इस सदी का शुरुआती दशक खत्म होने को था कि गुजरात मॉडल नाम का एक शब्द चर्चा में आया. नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे. गुजरात मॉडल की चर्चा इसलिए होने लगी थी कि वे अक्सर इसकी बात करने लगे थे. लेकिन अपने नाम के आगे प्रशंसा की तरह मॉडल शब्द लगाने वाला गुजरात भारत का पहला राज्य नहीं था. ऐसा पहला राज्य था केरल.

केरल मॉडल की पहले-पहल चर्चा 1970 के दशक में हुए एक अध्ययन के बाद हुई थी. यह अध्ययन तिरुवनंतपुरम स्थित सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के अर्थशास्त्रियों ने किया था. इसमें बताया गया कि आबादी, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े कई पैमानों पर एक गरीब देश का यह छोटा सा राज्य बड़े-बड़ों को पछाड़ता है. जनसंख्या वृद्धि, महिलाओं की शिक्षा और नवजात मृत्यु दर जैसे मानकों पर केरल कभी-कभी तो यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कुछ इलाकों को भी मात दे रहा था.

अर्थशास्त्रियों और जनसांख्यिकी विशेषज्ञों ने केरल की तारीफ की. जल्द ही समाज और राजनीति शास्त्री भी इस गाड़ी में सवार हो गए. दोनों ने इसके अपने-अपने कारण बताए. पहले वर्ग का तर्क था कि 20वीं सदी के दौरान केरल में जाति और वर्ग की दीवारें काफी तेजी से टूटी थीं. दूसरे वर्ग ने कहा कि संविधान के 73 और 74वें संशोधनों को लागू करने में केरल बाकी राज्यों से आगे रहा और यहां नगर पालिकाओं और पंचायतों को भारत में बाकी जगहों के मुकाबले ज्यादा ताकत दी गई.

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जॉन एफ कैनेडी के मशहूर शब्द हैं कि सफलता के कई पिता होते हैं और असफलता अनाथ होती है. तो जब केरल की ये उपलब्धियां चर्चित हुईं तो सब इसका श्रेय लेने की होड़ करने लगे. राज्य की सत्ता में लंबे समय तक रहे कम्युनिस्टों ने कहा कि यह बदलाव उनकी क्रांतिकारी आर्थिक नीतियों की बदौलत हुआ. उधर, महान समाज सुधारक श्री नारायण गुरु (1855-1928) के अनुयायियों का दावा था कि यह उनके गुरु की समतावादी शिक्षाओं का नतीजा है. केरल में तब तक त्रावणकोर और कोचीन राजघराने के भी कई वफादार बचे थे. उनका कहना था कि शिक्षा और वह भी खासकर लड़कियों की शिक्षा के मामले में उनके शासकों की सोच बाकी भारत के महाराजाओं या नवाबों की तुलना में कहीं प्रगतिशील थी. केरल के ईसाई समुदाय ने भी इसका श्रेय लेने की कोशिश की जिसका कहना था कि राज्य में सबसे अच्छे स्कूल, कॉलेज और अस्पताल चर्च चला रहा है.

चर्चित ऑस्ट्रेलियाई इतिहासकार रॉबिन जेफरी ने इन दावों की समीक्षा की. केरल और भारत पर अपने काम के लिए मशहूर रॉबिन ने बताया कि केरल के शानदार प्रदर्शन में इन सभी समूहों का क्या और कितना योगदान है. ‘पॉलिटिक्स, विमन और वैलबीइंग’ नाम की उनकी किताब इस विषय का प्रामाणिक दस्तावेज मानी जाती है.

यह था केरल मॉडल. अब सवाल उठता है कि 2007 में जिस गुजरात मॉडल की चर्चा नरेंद्र मोदी ने शुरू की थी उसमें क्या था. इसके बारे में नरेंद्र मोदी ने खुद भी कभी बहुत स्पष्ट रूप से नहीं बताया. लेकिन ऐसा लगता है कि इस शब्द के पीछे की प्रेरणा वह था जो इससे पहले हुआ था. नरेंद्र मोदी कहते थे कि गुजरात मॉडल केरल मॉडल से अलग और बेहतर होगा. केरल मॉडल की जो कमियां दिखती थीं उनमें एक यह भी थी कि राज्य ने निजी पूंजी को प्रोत्साहित नहीं किया. असल में मार्क्सवादी विचारधारा और ट्रेड यूनियन वाली राजनीति इसकी राह में बाधा थी. दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी वाइब्रेंट गुजरात नाम का जो आयोजन किया करते थे उसका स्पष्ट मकसद निजी निवेश को आकर्षित करना था.

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नरेंद्र मोदी के समर्थकों के लिए गुजरात मॉडल की सबसे आकर्षक बात यही थी - निजी पूंजी का खुले हाथों से स्वागत. इसी बात ने बड़े और छोटे, दोनों कारोबारियों को तब उनके पक्ष में लामबंद किया जब उन्होंने खुद को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया. भ्रष्टाचार और कुछ चुनिंदा लोगों पर कृपादृष्टि की यूपीए दौर की संस्कृति से तंग आए युवा पेशेवर भी उनके समर्थन में आए. इन सभी ने नरेंद्र मोदी को आधुनिकता के एक ऐसे मसीहा के तौर पर देखा जो भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने वाला था. इन समूहों और दूसरे कई वर्गों के समर्थन से नरेंद्र मोदी मई 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बन गए.

गुजरात मॉडल के कुछ दूसरे पहलू भी थे. नरेंद्र मोदी इनकी बात नहीं करते थे, लेकिन जो गुजरात को भारतीय उद्योग जगत के दिग्गजों से बेहतर जानते थे, उन्हें इनके बारे में पता था. अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के साथ दोयम दर्ज का व्यवहार, सारी ताकत मुख्यमंत्री के हाथ में सिमटना, व्यक्तिकेंद्रित संस्कृति (पर्सनैलिटी कल्ट) का निर्माण, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और आजादी पर हमला और मीडिया की स्वतंत्रता पर पाबंदियां इनमें शामिल हैं. आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों के लिए बदले की भावना भी.

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के लिए अभियान में गुजरात मॉडल के ये स्याह पहलू दबा दिए गए थे. लेकिन केंद्र में उनकी सत्ता के छह साल बाद ये अब साफ-साफ दिखने लगे हैं. राजनीति और लोकचर्चाओं का सांप्रदायीकरण, संस्थाओं पर कब्जा, प्रेस को डराना, विरोधियों को परेशान करने के लिए पुलिस और जांच एजेंसियों का इस्तेमाल और शायद सबसे ज्यादा पार्टी, कैबिनेट, सरकार और गोदी मीडिया द्वारा एक नेता को देवता बना दिया जाना - ये सब बातें नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की विशेषताएं रही हैं.

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इस बीच, 2014 से पहले गुजरात मॉडल के जिस सकारात्मक पक्ष का सबसे ज्यादा प्रचार हुआ था वह उलटा निकला है. नरेंद्र मोदी का जिस तरह का कार्यकाल अब तक रहा है उसमें वे आर्थिक मोर्चे पर मुक्त बाजार से कहीं ज्यादा सब कुछ अपने हाथ में रखने वाली विचारधारा के पैरोकार दिखते हैं. जैसा कि कभी उनके उत्साही समर्थक रहे एक इनवेस्टमेंट बैंकर ने हाल में मुझसे कहा, ‘नरेंद्र मोदी हमारे अब तक के सबसे बड़े लेफ्ट विंग पीएम निकले हैं. वे तो जवाहरलाल नेहरू से भी ज्यादा लेफ्ट विंग पीएम हैं.’

यह बात मुझे एक बार फिर केरल मॉडल की तरफ लाती है जिसकी जगह गुजरात मॉडल लेना चाहता था या जिसे वह उखाड़ना चाहता था. 80 और 90 के दशक में केरल मॉडल की खूब चर्चा हुई थी, लेकिन हाल के वर्षों में नीतिगत चर्चाओं के दौरान यह ज्यादा नहीं सुनाई देता. शायद यह इतिहास के कूड़ेदान में फेंका जा चुका था. लेकिन कोविड-19 ने इसे बचा लिया है और यह चर्चा में लौट आया है. कोरोना वायरस से पैदा हुए इस संकट का केरल ने जिस तरह सामना किया है और जिस तरह उसने इस पर लगाम लगाई है, उसने दुनिया को दिखा दिया है कि यह भारत ही नहीं शायद दुनिया के लिए भी एक मॉडल है.

केरल ने जिस तरह से कोरोना वायरस के ग्राफ को सपाट किया है उसकी चर्चा कुछ शानदार रिपोर्टों में हुई है. ऐसा लगता है कि इस सफलता में राज्य की गहरी ऐतिहासिक विरासत का हाथ है. केरल के लोगों की शिक्षा का स्तर बाकी जगहों से बेहतर है इसलिए उन्होंने अपने रोजमर्रा के जीवन में वे आदतें आसानी से अपना लीें जिनसे इस वायरस का सामुदायिक संक्रमण कम से कम हो सके. केरल का स्वास्थ्य तंत्र इतना बेहतर है कि कोरोना वायरस के मरीज सामने आने पर उनका इलाज भी फटाफट और अच्छे से हो रहा है. केरल में जाति और लिंगभेद की जकड़बंदी बाकी राज्यों के मुकाबले उतनी कठोर नहीं है, तो स्वास्थ्य सुविधाओं और मेडिकल जानकारी तक पहुंच बाकी जगहों जितनी मुश्किल नहीं है. केरल की शासन व्यवस्था में विकेंद्रीकरण गहरे तक बैठा हुआ है इसलिए पंचायत प्रमुखों को जरूरी कार्रवाई के लिए किसी बिग बॉस के इशारे का इंतजार नहीं करना पड़ता.

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केरल की राजनीतिक संस्कृति की दो और भी विशेषताएं हैं जिनकी बदौलत वह मौजूदा संकट से प्रभावी तरीके से निपट पा रहा है. पहली यह कि यहां के शीर्ष नेताओं में वैसा दिखावा या घमंड नहीं है जैसा दूसरी जगहों पर देखने को मिलता है. दूसरी बात यह है कि संकट के समय दलगत भावना से ऊपर उठकर और एकजुट होकर काम करने का भाव भी यहां के राजनेताओं में ज्यादा है.

इसका मतलब यह नहीं कि केरल एक आदर्श राज्य है. यह सच है कि वहां कई दशकों से बड़े सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए हैं, लेकिन यह भी सच है कि रोजमर्रा के जीवन को देखें तो हिंदू, ईसाई और मुसलमानों के आपसी व्यवहार में कुछ दूरी अब भी रहती है. जाति और पितृसत्ता की जकड़ कमजोर हुई है, खत्म नहीं. केरल का बौद्धिक वर्ग अब भी निजी क्षेत्र को संदेह की नजर से देखता है जिससे कोरोना वायरस के बाद वाले दौर में राज्य को बहुत नुकसान होगा जब खाड़ी देशों से आने वाले पैसे की धार सूख चुकी होगी.

इन सब कमियों के बावजूद केरल की राज्य व्यवस्था और वहां के लोगों के पास बाकी भारत के हम जैसे लोगों को सिखाने के लिए बहुत कुछ है. हम बीते एक दशक के दौरान ये सबक भूल गए थे, लेकिन अब इन पर फिर चर्चा हो रही है ताकि हम इनसे प्रेरणा ले सकें. अतीत और वर्तमान में राज्य ने जो सफलता हासिल की है उसका आधार है विज्ञान, पारदर्शिता, विकेंद्रीकरण और सामाजिक बराबरी. पहले की तरह ये चारों आज भी केरल मॉडल के बुनियादी स्तंभ हैं. दूसरी तरह गुजरात मॉडल के चार स्तंभ हैं अंधविश्वास, गोपनीयता, केंद्रीकरण और सांप्रदायिक कट्टरता. हमारे लिए हमेशा पहले वाला मॉडल ही सही है.