विचार-विमर्श
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हमें अब ‘भारतमाता’ के पैरोकारों से बचना है और उसके विरोधी ‘प्रोग्रेसिव रेशनलिस्टों’ से भी
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क्यों गांधी परिवार को अब कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ही नहीं, बल्कि पार्टी भी छोड़ देनी चाहिए
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नरेंद्र मोदी, डोनाल्ड ट्रंप और बोरिस जॉनसन में जितनी समानताएं हैं उससे ज्यादा असमानताएं हैं
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भारत में न्याय अब एक ऐसा शब्द है जो अपना मतलब खोता जा रहा है
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आप एक साथ मोदी समर्थक और गांधी विरोधी कैसे हो सकते हैं?
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बलात्कार-मुक्त समाज हम बना तो सकते हैं, लेकिन उसकी शुरुआत कैसे और कहां से हो?
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राजनीति सहित तमाम क्षेत्रों में नेतृत्व की मौजूदा पीढ़ी सतीश धवन के जीवन से कई सबक ले सकती है
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2020 में हम भारतीयों को 1920 के इटली को जानने की जरूरत क्यों है?
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कोरोना काल में हुआ यह क्रिकेट राष्ट्रवाद-नस्लवाद से दूर रही अपनी कमेंटरी के चलते भी शानदार था
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एक समय था जब भारत की एक कहानी हुआ करती थी
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अगस्त क्रांति दिवस : जब गांधी की भाषा अग्नि में पड़े कुंदन की तरह दमक उठी थी
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नई पीढ़ियां जिस राम को जानेंगी वह तुलसी का राम होगा, कबीर का? या फिर ठेठ राजनीतिक राम?
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व्यक्ति पूजा उस व्यक्ति के लिए भी सही नहीं है जिसके लिए की जाती है
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वह फर्क क्या है जो न होता तो नरेंद्र मोदी और इंदिरा गांधी एक जैसे होते
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81 साल पहले जिस बालाकोट के लोग चरखा चलाना सीख रहे थे, आज वहां जिहादी बनना सिखाया जाता है
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आपातकाल के बाद से पत्रकारिता इतनी कम स्वतंत्र और इतनी ज्यादा उत्पीड़ित कभी नहीं रही
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आधा घंटे का यह संगीत बताता है कि भारतीय संस्कृति है क्या और वह क्या नहीं हो सकती है
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इस संकट की छह भुजाएं हैं
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गुजरात बनाम केरल मॉडल
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जब महात्मा गांधी ने गौतम बुद्ध के अनीश्वरवादी होने की बात का खंडन किया
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हमें बुद्ध बनना चाहिए या बौद्ध?
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महामारियां तो बदल रही हैं लेकिन उनमें होने वाला भेदभाव सदियों से वैसा ही है
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अगर हम सावधान नहीं रहे तो कोरोना संकट व्यक्तिवाद के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है
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जब महात्मा गांधी ने होली को ‘अन-होली’ (अपावन) त्योहार कहा...
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अच्छी बात का पाखंड भी नंगी बुराई से बेहतर होता है
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क्या राष्ट्रवाद उतना ही जरूरी या खतरनाक है जितना हमें बताया जा रहा है?
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राम का नाम बदनाम ना करो!
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क्या दुनिया का कोई देश वैसा धर्मनिरपेक्ष है जैसा होने की उम्मीद कई लोग भारत से करते हैं - 2/2
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क्या दुनिया का कोई देश वैसा धर्मनिरपेक्ष है जैसा होने की उम्मीद कई लोग भारत से करते हैं - 1/2
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अगर ये हमारे महानायक हैं तो देश-समाज के सबसे जरूरी मुद्दों पर कुछ बोलते क्यों नहीं?
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‘हम देखेंगे’ बनाम ‘हम तुम्हें देख लेंगे’
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नाम बदलने का यह सिलसिला हालात न बदल पाने की स्वीकारोक्ति है
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क्यों संत-बाबाओं के प्रति अंधघृणा भी उतनी ही बड़ी गलती है जितनी इनके प्रति अंधश्रद्धा
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शिक्षा, शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षालय, इन सभी को अब दलगत राजनीति ने लील लिया है
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मातृभाषा में शिक्षा हो तो भारत में नकलची नमूने नहीं, करोड़ों वैज्ञानिक और दार्शनिक पैदा होंगे
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क्यों आजकल के आंदोलनों को सत्याग्रह कहना एक तरह की धोखेबाजी है
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जबरन थोपे जाने को गांधीजी ‘वंदे मातरम्’ का ही अपमान क्यों मानते थे?
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राजनेताओं की मृत्यु के बाद हम उन्हें किस तरह याद करें?
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सबसे सफल भारतीय भी आज सबके सामने वह क्यों नहीं कहते जो उनके मन में है?
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पुलवामा में हमले वाले दिन क्या कुछ और भी ऐसा हुआ था जो सही नहीं था?
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क्या अब हमारे ‘भारत महान’ में आलोचनाएं करना प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए?
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कैसे मॉब लिंचिंग का दुनियाभर का इतिहास भारत के भविष्य की एक भयावह तस्वीर दिखाता है
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भारत की विद्या होने तक फिर भी ठीक है, लेकिन योग को ‘भारत सरकार की विद्या’ न बनाएं!
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पुलिस तो सवालों के घेरे में है ही लेकिन सवाल प्रशांत कनौजिया के व्यवहार पर भी कम नहीं हैं
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यह भारतीय लोकतंत्र का चौथा अध्याय है
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विरोधी को हराने की कोशिश लोकतांत्रिक है, पर उसे मिटाने की सनक लोकतंत्र को ही खत्म कर सकती है
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बाबासाहेब और महात्मा : एक लंबे अरसे तक गांधी को पता ही नहीं था कि अंबेडकर खुद ‘अछूत’ हैं!
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बाबासाहेब और महात्मा : अंबेडकर भी जानते थे कि दलितों के लिए लड़ रहे गांधी की जान दांव पर लगी है
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क्या यह भारतीय टीवी न्यूज़ का सबसे ख़राब दौर है?
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बहुत सारी भाषाएं ख़त्म हो जाएं तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा?
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क्या हरियाणा जैसे राज्यों में महिलाओं को कुपोषित रखना उनकी तादाद बढ़ाने का आखिरी उपाय बचा है?
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नशों को सामाजिक मान्यता मिलने या उनके अपराध बनने का भी एक दिलचस्प इतिहास है
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क्यों सवर्णों का आरक्षण उस नोटबंदी जैसा ही साबित हो सकता है जिससे किसी को कोई फायदा नहीं हुआ
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ब्राह्मण होने और ब्राह्मणवादी होने में फ़र्क़ है
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भारत के सियासी एजेंडे में पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं के लिए कोई जगह क्यों नहीं है?
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स्मृति जी, हां, हम महिलाएं खून से भरे सैनिटरी पैड्स लेकर अपने दोस्तों के घर जाती हैं
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क्यों सिद्धू के ताजा बयान पर हंगामा करने वाले लोग भारत को महज़ 70 साल का बच्चा ही समझते हैं
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इन दिनों आरएसएस भाजपा से ज्यादा सहिष्णु क्यों दिखने लगा है?
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जब सत्ता को असहमति से ख़तरा महसूस होता है तो वह इसे देश पर ख़तरे की तरह पेश करती है
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उग्र और आक्रामक युवाओं की एक भीड़ इस वक्त देश में अनौपचारिक रूप से संगठित है
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दलाई लामा की आत्मकथा से नेहरू की जो तस्वीर बनती है वह उनके हालिया बयान से मेल नहीं खाती है
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भारत विभाजन से इतर ऐसा बहुत कुछ था जिसने आजादी के ठीक पहले गांधी को बेचैन कर दिया था
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वर्तमान के साथ इतिहास भी दिखाता है कि भाजपा के लिए 2019 की राह आसान नहीं है
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आत्महत्या को अनैतिक माना जाए या नैतिक?
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राहुल गांधी के नरेंद्र मोदी को गले लगाने की तीन चर्चित वजहें और इनमें सबसे सही कौन सी लगती है?
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ऐसे गौरक्षकों की वजह से गांधी ने ‘गौरक्षा’ शब्द से ही तौबा कर ली थी
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इतिहास भी बता सकता है कि 2019 का लोक सभा चुनाव जीतना राहुल गांधी के लिए इतना मुश्किल क्यों है?
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झप्पी लेने वाले राहुल गांधी के पास देने के लिए कोई सपना नहीं है और यहीं कांग्रेस फंस जाती है
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स्वामी अग्निवेश पर हुआ हमला जिस चलन की शुरुआत है, क्या आप उसके भविष्य के लिए तैयार हैं?
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नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी: संसद में क्या कहा, कैसे कहा, कैसे सुना?
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क्या हमारे देश और धर्म का भविष्य इससे तय होगा कि सऊदी अरब में क्या होता है?
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जो समाज हर तीन दिन में मिलकर एक निर्दोष को मारता है उसे क्या कहा जाना चाहिए?
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अंधविश्वास विज्ञान का भी हो सकता है
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खुलकर भले न करें, लेकिन मन ही मन प्रधानमंत्री जी को कबीर से क्षमायाचना कर लेनी चाहिए!
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निष्पक्ष लोग आज सबसे ज्यादा खतरे में क्यों दिख रहे हैं?
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न यह विज्ञान है, न ही परंपरा
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क्यों हमारी देशभक्ति देश के लिए प्रेम से ज्यादा किसी दूसरे से दुश्मनी पर तय होने लगी है?
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नाटक दरअसल कर्नाटक में नहीं, हमारे-आपके जीवन में चल रहा है!
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जो हमारा भविष्य नहीं, नया अतीत गढ़ना चाहते हैं
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हिंदुस्तानियत और पाकिस्तानियत के इस शोर में हम कहीं इंसानियत को न भूल जाएं
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क्यों राजनीति में इतिहास का दुरुपयोग हम सबके लिए चिंता का कारण होना चाहिए?
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अगर उसकी सीमाओं को समझें तो मार्क्स का दर्शन आज भी काम का है
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संत-महात्मा और बाबा बनकर ‘अध्यात्म घोटाला’ करने वालों को कैसे पहचाना जाए?
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देश में रोष है, पर क्या इसमें धर्म का दोष है?
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नेताओं और पुलिस के भरोसे तो मुश्किल है, फिर सांप्रदायिक टकराव रोकने का तरीका क्या हो?
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साधु-बाबाओं का राजनीतिक क्षेत्र में आना कितना राजनीति के हित में है और कितना धर्म-अध्यात्म के?
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सभी धर्मों के अतिवादी तत्वों को विदेश में रह रहे अपने समुदाय से ख़ूब मदद मिलती है
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लेफ्ट लिबरल होना अब अपशब्द क्यों बन गया है?
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वेदों का अंध-महिमामंडन तो आत्मघाती है ही, लेकिन इनका अंध-विरोध भी कम खतरनाक नहीं
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धर्म की सार्थक परंपरा दरअसल विद्रोह की परंपरा है
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भारतीय संस्कृति को लेकर सबसे ज्यादा शोर करने वाले वास्तव में उपनिवेशवाद की विरासत ढो रहे हैं
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मध्ययुग में ऐसा नहीं था कि एक तरफ़ देवता थे और दूसरी ओर राक्षस
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धर्म और परंपरा को मानने वाले लोग क्या इतने ही संकीर्ण और अनुदार होते हैं?
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अनुयायियों के आचरण से धर्म को जांचा जाना ग़लत नहीं है, बल्कि वही सही कसौटी है
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जातिवादी टकराव से मुक्त भारत बनाना इतना मुश्किल भी नहीं, लेकिन क्या हम इसके लिए तैयार हैं?
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दलबंदी से हम कब दिलबंदी तक पहुंच गए, पता भी नहीं चला!
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क्या लोकतंत्र की पाठशाला में आज हमारी पीढ़ियां राजनीति के सबसे आत्मघाती सबक सीख रही हैं?
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क्या आपको अंदाजा भी है कि हमारे समाज ने गालियों के क्षेत्र में कितना ‘विकास’ कर लिया है!
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राष्ट्रवादी होने का पहला कदम छद्म राष्ट्रवाद को पहचानना है
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कैसे आदि शंकराचार्य ने एक बंटे हुए भू-भाग को अपने दर्शन, काव्य और तीर्थाटन से एकजुट कर दिया था