो अक्सर ऐसे कई वाक़ये लगातार सामने आने लगते हैं. यह एक तरह का पैटर्न है. इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है.’
केरल सरकार शराब बिक्री को इसलिए भी नहीं रोकना चाहती
विश्लेषकों के मुताबिक केरल में पूर्ण शराबबंदी पर सरकार की फ़िक्र राजस्व में होने वाले घाटे से भी जुड़ती है. डगमग होती अर्थव्यवस्था और नोटबंदी व जीएसटी के बाद से कमज़ोर हो चुकी व्यवसायिक गतिविधियों के बीच शराब की बिक्री केरल सरकार को बड़ा आर्थिक सहारा देती है. साल 2018-19 में केरल में 14,508 करोड़ रुपये की शराब बिकी थी. इसकी मदद से राज्य सरकार को 2,521 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था.
इसके अलावा केरल की मौजूदा लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सरकार के लिए राज्य में शराब की सुलभ बिक्री एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रही है. ग़ौरतलब है कि केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सरकार ने 2014 में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी थी. लेकिन 2016 में सत्ता में आने के बाद से ही एलडीएफ ने शराब की बिक्री पर लगी पाबंदियों को हटाने की दिशा में काम शुरु कर दिया. इस रणनीति के पीछे यह बड़ा तर्क था कि अल्कोहल की सहज उपलब्धता से मलयालियों के ड्रग्स के प्रति बढ़ रहे झुकाव में कमी आएगी.
मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाया?
केरल में अल्कोहल विड्रॉल सिंप्टम्प्स (एडब्ल्यूएस) से जूझ रहे लोगों की परेशानियों को देखते हुए प्रदेश सरकार ने कुछ अहम उपाय किए हैं: राज्य में स्वास्थ्य विभाग द्वारा संचालित मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत ऐसे लोगों की काउंसलिग शुरु करा दी गई है; यहां के प्राथमिक और पारिवारिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी और एफएचसी) पर भी एडब्ल्यूएस वाले मरीजों की काउंसलिंग के साथ उनके इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है; और केरल के सभी 14 ज़िलों के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में 20-20 बेड एडब्ल्यूएस मरीज़ों के लिए आरक्षित रखने के भी निर्देश दिए जा चुके हैं.
यही नहीं, इससे एक कदम आगे जाते हुए केरल सरकार ने एक और विशेष आदेश दिया है - अल्कोहल विड्रॉल सिंप्टम्प्स से ग्रस्त लोग अपनी बीमारी की पुष्टि किसी भी सरकारी डॉक्टर से करा सकते हैं. इस आधार पर उन लोगों को सरकारी अस्पतालों या मेडिकल कॉलेजों से विशेष कूपन/पास दिए जाएंगे जो आबकारी विभाग को जमा कराने होंगे. फ़िर वहां से संबंधित व्यक्तियों को शराब उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है. यह कुछ वैसा ही है जैसे कि पूर्ण शराबबंदी वाले गुजरात में आबकारी विभाग द्वारा ज़रूरतमंद मरीजों को विशेष हेल्थ परमिट जारी किए जाते हैं जिनके आधार पर राज्य सरकार द्वारा प्रमाणित दुकानों से शराब ख़रीदी जा सकती है.
क्या यह उपाय कारगर रहा?
गुजरात से उलट केरल में पिनरायी विजयन सरकार को इस फैसले लिए वैसी ही आलोचनाओं का सामना करना पड़ा जैसी कि उसे लॉकडाउन के दौरान शराब की दुकानें खुली रखने के लिए झेलनी पड़ी थीं. केरल गवर्नमेंट मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन (केजीएमओए) सरकार के इस क़दम के खुलकर विरोध में आ गई. उसने राज्य सरकार के इस फैसले को अनैतिक और चिकित्सकीय पेशे के नियमों के विरुद्ध बताया. इसी तर्ज़ पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने भी केरल सरकार की मुख़ालफ़त शुरु कर दी.
इस बारे में डॉक्टर अरुण नायर कहते हैं कि ‘मेडिकल काउंसिल के दिशा-निर्देशों के अनुसार शराब को दवाई के तौर पर इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है. फ़िर, लिकर कूपन पाने के लिए प्रभावशाली लोग डॉक्टरों पर हरसंभव दवाब बनाने लगे. विजयन सरकार का यह फैसला न सिर्फ़ भ्रष्टाचार और असमानता बढ़ाने लगा बल्कि डॉक्टरों के लिए नया सिरदर्द भी बन गया.’ नायर आगे जोड़ते हैं, ‘इसकी बजाय केरल सरकार को व्यसन मुक्ति केंद्रों और उनकी व्यवस्थाओं को सुचारू रखते हुए उनके अधिकतम उपयोग की दिशा में काम करना चाहिए जो निश्चित तौर पर ज्यादा फायदेमंद साबित होगा.’
हालांकि कुछ जानकार ऐसे भी हैं जो विजयन सरकार के इस फैसले पर मिला-जुला रुख रखते हैं. त्रिचूर सरकारी मेडिकल कॉलेज में कार्यरत असिसटेंट प्रोफेसर और मनोविज्ञानी सेबिंद कुमार भी इनमें शामिल हैं. हमसे हुई चर्चा में डॉक्टर कुमार कहते हैं, ‘अलग-अलग अध्ययन के अनुसार अल्कोहल की लत वाले लोगों में से 5-10 प्रतिशत की स्थिति गंभीर हो जाती है. इस हिसाब से केरल में इस वजह से कई सौ लोगों की जान पर संकट आ सकता है. इसके अलावा अल्कोहल विड्रॉल सिंप्टम्प्स वाला मरीज़ ख़ुद तो अस्पताल जाने लायक स्थिति में ही नहीं रहता है. कम से कम चार या पांच लोगों को उसे लेकर जाना पड़ता है. क्या इस स्थिति में कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका नहीं बनेगी? फ़िर इस समय आवागमन के साधन भी उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में किसी के लिए स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों तक पहुंच पाना ही एक बड़ी चुनौती है.’
डॉक्टर कुमार आगे जोड़ते हैं, ‘सरकारी आदेश में कहीं भी स्पष्ट तौर पर नहीं लिखा है कि डॉक्टरों को अल्कोहल प्रेस्क्राइब करना होगा. उन्हें तो बस एडब्ल्यूएस की पुष्टि करनी है. एक डॉक्टर अपने पास आने वाले मरीज़ की जांच करने के लिए बाध्य है. उसके बाद डॉक्टर के लिखे पर्चे का क्या उपयोग होना चाहिए और क्या नहीं, यह लंबी बहस का विषय है.’ बकौल कुमार, ‘लेकिन डॉक्टरों का इस्तेमाल कर अल्कोहल सेवन को बढ़ावा देना भी सही नहीं ठहराया जा सकता है. इसके लिए सरकार को उचित और सुलझी हुई नीतियां बनाने की ज़रूरत है. लेकिन वे नीतियां क्या होनी चाहिएं, ये बताने के लिए डॉक्टर न तो अधिकृत हैं और न ही उतने विशेषज्ञ.’
बहरहाल, त्रिचूर से कांग्रेस सांसद टी एन प्रतापन, केजीएमओए और आईएमए की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केरल हाईकोर्ट ने विजयन सरकार के इस फैसले पर कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की है और फिलहाल इस पर रोक लगा दी है.
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