बेहद लंबे, बोझिल और उदासी भरे दिन, उससे भी ज्यादा लंबी-उदास रातें काटना भीगी लकड़ी जलने जैसा हो गया है. करने को कोई काम नहीं बचा. एक हद से ज्यादा कहीं आना-जाना नहीं. पास-पड़ोस के अलावा किसी से मुलाकात नहीं. कोई नई जैसी लगने वाली बात सुनने को नहीं मिल रही. वर्षों से आस-पास के वही देखे-जाने चेहरे और उनकी आवाजें.

हर सुबह वही सदियों पुराना सूरज निकलता है और शाम होते-होते ढल जाता है. आंगन में हर रोज वही मटमैल रंग की घिनौड़ी चिड़ियों को झुंड आकर शोर मचाता हुआ फुदकता है. गुलाब के पौधों में रोज का एक-सा गुलाबी फूल खिलता है. पड़ोस की छत पर आकर बैठने वाले कबूतर गूटर-गूं के अलावा कुछ और नहीं बोलते. दूध वाला भी रोज वही सफेद रंग का दूध लिए चला आता है. लोग एक-सी बातें हर रोज करते हैं. टीवी-अखबार हर दिन लगातार बासी कढ़ी को उबाल रहे हैं.

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घड़ियां इतनी मंथर गति से नहीं चला करती थीं इससे पहले कभी हमारी याद्दाश्त में. वक्त के घुटनों को गठिए ने जकड़ लिया जाना पड़ता है कि चल ही नहीं पा रहा अपनी स्वाभाविक चाल से. लगता है जैसे सिविल का कोई मुकदमा चल रहा है या आदमी किसी अंतहीन सुरंग में आ फंसा है.

आजकल पिछले कई दिनों से ज्यादातर लोगों का तकरीबन यही मामूल है. हमारे लिए यह दिनचर्या एकदम नई है. हमें इसकी आदत नहीं थी, क्योंकि डल झील और सूखे चिनार हर जगह नहीं हुआ करते न. इस महामारी ने हमें हाउसअरेस्ट का अनुभव बिना किसी मेहनत के करवा दिया.

अब सर पर क्योंकि बंदूक नहीं तनी है, छिट-पुट पुलिस का डंडा मात्र है, और ज्यादातर लोगों के पास बाकी देश-दुनिया का हाल जानने के लिए टीवी और नेट की सहूलियत है तो समय इतना भी अझेल नहीं जितना कई बार खाली बैठे-बैठे महसूस होता है. फिर भी कई लोग घुटन, बेचैनी, अनिद्रा और अवसाद की शिकायत धीरे-धीरे करने लगे हैं.

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यह फुर्सतों का मौसम है और अभूतपूर्व है. किसी चीज का बिल्कुल न होना और इफरात में होना एक बिंदु पर जाकर तकरीबन एक-सा हो जाता है. इन दोनों के बीच बस एक झीना-सा पर्दा ही होता है. आदमी इतनी फुर्सत में है कि उसे समझ नहीं आ रहा करे क्या. या अब और क्या करे. करने को बचा क्या. पकाने वाले पका कर और खाने वाले खा-खाकर उकता चुके हैं. कोई नई रेसिपी बची ही नहीं. टीवी, मोबाइल, फिल्में, नींद...हर चीज से आदमी उकता चुका है. खुद से भी.

समाचार चैनलों की सुई महामारी पर अटक गई है. उन्हें बैठे-ठाले एक काम मिल गया है. बिना हींग-फिटकरी के उनका काम मजे से चल रहा है. महामारी के अलावा देश-दुनिया में सब चंगा है. अमन है. चैन है. न कोई भूखा है, न प्यासा. सब खुश हैं, सब राजी हैं. इन दिनों टीवी को म्यूट करके भी खबरें सुनी जा सकती हैं. समाचार वाचकों में तो जैसे चीखने का कंपटीशन चल रहा है, चीख कर बोलना आज की तारीख में ठोस दलील सरीखा दर्जा पा चुका है. चीखता हुआ एंकर अपने घरों से दूर पड़े हुए, कुछ लोगों को फंसा हुआ और कुछों को छिपा हुआ कह कर संबोधित कर रहा है. इस शब्दावली को लगातार दोहराए जाने का नतीजा ये हुआ है कि आम आदमी बिना हीला-हवाली के इसे सच मान चुका है और खुद भी यही भाषा बोलने लगा है. लेकिन हर संतुलित दिमाग का आदमी इस चलन से फिक्रमंद है और भविष्य की सोच कर डरा हुआ है.

जैसा कि बताया गया, चीन में जन्म लेने के बाद कोरोना वायरस विश्वभ्रमण पर निकला. इसे देर-सबेर भारत की पुण्यभूमि में भी आना ही था. सो यह सारे सजग पहरेदारों-चौकीदारों को चकमा देकर आ गया. यहां आए बिना वैसे भी किसी का काम चलता नहीं, दुनियाभर के ताकतवर देशों के राष्ट्रध्यक्ष भी तो समय-समय पर यहां आते रहते हैं. वे इसलिए नहीं आते कि उन्हें हमसे या हमारे मुल्क से कोई भारी मोहब्बत है. तभी तो यहां आने से पहले वे ‘नमश्टे’ कहने का कितना रियाज किया करते हैं. वे क्यों आते हैं, यह बताने में ऊर्जा खर्च करने का कोई मतलब ही नहीं है. खैर, फिर यह तो महामारी है. महामारियों के पास ऐसा कुछ होता नहीं कि जिसे देने का दिखावा भी किया जा सके. आपदाएं-महामारियां मनुष्य का काफी कुछ छीनकर ले जाती हैं. कल हम न जाने किन-किन चीजों से महरूम होंगे जिनके बारे में आज ठीक कुछ कह पाना कठिन है.

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आए दिन देखने में आ रहा है कि सामर्थ्यवान लोगों में ‘जरूरी’ सामान इकट्ठा करने का खब्त-सा पैदा हो गया है. वहीं, रोज कमाकर पेट भरने वालों खासकर प्रवासी मजदूरों के सामने विकट समस्या है. यह कई लोगों के लिए भुखमरी के आगमन की पदचाप हो सकती है. बीच-बीच में आने वाली कुछ खबरें यह भी बताती हैं कि कई लोगों को खाना नहीं मिल रहा या एक वक्त खाकर गुजर हो रही है. ऐसे में कई भले लोग व संस्थाएं लोगों की मदद कर रहे हैं. कुछ और हैं जो फोटो खिंचवा रहे हैं. उनकी फोटो में देखकर पता करना लगभग नामुमकिन हो रहा है कि इस भीड़ में अनाज की पोटली का दाता कौन है और पाता कौन. जानकार लोगों की यह आशंका है कि आने वाले दिन और कठिन हो सकते हैं. यह झूठी साबित हो, बस यही कामना सबकी होनी चाहिए.

फिलहाल, जिनके पेट भरे हैं और निकट भविष्य में भी उन्हें भूख व अभाव का डर नहीं सता रहा है. उनमें से अधिकांश लोगों को लगता है कि तकरीबन सभी का गुजारा हो ही रहा है, किसी का कम अच्छा तो किसी का ज्यादा अच्छा. वे मानते हैं कि कुल मिलाकर काम तो सभी का चल रहा है. मगर कुल तस्वीर ऐसी ही है, ऐसा नहीं कहा जा सकता है. और फिर, पूरी तस्वीर दिखाने वाला कोई बचा भी तो नहीं. लेकिन सबकुछ इतना संतोषजनक तो नहीं ही है.

कई बार कुप्रबंधन और चीजों की किल्लत की भी सूचनाएं मिलती हैं. अपनी इस मान्यता को कई साल बाद फिर से दोहराने का लोभ नहीं छूट रहा कि हमें आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण शराब व्यवसाइयों और तस्करों से लेना चाहिए. ऐसे में जबकि सब धंधे और आवाजाही ठप है. बहुतों को ‘आवश्यक राहत सामग्री’ ऊंची कीमत पर ही सही फिलहाल उपलब्ध हो रही है. मगर ध्यान रहे यहां भी सभी का हर दिन चंगा नहीं है न जाने कितने लोग मन मार कर बैठे हैं. मधुशाला भी अब मेल नहीं बैर करवाने की राह चल पड़ी है.